भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 295

२६८ * अग्निपुराण *

मङ्गल, बुध-चन्द्रमा, बृहस्पति-शुक्र, शनि-मङ्गल | नाड़ीका स्फुरण अहर्निश होता रहता है और इसी तथा सूर्य-शनि—ये ग्रह-स्वामी होते हैं॥ १-२॥ | मानसे अकारादि स्वरोंका उदय भी होता रहता चालीसको साठसे गुणा करे। उसमें ग्यारहसे | है॥ ३-४ $\frac{१}{२}$॥ भाग दे। लब्धिको छःसे गुणा करके गुणनफलमें | (अब व्यावहारिक काल-ज्ञान कहते हैं—) फिर ग्यारहसे ही भाग दें। लब्धिको तीनसे गुणा | तीन बार स्फुरण होनेपर १ 'उच्छ्वास' होता है करके गुणनफलमें एक मिला दे तो उतनी ही | अर्थात् १ 'अणु'$^२$ होता है, ६ 'उच्छ्वास'का १ बार नाडीके स्फुरणके आधारपर पल होता है। | 'पल' होता है, ६० पलका एक 'लिसा' अर्थात् इसके बाद भी अहर्निश नाडीका स्फुरण होता ही | १ 'दण्ड' होता है, (यद्यपि 'लिसा' शब्द कला- रहता है। | वाचक है, जो कि ग्रहोंके राश्यादि विभागमें उदाहरण—जैसे ४०×६०=२४००। $\frac{\text{२४००}}{\text{११}}$=२१९ | लिया जाता है, फिर भी यहाँ काल-मानके लब्धि स्वल्पान्तरसे हुई। इसे छःसे गुणा किया | प्रकरणमें 'लिसा' शब्दसे 'दण्ड' ही लिया तो २१९×६=१३१४ गुणनफल हुआ। इसमें फिर | जायगा; क्योंकि 'कला' तथा 'दण्ड'—ये दोनों ११ से भाग दिया तो $\frac{\text{१३१४}}{\text{११}}$=११९ लब्धि, | भचक्रके षष्ट्यंश-विभागमें ही लिये गये हैं।) ६० शेष=५, शेष छोड़ दिया। लब्धि ११९ को ३ से | दण्डका १ अहोरात्र होता है। उपर्युक्त अ, इ, उ, गुणा किया तो गुणनफल ३५७ हुआ। | ए, ओ—स्वरोंकी क्रमसे बाल, कुमार, युवा, इसमें १ मिलाया तो ३५८ हुआ। इसको स्वल्पान्तरसे | वृद्ध, मृत्यु—ये पाँच संज्ञाएँ होती हैं। इनमें किसी ३६० मान लिया। अर्थात् करमूलगत नाडीका | एक स्वरके उदयके बाद पुनः उसका उदय पाँचवें ३६० बार स्फुरण होनेके आधारपर ही पल होते | खण्डपर होता है। जितने समयसे उदय होता हैं, जिनका ज्ञानप्रकार आगे कहेंगे। इसी तरह | है, उतने ही समयसे अस्त भी होता है। इनके


१. इस विषयके स्पष्ट बोधके लिये निम्नाङ्कित स्वरचक्र देखिये—

स्वराः
तिथयःनन्दा<br>१।६।११भद्रा<br>२।७।१२जया<br>३।८।१३रिक्ता<br>४।९।१४पूर्णा<br>५।१०।१५
वर्णाः<br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br>
स्वामिनःसूर्य<br>मंगलबुध<br>चन्द्रबृह०<br>शुक्रशनि०<br>मं०सू०<br>श०
संज्ञाबालकुमारयुवावृद्धमृत्यु

२. इस विषयपर भास्कराचार्य अपनी 'गणिताध्याय' नामक पुस्तकके 'कालमानाध्याय' में लिखते हैं—
गुर्वक्षरैः खेन्दुमितैरसुस्तैः षड्भिः पलं तैर्घटिका खषड्भिः। स्याद्वा घटीषष्टिरहः खरमैर्मासो दिनैस्तैर्द्विकुभिश्च वर्षम्॥ १॥
"दस गुरु अक्षरोंके उच्चारणमें जितना समय लगता है, उसे एक 'अणु' कहते हैं और ६ अणुओंका एक 'पल' होता है। ६० पलका १ 'दण्ड', ६० दण्डका १ 'अहोरात्र', ३० दिन-रातका एक 'मास' और १२ मासका एक 'वर्ष' होता है।"

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