अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 294, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय १२३ * २६७
इ, उ, ए, ओ—ये पाँच स्वर होते हैं। इन्हींके क्रमसे नन्दा (भद्रा, जया, रिक्ता, पूर्णा) आदि तिथियाँ होती हैं। 'क' से लेकर 'ह' तक वर्ण होते हैं और पूर्वोक्त स्वरोंके क्रमसे सूर्य-
इसी तरह कलादि फल-साधनके लिये 'कर्कटादौ हरेद्राशिमृतुवेदत्रयैः क्रमात्' के अनुसार करना चाहिये।
| क. ६ + १२'' | कल्पना किया कि चं० सू० = ०० । ११ । २५ । १०'' | |
| सिं ४ + ४०'' | यहाँपर मेष राशिका विकलात्मक ५० | |
| क. ३ + ५०'' | ফল—५० को जोड़ा = ०० । ११ । २६ । ००'' | |
| तु. ३ - ५०'' | यहाँ ११ सम्बन्धि ५ घटी. फल प्रतिपदाकी घटी | |
| वृ. ४ - ४०'' | जोड़ दिया तो २४ । ९ । ३६ | |
| ध. ६ - १२'' | ५ । ०० | |
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| म. ६ - १२'' | २ । ५४ । ३६ हुआ | |
| कुं. ४ - ४०'' | फिर मीन तथा मेषका राशि ध्रुवा (३-३) = ० | |
| मी. ३ - ५०'' | इससे (२६ । ००) × ० गुणा किया तो | |
| मे. ३ + ५०'' | = ० । ० हुआ। इसको तिथि घट्यादिमें | |
| वृ. ४ + ४०'' | संस्कार किया २।५४ । ३६ | |
| मि. ६ + १२'' | ०० । ०० | |
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| = स्पष्ट २ । ५४ । ३६ तिथि-मान हुआ। |
इसमें एष्यखण्डासे गतखण्डा अधिक हो तो फलको ऋण समझना चाहिये। फिर भी तिथि-संस्कारके लिये तृतीय संस्कार कह रहे हैं (श्लो० १९-२०)। तिथिमानको द्विगुणित करके षष्ठांश उसीमें घटा दे। सूर्यके अंशके फलको विपरीत संस्कार करे, उसमें तिथि-नाड़ीको मिला दे। इसमें कलादिका ऋण फल-संशोधन करनेपर स्पष्टमान दण्डादिक हो जाता है। ऋणात्मक मानके नहीं घटनेपर उसमें ६० मिलाकर घटाना चाहिये एवं जिसमें संस्कार करना है, वही ६० से अधिक हो तो उसमें ही ६० घटाना चाहिये—इस तरह तृतीय संस्कार होता है।
उदाहरण—‘‘द्विगुणिता’’ के स्थानपर ‘‘त्रिगुणिता’’ पाठ रखनेपर पूर्वानीत मध्यम तिथिका मान दण्डादिक (९ । ३६) को ३ से गुणा किया तो (२८ । ४८) हुआ। इसका षष्ठांश (४ । ४८) हुआ। (२८ । ४८)-मेंसे षष्ठांश (४ । ४८)-को घटाया तो = २४ । ०० हुआ। इसमें तिथि-नाड़ी (९ । ३६)-को मिलाया तो (३३ । ३६) हुआ। इसमें सूर्यके अंशका ५ घ० संस्कार-फल घटाया तो (३३ । ३६) - (५ । ०) = (२८ । ३६) हुआ। ६० से तष्टित किया तो २८ । ३६ घट्यादिक स्पष्ट तिथिका मान हुआ, जो पूर्वानीत मध्य तिथिके घट्यादिक (९ । ३६) के आसन्न हुआ।
‘‘द्विगुणिता’’ पाठ रखनेपर ऐसा नहीं होता है, अधिक अन्तर होता है। अब योगका साधन बताते हैं (श्लोक २१-२३)।
स्पष्ट तिथि-मानको (२८ । ३६) × ४ = ११४ । २४ हुआ। इसमें तिथिका तृतीयांश (९ । ३२) मिलाया तो १२३ । ५६ हुआ। २७ से तष्टित किया तो लब्धि ४ से घट्यादिक १५ । ५६ हुआ अर्थात् सौभाग्य योगका मान घट्यादिक १५ । ५६ हुआ।
योग-साधनका दूसरा प्रकार कहते हैं—(श्लोक २३) सूर्य तथा चन्द्रमाकी योग-कलामें ८०० से भाग देनेपर लब्धि योगसंख्या होगी। शेष एष्य योगका गत घट्यादि मान होगा। उसे ८०० कलामें घटाकर सूर्य-चन्द्र-गति-योगमें ६० घटी तो शेष योगकलामें क्या इस तरह अनुपातसे भी योगका घट्यादि मान होगा।
अब करणका साधन-प्रकार कहते हैं—
द्विगुणित तिथि-संख्यामें १ घटानेसे सात ‘चल’ करण होते हैं और कृष्णपक्षकी चतुर्दशीके द्वितीय परार्धमें शकुनि तथा अमावास्याके पूर्वार्ध और परार्धमें चतुष्पद एवं ‘नाग’ करण होते हैं। शुक्लपक्षकी प्रतिपदाके पूर्वार्धमें किंस्तुघ्न नामके चार करण ‘स्थिर’ होते हैं और तिथिके आधेके बराबर करणोंका मान होता। यहाँपर मूल पाठमें ‘‘तिथ्यर्थतो हि’’ ऐसा लिखा है, किंतु वास्तवमें ‘‘तिथ्यर्थतोऽहिः’’ ऐसा पाठ होना चाहिये; क्योंकि ‘हि’ को पादपूरक रखनेसे ‘नाग’ अर्थ नहीं होगा। जिससे नाग नामक करणका ज्ञान नहीं होगा और ‘‘अहिः’’ ऐसा रखनेपर नाग करणका बोध होगा।