अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 318, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय १३४ *
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एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय
त्रैलोक्यविजया-विद्या
भगवान् महेश्वर कहते हैं—देवि! अब मैं समस्त यन्त्र-मन्त्रोंको नष्ट करनेवाली 'त्रैलोक्यविजया-विद्या' का वर्णन करता हूँ॥ १॥
ॐ हूं क्षूं हूं, ॐ नमो भगवति दंष्ट्रिणि भीमवक्त्रे महोग्ररूपे हिलि हिलि, रक्तनेत्रे किलि किलि, महानिस्वने कुलु, ॐ विद्युज्जिह्वे कुलु ॐ निर्मासे कट कट, गोनसाभरणे चिलि चिलि, शवमालाधारिणि द्रावय, ॐ महारौद्रि सार्द्रचर्मकृताच्छदे विजृम्भ, ॐ नृत्यासिलताधारिणि भ्रुकुटीकृतापाङ्गे विषमनेत्रकृतानने वसामेदोविलिप्तगात्रे कह कह, ॐ हस हस, क्रुध्य क्रुध्य, ॐ नीलजीमूतवर्णेऽभ्रमालाकृताभरणे विस्फुर, ॐ घण्टारवाकीर्णदेहे, ॐ सिंसिस्थेऽरुणवर्णे, ॐ हां ह्रीं हूं रौद्ररूपे हूं ह्रीं क्लीं, ॐ ह्रीं हू मोमाकर्ष, ॐ धून धून, ॐ हे हः स्वः खः, वज्रिणि हूं क्षूं क्षां क्रोधरूपिणि प्रज्वल प्रज्वल, ॐ भीमभीषणे भिन्द, ॐ महाकाये छिन्द, ॐ करालिनि किटि किटि, महाभूतमातः सर्वदुष्टनिवारिणि जये, ॐ विजये ॐ त्रैलोक्यविजये हूं फट् स्वाहा॥
ॐ हूं क्षूं हूं, ॐ बड़ी-बड़ी दाढ़ोंसे जिनकी आकृति अत्यन्त भयंकर है, उन महोग्ररूपिणी भगवतीको नमस्कार है। वे रणाङ्गणमें स्वेच्छापूर्वक क्रीड़ा करें, क्रीड़ा करें। लाल नेत्रोंवाली! किलकारी कीजिये, किलकारी कीजिये। भीमनादिनि कुलु। ॐ विद्युज्जिह्वे! कुलु। ॐ मांसहीने! शत्रुओंको आच्छादित कीजिये, आच्छादित कीजिये। भुजङ्गमालिनि! वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत होइये, अलंकृत होइये। शवमालाविभूषिते! शत्रुओंको खदेड़िये। ॐ शत्रुओंके रक्तसे सने हुए चमड़ेके वस्त्र धारण करनेवाली महाभयंकरि! अपना मुख खोलिये। ॐ! नृत्य-मुद्रामें तलवार धारण करनेवाली!! टेढ़ी भौंहोंसे युक्त तिरछे नेत्रोंसे देखनेवाली! विषम नेत्रोंसे विकृत मुखवाली!! आपने अपने अङ्गोंमें मज्जा और मेदा लपेट रखा है। ॐ अट्टहास कीजिये, अट्टहास कीजिये। हँसिये, हँसिये। क्रुद्ध होइये, क्रुद्ध होइये। ॐ नील मेघके समान वर्णवाली! मेघमालाको आभरण रूपमें धारण करनेवाली!! विशेषरूपसे प्रकाशित होइये। ॐ घण्टाकी ध्वनिसे शत्रुओंके शरीरोंकी धज्जियाँ उड़ा देनेवाली! ॐ सिंसिस्थिते! रक्तवर्णे! ॐ हां ह्रीं हूं रौद्ररूपे! हूं ह्रीं क्लीं ॐ ह्रीं हूं ॐ शत्रुओंका आकर्षण कीजिये, उनको हिला डालिये, कँपा डालिये। ॐ हे हः खः वज्रहस्ते! हूं क्षूं क्षां क्रोधरूपिणि! प्रज्वलित होइये, प्रज्वलित होइये। ॐ महाभयंकरको डरानेवाली! उनको चीर डालिये। ॐ विशाल शरीरवाली देवि! उनको काट डालिये। ॐ करालरूपे! शत्रुओंको डराइये, डराइये। महाभयंकर भूतोंकी जननि! समस्त दुष्टोंका निवारण करनेवाली जये!! ॐ विजये!!! ॐ त्रैलोक्यविजये हूं फट् स्वाहा॥ २॥
विजयके उद्देश्यसे नीलवर्णा, प्रेताधिरूढ़ा त्रैलोक्यविजया-विद्याकी बीस हाथ ऊँची प्रतिमा बनाकर उसका पूजन करे। पञ्चाङ्गन्यास करके रक्तपुष्पोंका हवन करे। इस त्रैलोक्यविजया-विद्याके पठनसे समरभूमिमें शत्रुकी सेनाएँ पलायन कर जाती हैं॥ ३॥
ॐ नमो बहुरूपाय स्तम्भय स्तम्भय ॐ मोहय, ॐ सर्वशत्रून् द्रावय, ॐ ब्रह्माणमाकर्षय, ॐ विष्णुमाकर्षय, ॐ महेश्वरमाकर्षय, ॐ इन्द्रं टालय, ॐ पर्वतांश्चालय, ॐ सप्तसागराञ्छोषय, ॐ च्छिन्द च्छिन्द बहुरूपाय नमः॥