भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 256
  • अध्याय १०५ * २२९

यह इक्यासी पदवाले वास्तुचक्रका वर्णन हुआ। एक शतपद-मण्डप भी होता है। उसमें भी पूर्ववत् देवताओंकी पूजाका विधान है। शतपदचक्रके मध्यवर्ती सोलह पदोंमें ब्रह्माजीकी पूजा करनी चाहिये। ब्रह्माजीके पूर्व आदि चार दिशाओंमें स्थित मरीचि, विवस्वान्, मित्र तथा पृथ्वीधरकी दस-दस पदोंमें पूजाका विधान है। अन्य जो ईशान आदि कोणोंमें स्थित देवता हैं, जैसे दैत्योंकी माता दिति और ईश; अग्नि तथा मृग (पूषा) और पितर तथा पापयक्ष्मा और अनिल (रोग)—वे सब-के-सब डेढ़-डेढ़ पदमें अवस्थित हैं॥ १४—१६॥

स्कन्द! अब मैं यज्ञ आदिके लिये जो मण्डप होता है, उसका संक्षेपसे तथा क्रमशः वर्णन करूँगा। तीस हाथ लंबा और अट्ठाईस हाथ चौड़ा मण्डप शिवका आश्रय है। लंबाई और चौड़ाई—दोनोंमें ग्यारह-ग्यारह हाथ घटा देनेपर उन्नीस हाथ लंबा और सत्रह हाथ चौड़ा मण्डप शिव-संज्ञक होता है। बाईस हाथ लम्बा और उन्नीस हाथ चौड़ा अथवा अठारह हाथ लम्बा तथा पन्द्रह हाथ चौड़ा मण्डप हो तो वह सावित्र-संज्ञावाला कहा गया है। अन्य गृहोंका विस्तार आंशिक होता है। दीवारकी जो मोटी उपजङ्घा (कुर्सी) होती है, उसकी ऊँचाईसे दीवारकी ऊँचाई तिगुनी होनी चाहिये। दीवारके लिये जो सूतसे मान निश्चित किया गया हो, उसके बराबर ही उसके सामने भूमि (सहन) होनी चाहिये। वह वीथीके भेदसे अनेक भेदवाली होती है॥ १७—२०॥

‘भद्र’ नामक प्रासादमें वीथियोंके समान ही ‘द्वारवीथी’ होती है; केवल वीथीका अग्रभाग द्वारवीथीमें नहीं होता है। ‘श्रीजय’ नामक प्रासादमें जो द्वारवीथी होती है, उसमें वीथीका पृष्ठभाग नहीं होता है। वीथीके पार्श्वभागोंको द्वारवीथीमें कम कर दिया जाय, तो उससे उपलक्षित प्रासादकी भी ‘भद्र’ संज्ञा ही होती है। गर्भके विस्तारकी ही भाँति वीथीका भी विस्तार होता है। कहीं-कहीं उसके आधे या चौथाई भागके बराबर भी होता है। वीथीके आधे मानसे उपवीथी आदिका निर्माण करना चाहिये। वह एक, दो या तीन पुरोंसे युक्त होता है। अब अन्य साधारण गृहोंके विषयमें बताया जाता है; गृहका वैसा स्वरूप हो तो वह सबकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है। वह क्रमशः एक, दो, तीन, चार और आठ शालाओंसे युक्त होता है। एक शालावाले गृहकी शाला दक्षिणभागमें बनती है और उसका दरवाजा उत्तरकी ओर होता है। यदि दो शालाएँ बनानी हों तो पश्चिम और पूर्वमें बनवाये और उनका द्वार आमने-सामने पूर्व-पश्चिमकी ओर रखे। चार शालाओंवाला गृह चार द्वारों और अलिन्दोंसे युक्त होनेके कारण सर्वतोमुख होता है। वह गृहस्वामीके लिये कल्याणकारी है। पश्चिम दिशाकी ओर दो शालाएँ हों तो उस द्विशाल-गृहको ‘यमसूर्यक’ कहा गया है। पूर्व तथा उत्तरकी ओर शालाएँ हों तो उस गृहकी ‘दण्ड’ संज्ञा है तथा पूर्व-दक्षिणकी ओर दो शालाएँ हों तो वह गृह ‘वात’ संज्ञक होता है। जिस तीन शालावाले गृहमें पूर्व दिशाकी ओर शाला न हो, उसे ‘सुक्षेत्र’ कहा गया है, वह बुद्धिदायक होता है*॥ २१—२६॥

यदि दक्षिण दिशामें कोई शाला न हो (और


* मत्स्यपुराणमें एकशाल, द्विशाल, त्रिशाल और चतुःशाल-गृहका परिचय इस प्रकार दिया है—जिसमें एक दिशामें एक ही शाला (कमरा) हो और अन्य दिशाओंमें कोई कमरा न होकर बरामदा मात्र हो, वह ‘एकशाल-गृह’ है। इसी तरह दो दिशाओंमें दो कमरे और तीन दिशाओंमें तीन कमरे तथा चारों दिशाओंमें चार कमरे होनेपर उन घरोंको क्रमशः ‘द्विशाल’, ‘त्रिशाल’ और ‘चतुःशाल’ कहते हैं। चतुःशाल-गृहमें चारों ओर कमरे एवं चारों ओर दरवाजे होते हैं और वे द्वार आमने-सामने बने होते हैं। अतः वह सर्वतोमुखगृह है और उसका नाम ‘सर्वतोभद्र’ है। यह देवालय तथा नृपालय दोनोंमें शुभ होता है। पश्चिममें द्वार न हो (और अन्य तीन दिशाओंमें हो) तो उस गृहका विशेष नाम है—‘नन्द्यावर्त’। यदि दक्षिण दिशामें ही द्वार न हो तो उस भवनका नाम है—‘वर्धमान’। पूर्व-