भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 317

२९० * अग्निपुराण *


त्रैलोक्यमोहिनी गौरीने भी देवासुर-संग्राममें देवताओंकी रक्षा की थी। अष्टदल-कमलकी कर्णिका तथा दलोंमें गौरीके बीज (ह्रीं) मन्त्रसे सम्पुटित अपना नाम लिख दे। पूर्व दिशामें रहनेवाले प्रथमादि दलोंमें पूजाके अनुसार गौरीजीकी अङ्ग-देवताओंका न्यास करे। इस तरह लिखनेपर शुभे ! 'रक्षायन्त्र' बन जायगा ॥ ३६-३७ ॥

अब इन्हीं संस्कारोंके बीच 'मृत्युंजय-मन्त्र' को कहता हूँ, जो सब कलाओंसे परिवेष्टित है, अर्थात् उस मन्त्रसे प्रत्येक कार्यका साधन हो सकता है, तथा जो सकारसे प्रबोधित होता है। मन्त्रका स्वरूप कहते हैं—

ॐकार पहले लिखकर फिर बिन्दुके साथ जकार लिखे, पुनः धकारके पेटमें वकारको लिखे, उसे चन्द्रबिन्दुसे अङ्कित करे। अर्थात् ‘ॐ जं ध्वँ’—यह मन्त्र सभी दुष्टोंका विनाश करनेवाला है ॥ ३८-३९$\frac{१}{२}$ ॥

दूसरे 'रक्षायन्त्र' का उद्धार कहते हैं— गोरोचन-कुङ्कुमसे अथवा मलयागिरि चन्दन-कर्पूरसे भोजपत्रपर लिखे हुए चतुर्दल कमलकी कर्णिकामें अपना नाम लिखकर चारों दलोंमें ॐकार लिखे। आग्नेय आदि कोणोंमें हूंकार लिखे। उसके ऊपर षोडश दलोंका कमल बनाये। उसके दलोंमें अकारादि षोडश स्वरोंको लिखे। फिर उसके ऊपर चौंतीस दलोंका कमल बनाये। उसके दलोंमें 'क' से लेकर 'क्ष' तक अक्षरोंको लिखे। उस यन्त्रको श्वेत सूत्रसे वेष्टित करके रेशमी वस्त्रसे आच्छादित कर, कलशपर स्थापन करके उसका पूजन करे। इस यन्त्रको धारण करनेसे सभी रोग शान्त होते हैं एवं शत्रुओंका विनाश होता है ॥ ४०-४३$\frac{१}{२}$ ॥

रक्षायंत्रका स्वरूप

                   रक्षायंत्र
               (वृत्ताकार चक्र)

अब 'भेलखी विद्या' को कह रहा हूँ, जो वियोगमें होनेवाली मृत्युसे बचाती है। उसका मन्त्रस्वरूप निम्नलिखित है—

‘ॐ वातले वितले विडालमुखि इन्द्रपुत्रि उद्भवो वायुदेवेन खीलि आजी हाजा मयि वाह इहादिदुःखनित्यकण्ठोच्चैर्मुहूर्त्तान्वया अह मां यस्महम उपाडि ॐ भेलखि ॐ स्वाहा।’

नवरात्रके अवसरपर इस मन्त्रको सिद्ध करके संग्रामके समय सात बार मन्त्रजप करनेपर शत्रुका मुखस्तम्भन होता है ॥ ४४-४६ ॥

‘ॐ चण्डि, ॐ हूं फट् स्वाहा।’—इस मन्त्रको संग्रामके अवसरपर सात बार जपनेसे खड्ग-युद्धमें विजय होती है ॥ ४७-४८ ॥


इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नाना प्रकारके बलोंका विचार' नामक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३३ ॥