भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 878 में से

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पृष्ठ 334
  • अध्याय १४४ * ३०७

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एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय

कुब्जिकाकी पूजा-विधिका वर्णन

भगवान् महेश्वर कहते हैं— स्कन्द ! अब मैं धर्म, अर्थ, काम तथा विजय प्रदान करनेवाली श्रीमती कुब्जिकादेवीके मन्त्रका वर्णन करूँगा। परिवारसहित मूलमन्त्रसे उनकी पूजा करनी चाहिये॥ १॥

'ॐ ऐं ह्रीं श्रीं खैं हैं हसक्षमलवयं भगवति अम्बिके हां ह्रीं क्षीं क्षौं क्षूं क्रीं कुब्जिके हाम् ॐ डजनणमेऽअघोरमुखि व्रां छां छीं किलि किलि क्षौं विच्चे ख्यों श्रीं क्रोम्, ॐ होम्, ऐं वज्रकुब्जिनि स्त्रीं त्रैलोक्यकर्षिणि ह्रीं कामाङ्गाद्राविणि ह्रीं स्त्रीं महाक्षोभकारिणि ऐं ह्रीं क्षौं ऐं ह्रीं श्रीं फँ क्षौं नमो भगवति क्षौं कुब्जिके हों हों क्रैं डजणनमे अघोरमुखि छां छां विच्चे, ॐ किलि किलि।'— यह कुब्जिकामन्त्र है॥ २॥

करन्यास और अङ्गन्यास करके संध्या-वन्दन करे। वामा, ज्येष्ठा तथा रौद्री—ये क्रमशः तीन संध्याएँ कही गयी हैं॥ ३॥

कौली गायत्री

'कुलवागीशि विद्महे, महाकौलीति धीमहि। तन्नः कौली प्रचोदयात्।' 'कुलवागीश्वरि! हम आपको जानें। महाकौलीके रूपमें आपका चिन्तन करें। कौली देवी हमें शुभ कर्मोंके लिये प्रेरित करे'॥ ४॥

इसके पाँच मन्त्र हैं, जिनके आदिमें 'प्रणव' और अन्तमें 'नमः' पदका प्रयोग होता है। बीचमें पाँच नाथोंके नाम हैं; अन्तमें 'श्रीपादुकां पूजयामि'—इस पदको जोड़ना चाहिये। मध्यमें देवताका चतुर्थ्यन्त नाम जोड़ देना चाहिये। इस प्रकार ये पाँचों मन्त्र लगभग अठारह-अठारह अक्षरोंके होते हैं। इन सबके नामोंको षष्ठी विभक्तिके साथ संयुक्त करना चाहिये। इस तरह वाक्य-योजना करके इनके स्वरूप समझने चाहिये। मैं उन पाँचों नाथोंका वर्णन करता हूँ—कौलीशनाथ, श्रीकण्ठनाथ, कौलनाथ, गगनानन्दनाथ तथा तूर्णनाथ। इनकी पूजाका मन्त्र-वाक्य इस प्रकार होना चाहिये—'ॐ कौलीशनाथाय नमस्तस्मै पादुकां पूजयामि।' इनके साथ क्रमशः ये पाँच देवियाँ भी पूजनीय हैं—१—सुकला देवी, जो जन्मसे ही कुब्जा होनेके कारण 'कुब्जिका' कही गयी हैं; २—चटुला देवी, ३—मैत्रीशी देवी, जो विकराल रूपवाली हैं, ४—अतल देवी और ५—श्रीचन्द्रा देवी हैं। इन सबके नामके अन्तमें 'देवी' पद है। इनके पूजनका मन्त्र-वाक्य इस प्रकार होगा—

'ॐ सुकलादेव्यै नमस्तस्यै भगात्मपुङ्गण-देवमोहिनीं पादुकां पूजयामि।' दूसरी (चटुला) देवीकी पादुकाका यह विशेषण देना चाहिये—'अतीतभुवनानन्दरत्नाढ्यां पादुकां पूजयामि।' इसी तरह तीसरी देवीकी पादुकाका विशेषण 'ब्रह्मज्ञानाढ्यां', चौथीकी पादुकाका विशेषण 'कमलाढ्यां' तथा पाँचवींकी पादुकाका विशेषण 'परमविद्याढ्यां' देना चाहिये॥ ५-९॥

इस प्रकार विद्या, देवी और गुरु (उपर्युक्त पाँच नाथ)—इन तीनकी शुद्धि 'त्रिशुद्धि' कहलाती है। मैं तुमसे इसका वर्णन करता हूँ। गगनानन्द, चटुली, आत्मानन्द, पद्मानन्द, मणि, कला, कमल, माणिक्यकण्ठ, गगन, कुमुद, श्रीपद्म, भैरवानन्द, कमलदेव, शिव, भव तथा कृष्ण—ये सोलह नूतन सिद्ध हैं॥ १०-११$\frac{१}{२}$॥

चन्द्रपूर, गुल्म, शुभकाम, अतिमुक्तक, वीरकण्ठ, प्रयोग, कुशल, देवभोगक (अथवा भोगदायक), विश्वदेव, खड्गदेव, रुद्र, धाता, असि, मुद्रास्फोट, वंशपूर तथा भोज—ये सोलह