भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 32
  • अध्याय ८ * १३

आश्रमपर गये; किंतु वहाँ सीता नहीं दिखायी दीं। उस समय वे आर्त होकर शोक और विलाप करने लगे—‘हा प्रिये जानकी! तू मुझे छोड़कर कहाँ चली गयी?’ लक्ष्मणने श्रीरामको सान्त्वना दी। तब वे वनमें घूम-घूम सीताकी खोज करने लगे। इसी समय इनकी जटायुसे भेंट हुई। जटायुने यह कहकर कि ‘सीताको रावण हर ले गया है’ प्राण त्याग दिया। तब श्रीरघुनाथजीने अपने हाथसे जटायुका दाह-संस्कार किया। इसके बाद इन्होंने कबन्धका वध किया। कबन्धने शापमुक्त होनेपर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—‘आप सुग्रीवसे मिलिये’॥ २०—२४ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘रामायण-कथाके अन्तर्गत अरण्यकाण्डकी कथाका वर्णन’-विषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७ ॥


आठवाँ अध्याय

किष्किन्धाकाण्डकी संक्षिप्त कथा

नारदजी कहते हैं— श्रीरामचन्द्रजी पम्पा-सरोवरपर जाकर सीताके लिये शोक करने लगे। वहाँ वे शबरीसे मिले। फिर हनुमान्जीसे उनकी भेंट हुई। हनुमान्जी उन्हें सुग्रीवके पास ले गये और सुग्रीवके साथ उनकी मित्रता करायी। श्रीरामचन्द्रजीने सबके देखते-देखते ताड़के सात वृक्षोंको एक ही बाणसे बींध डाला और दुन्दुभि नामक दानवके विशाल शरीरको पैरकी ठोकरसे दस योजन दूर फेंक दिया। इसके बाद सुग्रीवके शत्रु वालीको, जो भाई होते हुए भी उनके साथ वैर रखता था, मार डाला और किष्किन्धापुरी, वानरोंका साम्राज्य, रुमा एवं तारा—इन सबको ऋष्यमूक पर्वतपर वानरराज सुग्रीवके अधीन कर दिया। तदनन्तर किष्किन्धापुरीके स्वामी सुग्रीवने कहा—‘श्रीराम! आपको सीताजीकी प्राप्ति जिस प्रकार भी हो सके, ऐसा उपाय मैं कर रहा हूँ।’ यह सुननेके बाद श्रीरामचन्द्रजीने माल्यवान् पर्वतके शिखरपर वर्षाके चार महीने व्यतीत किये और सुग्रीव किष्किन्धामें रहने लगे। चौमासेके बाद भी जब सुग्रीव दिखायी नहीं दिये, तब श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे लक्ष्मणने किष्किन्धामें जाकर कहा—‘सुग्रीव! तुम श्रीरामचन्द्रजीके पास चलो। अपनी प्रतिज्ञापर अटल रहो, नहीं तो वाली मरकर जिस मार्गसे गया है, वह मार्ग अभी बंद नहीं हुआ है। अतएव वालीके पथका अनुसरण न करो।’ सुग्रीवने कहा—‘सुमित्रानन्दन! विषयभोगमें आसक्त हो जानेके कारण मुझे बीते हुए समयका भान न रहा। [अतः मेरे अपराधको क्षमा कीजिये]’॥ १—७ ॥

ऐसा कहकर वानरराज सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजीके पास गये और उन्हें नमस्कार करके बोले—‘भगवन्! मैंने सब वानरोंको बुला लिया है। अब आपकी इच्छाके अनुसार सीताजीकी खोज करनेके लिये उन्हें भेजूँगा। वे पूर्वादि दिशाओंमें जाकर एक महीनेतक सीताजीकी खोज करें। जो एक महीनेके बाद लौटेगा, उसे मैं मार डालूँगा।’ यह सुनकर बहुत-से वानर पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशाओंके मार्गपर चल पड़े तथा वहाँ जनककुमारी सीताको न पाकर नियत समयके भीतर श्रीराम और सुग्रीवके पास लौट आये। हनुमान्जी श्रीरामचन्द्रजीकी दी हुई अँगूठी लेकर अन्य वानरोंके साथ दक्षिण दिशामें जानकीजीकी खोज कर रहे थे। वे लोग सुप्रभाकी गुफाके निकट विन्ध्यपर्वतपर ही एक माससे अधिक कालतक ढूँढ़ते फिरे; किंतु उन्हें सीताजीका दर्शन नहीं हुआ। अन्तमें निराश होकर आपसमें कहने लगे—