भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 333

३०६ * अग्निपुराण *

पूजन करना चाहिये* ॥ २-३ $\frac{१}{२}$ ॥

मण्डलके अग्निकोणमें कूर्च बीज (हूं), ईशानकोणमें शिरोमन्त्र (स्वाहा), नैर्ऋत्यकोणमें शिखामन्त्र (वषट्), वायव्यकोणमें कवचमन्त्र (हुम्), मध्यभागमें नेत्रमन्त्र (वौषट्) तथा मण्डलकी सम्पूर्ण दिशाओंमें अस्त्र-मन्त्र (फट्)-का उल्लेख एवं पूजन करे। बत्तीस अक्षरोंसे युक्त बत्तीस दलवाले कमलकी कर्णिकामें 'स्त्रों ह स क्ष म ल न व ब ष ट स च' तथा आत्मबीज-मन्त्र (आम्)-का न्यास एवं पूजन करे। कमलके सब ओर पूर्व दिशासे आरम्भ करके क्रमशः ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा और चण्डिका (महालक्ष्मी)-का न्यास एवं पूजन करना चाहिये ॥ ४-६ ॥

तत्पश्चात् ईशान, पूर्व, अग्निकोण, दक्षिण, नैर्ऋत्य और पश्चिममें क्रमशः र, व, ल, क, स और ह-इनका न्यास और पूजन करे। फिर इन्हीं दिशाओंमें क्रमशः कुसुममाला एवं पाँच पर्वतोंका स्थापन एवं पूजन करे। पर्वतोंके नाम हैं—जालन्धर, पूर्णगिरि और कामरूप आदि। तत्पश्चात् वायव्य, ईशान, अग्नि और नैर्ऋत्यकोणमें तथा मध्यभागमें वज्रकुब्जिकाका पूजन करे। इसके बाद वायव्य, ईशान, नैर्ऋत्य, अग्नि तथा उत्तर शिखरपर क्रमशः अनादि विमल, सर्वज्ञ विमल, प्रसिद्ध विमल, संयोग विमल तथा समय विमल—इन पाँच विमलोंकी पूजा करे। इन्हीं शृङ्गोंपर कुब्जिकाकी प्रसन्नताके लिये क्रमशः खिद्धिनी, षष्ठी, सोपन्ना, सुस्थिरा तथा रत्नसुन्दरीका पूजन करना चाहिये। ईशानकोणवर्ती शिखरपर आठ आदिनाथोंकी आराधना करे॥ ७-११॥

अग्निकोणवर्ती शिखरपर मित्रकी, पश्चिमवर्ती शिखरपर औडीश वर्षकी तथा वायव्यकोणवर्ती शिखरपर षष्टि नामक वर्षकी पूजा करनी चाहिये। पश्चिमदिशावर्ती शिखरपर गगनरत्न और कवचरत्नकी अर्चना की जानी चाहिये। वायव्य, ईशान और अग्निकोणमें 'बूं' बीजसहित 'पञ्चनामा' संज्ञक मर्त्यकी पूजा करनी चाहिये। दक्षिण दिशा और अग्निकोणमें 'पञ्चरत्न' की अर्चना करे। ज्येष्ठा, रौद्री तथा अन्तिका—ये तीन संध्याओंकी अधिष्ठात्री देवियाँ भी उसी दिशामें पूजने योग्य हैं। इनके साथ सम्बन्ध रखनेवाली पाँच महावृद्धाएँ हैं, उन सबकी प्रणवके उच्चारणपूर्वक पूजा करनी चाहिये। इनका पूजन सत्ताईस अथवा अट्ठाईसके भेदसे दो प्रकारका बताया गया है॥ १२-१४॥

चौकोर मण्डलमें दाहिनी ओर गणपतिका तथा बायीं ओर वटुकका पूजन करे। 'ॐ एं गूं क्रमगणपतये नमः।' इस मन्त्रसे क्रमगणपतिकी तथा 'ॐ वटुकाय नमः।' इस मन्त्रसे वटुककी पूजा करे। वायव्य आदि कोणोंमें चार गुरुओंका तथा अठारह षट्कोणोंमें सोलह नाथोंका पूजन करे। फिर मण्डलके चारों ओर ब्रह्मा आदि आठ देवताओंकी तथा मध्यभागमें नवमी कुब्जिका एवं कुलटा देवीकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार सदा इसी क्रमसे पूजा करे॥ १५-१७॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कुब्जिकाकी क्रम-पूजाका वर्णन' नामक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४३ ॥


* अङ्गन्यास-सम्बन्धी वाक्यकी योजना इस प्रकार है। ॐ ह्रीं काली काली हृदयाय नमः। ॐ ह्रीं दुष्टचाण्डालिकायै शिरसे स्वाहा। ॐ ह्रीं स्फें ह स ख क छ ड ॐकाराय भैरवाय शिखायै वषट्। ॐ ह्रीं भेलख्यै दूत्यै कवचाय हुम्। ॐ ह्रीं रक्तचण्डिकायै नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ गुह्यकुब्जिकायै अस्त्राय फट्। इन छः वाक्योंद्वारा क्रमशः हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र एवं सम्पूर्ण दिशाओंमें न्यास किया जाता है। इन्हीं वाक्योंमें 'हृदयाय नमः' के स्थानमें 'अङ्गुष्ठाभ्यां नमः', 'शिरसे'के स्थानमें 'तर्जनीभ्यां नमः', 'शिखायै'के स्थानमें 'मध्यमाभ्यां नमः', 'कवचाय'की जगह 'अनामिकाभ्यां नमः', 'नेत्रत्रयाय'के स्थानमें 'कनिष्ठिकाभ्यां नमः' तथा 'अस्त्राय'के स्थानमें 'करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः' कर दिया जाय तो ये करन्यास-सम्बन्धी वाक्य हो जायेंगे तथा इनका क्रमशः हाथके दोनों अङ्गुष्ठों, तर्जनियों, मध्यमाओं, अनामिकाओं, कनिष्ठिकाओं तथा करतल-कर-पृष्ठ-भागोंमें न्यास किया जायगा।