भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

१४ * अग्निपुराण *

'हमलोगोंको व्यर्थ ही प्राण देने पड़ेंगे। धन्य है वह जटायु, जिसने सीताके लिये रावणके द्वारा मारा जाकर युद्धमें प्राण त्याग दिया था' ॥ ८-१३ ॥

उनकी ये बातें सम्पाति नामक गृध्रके कानोंमें पड़ीं। वह वानरोंके (प्राणत्यागकी चर्चासे उनके) खानेकी ताकमें लगा था। किंतु जटायुकी चर्चा सुनकर रुक गया और बोला—'वानरो! जटायु मेरा भाई था। वह मेरे ही साथ सूर्यमण्डलकी ओर उड़ा चला जा रहा था। मैंने अपनी पाँखोंकी ओटमें रखकर सूर्यकी प्रखर किरणोंके तापसे उसे बचाया। अतः वह तो सकुशल बच गया; किंतु मेरी पाँखें जल गयीं, इसलिये मैं यहीं गिर पड़ा। आज श्रीरामचन्द्रजीकी वार्ता सुननेसे फिर मेरे पंख निकल आये। अब मैं जानकीको देखता हूँ; वे लङ्कामें अशोक-वाटिकाके भीतर हैं। लवणसमुद्रके द्वीपमें त्रिकूट पर्वतपर लङ्का बसी हुई है। यहाँसे वहाँतकका समुद्र सौ योजन विस्तृत है। यह जानकर सब वानर श्रीराम और सुग्रीवके पास जायें और उन्हें सब समाचार बता दें' ॥ १४-१७ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'रामायण-कथाके अन्तर्गत किष्किन्धाकाण्डकी कथाका वर्णन' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥


नवाँ अध्याय

सुन्दरकाण्डकी संक्षिप्त कथा

नारदजी कहते हैं— सम्पातिकी बात सुनकर हनुमान् और अङ्गद आदि वानरोंने समुद्रकी ओर देखा। फिर वे कहने लगे—'कौन समुद्रको लाँघकर समस्त वानरोंको जीवन-दान देगा ?' वानरोंकी जीवन-रक्षा और श्रीरामचन्द्रजीके कार्यकी प्रकृष्ट सिद्धिके लिये पवनकुमार हनुमान्जी सौ योजन विस्तृत समुद्रको लाँघ गये। लाँघते समय अवलम्बन देनेके लिये समुद्रसे मैनाक पर्वत उठा। हनुमान्जीने दृष्टिमात्रसे उसका सत्कार किया। फिर [छायाग्राहिणी] सिंहिकाने सिर उठाया। [वह उन्हें अपना ग्रास बनाना चाहती थी, इसलिये] हनुमान्जीने उसे मार गिराया। समुद्रके पार जाकर उन्होंने लङ्कापुरी देखी। राक्षसोंके घरोंमें खोज की; रावणके अन्तःपुरमें तथा कुम्भ, कुम्भकर्ण, विभीषण, इन्द्रजित् तथा अन्य राक्षसोंके गृहोंमें जा-जाकर तलाश की; मद्यपानके स्थानों आदिमें भी चक्कर लगाया; किंतु कहीं भी सीता उनकी दृष्टिमें नहीं पड़ीं। अब वे बड़ी चिन्तामें पड़े। अन्तमें जब अशोकवाटिकाकी ओर गये तो वहाँ शिंशपा-वृक्षके नीचे सीताजी उन्हें बैठी दिखायी दीं। वहाँ राक्षसियाँ उनकी रखवाली कर रही थीं। हनुमान्जीने शिंशपा-वृक्षपर चढ़कर देखा। रावण सीताजीसे कह रहा था—'तू मेरी स्त्री हो जा'; किंतु वे स्पष्ट शब्दोंमें 'ना' कर रही थीं। वहाँ बैठी हुई राक्षसियाँ भी यही कहती थीं—'तू रावणकी स्त्री हो जा।' जब रावण चला गया तो हनुमान्जीने इस प्रकार कहना आरम्भ किया—'अयोध्यामें दशरथ नामवाले एक राजा थे। उनके दो पुत्र राम और लक्ष्मण वनवासके लिये गये। वे दोनों भाई श्रेष्ठ पुरुष हैं। उनमें श्रीरामचन्द्रजीकी पत्नी जनककुमारी सीता तुम्हीं हो। रावण तुम्हें बलपूर्वक हर ले आया है। श्रीरामचन्द्रजी इस समय वानरराज सुग्रीवके मित्र हो गये हैं। उन्होंने तुम्हारी खोज करनेके लिये ही मुझे भेजा है। पहचानके लिये गूढ़ संदेशके साथ श्रीरामचन्द्रजीने अँगूठी दी है। उनकी दी हुई