अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ९५ * २०३
प्रकार करे—
'ॐ सर्वसंदोहस्वरूपे महाविद्ये पूर्णे! तुम अङ्गिरा-ऋषिकी पुत्री हो। इस प्रतिष्ठाकर्ममें सब कुछ सम्यक्-रूपसे ही पूर्ण करो। नन्दे! तुम समस्त पुरुषोंको आनन्दित करनेवाली हो। मैं यहाँ तुम्हारी स्थापना करता हूँ। तुम इस प्रासादमें सम्पूर्णतः तृप्त होकर तबतक सुस्थिरभावसे स्थित रहो, जबतक कि आकाशमें चन्द्रमा, सूर्य और तारे प्रकाशित होते रहें। वसिष्ठनन्दिनि नन्दे! तुम देहधारियोंको आयु, सम्पूर्ण मनोरथ तथा लक्ष्मी प्रदान करो। तुम्हें प्रासादमें सदा स्थित रहकर यत्नपूर्वक इसकी रक्षा करनी चाहिये। ॐ कश्यपनन्दिनि भद्रे! तुम सदा समस्त लोकोंका कल्याण करो। देवि! तुम सदा ही हमें आयु, मनोरथ और लक्ष्मी प्रदान करती रहो। ॐ देवि जये! तुम सदा-सर्वदा हमारे लिये लक्ष्मी तथा आयु प्रदान करनेवाली होओ। भृगुपुत्रि देवि जये! तुम स्थापित होकर सदा यहीं रहो और इस मन्दिरके अधिष्ठाता मुझ यजमानको नित्य-निरन्तर विजय तथा ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली बनो। ॐ रिक्ते! तुम अतिरिक्त दोषका नाश करनेवाली तथा सिद्धि और मोक्ष प्रदान करनेवाली हो। शुभे! सम्पूर्ण देश-कालमें तुम्हारा निवास है। ईशरूपिणि! तुम सदा इस प्रासादमें स्थित रहो' ॥ ९—१६ ॥
तत्पश्चात् आकाशस्वरूप मन्दिरका ध्यान करके उसमें तीन तत्त्वोंका न्यास करे। फिर विधिवत् प्रायश्चित्त-होम करके यज्ञका विसर्जन करे ॥ १७ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शिलान्यासकी विधिका वर्णन' नामक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९४॥
पंचानबेवाँ अध्याय
प्रतिष्ठा-काल-सामग्री आदिकी विधिका कथन
भगवान् शंकर कहते हैं—स्कन्द! अब मैं मन्दिरमें लिङ्ग-स्थापनाकी विधिका वर्णन करूँगा, जो भोग और मोक्षको देनेवाली है। यदि मुक्तिके लिये लिङ्ग-प्रतिष्ठा करनी हो तो उसे हर समय किया जा सकता है, परंतु यदि भोग-सिद्धिके उद्देश्यसे लिङ्ग-स्थापना करनेका विचार हो तो देवताओंका दिन (उत्तरायण) होनेपर ही वह कार्य करना चाहिये। माघसे लेकर पाँच महीनोंमें, चैत्रको छोड़कर, देवस्थापना करनेकी विधि है। जब गुरु और शुक्र उदित हों तो प्रथम तीन करणों (वव, बालव और कौलव)-में स्थापना करनी चाहिये। विशेषतः शुक्लपक्षमें तथा कृष्ण-पक्षमें भी पञ्चमी तिथितकका समय प्रतिष्ठाके लिये शुभ माना गया है। चतुर्थी, नवमी, षष्ठी और चतुर्दशीको छोड़कर शेष तिथियाँ क्रूर-ग्रहके दिनसे रहित होनेपर उत्तम मानी गयी हैं॥ १—३ $\frac{१}{२}$ ॥
शतभिषा, धनिष्ठा, आर्द्रा, अनुराधा, तीनों उत्तरा, रोहिणी और श्रवण—ये नक्षत्र स्थिर प्रतिष्ठा आरम्भ करनेके लिये महान् अभ्युदयकारक कहे गये हैं। कुम्भ, सिंह, वृश्चिक, तुला, कन्या, वृष—ये लग्न श्रेष्ठ बताये गये हैं।* बृहस्पति
* यहाँ सोमशम्भुने अपनी 'कर्मकाण्ड-क्रमावली' में पिङ्गलामतके अनुसार चारों वर्णोंके लिये पृथक्-पृथक् प्रतिष्ठोपयोगी प्रशस्त नक्षत्र बताये हैं—पुष्य, हस्त, उत्तराषाढ़, पूर्वाषाढ़ और रोहिणी—ये नक्षत्र ब्राह्मणके लिये श्रेष्ठ कहे गये हैं। क्षत्रियके लिये पुनर्वसु, चित्रा, धनिष्ठा और श्रवण उत्तम कहे गये हैं। वैश्यके लिये रेवती, आर्द्रा, उत्तरा और अश्विनी शुभ नक्षत्र हैं तथा शूद्रके लिये मघा, स्वाती और पूर्वाफाल्गुनी—ये नक्षत्र श्रेष्ठ हैं। (श्लोक १३२४—१३२७ तक)