भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 878 में से

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पृष्ठ 339

३१२ * अग्निपुराण *


गया है॥४-५॥

(अब महेश्वरखण्डपद बताया जाता है—)

‘ॐ नमश्चामुण्डे ऊर्ध्वकेशि ज्वलितशिखरे विद्युज्जिह्वे तारकाक्षि पिङ्गलभुवे विकृतदंष्ट्रे कुब्जे, ॐ मांसशोणितसुरासवप्रिये हस हस ॐ नृत्य नृत्य ॐ विजृम्भय विजृम्भय ॐ मायात्रैलोक्यरूपसहस्रपरिवर्तिनीनामों बन्ध बन्ध, ॐ कुट्ट कुट्ट चिरि चिरि हिरि हिरि भिरि भिरि त्रासनि त्रासनि भ्रामणि भ्रामणि, ॐ द्रावणि द्रावणि क्षोभणि क्षोभणि मारणि मारणि संजीवनि संजीवनि हेरि हेरि गेरि गेरि घेरि घेरि, ॐ सुरि सुरि ॐ नमो मातृगणाय नमो नमो विच्चे’॥६॥

यह माहेश्वरखण्ड इकतीस पदोंका है। इसमें एक सौ एकहत्तर अक्षर हैं। इन तीनों खण्डोंको ‘त्रिखण्डी’ कहते हैं। इस त्रिखण्डी-मन्त्रके आदि और अन्तमें ‘ह्रें घों’ तथा पाँच प्रणव जोड़कर उसका जप एवं पूजन करना चाहिये। ‘ह्रें घों श्रीकुब्जिकायै नमः।’—इस मन्त्रको त्रिखण्डीके पदोंकी संधियोंमें जोड़ना चाहिये। अकुलादि त्रिमध्यग, कुलादि त्रिमध्यग, मध्यमादि त्रिमध्यग तथा पाद-त्रिमध्यग—ये चार प्रकारके मन्त्र-पिण्ड हैं। साढ़े तीन मात्राओंसे युक्त प्रणवको आदिमें लगाकर इनका जप अथवा इनके द्वारा यजन करना चाहिये। तदनन्तर भैरवके शिखा-मन्त्रका जप एवं पूजन करे—‘ॐ क्ष्णौं शिखाभैरवाय नमः’॥७—९$\frac{१}{२}$॥

‘स्खां स्कीं स्खें’—ये तीन सबीज त्र्यक्षर हैं। ‘ह्वां ह्रीं हैं’—ये निर्बीज त्र्यक्षर हैं। विलोम-क्रमसे ‘क्ष’ से लेकर ‘क’ तकके बत्तीस अक्षरोंकी वर्णमाला ‘अकुला’ कही गयी है। अनुलोम-क्रमसे गणना होनेपर वह ‘सकुला’ कही जाती है। शशिनी, भानुनी, पावनी, शिव, गन्धारी, ‘ण’ पिण्डाक्षी, चपला, गजजिह्विका, ‘म’ मृषा, भयसारा, मध्यमा, ‘फ’ अजरा, ‘य’ कुमारी, ‘न’ कालरात्री, ‘द’ संकटा, ‘ध’ कालिका, ‘फ’ शिवा, ‘ण’ भवघोरा, ‘ट’ बीभत्सा, ‘त’ विद्युता, ‘ठ’ विश्वम्भरा और शंसिनी अथवा ‘उ’ विश्वम्भरा, ‘आ’ शंसिनी, ‘द’ ज्वालामालिनी, कराली, दुर्जया, रङ्गी, वामा, ज्येष्ठा तथा रौद्री, ‘ख’ काली, ‘क’ कुलालम्बी, अनुलोमा, ‘द’ पिण्डिनी, ‘आ’ वेदिनी, ‘इ’ रूपी, ‘वै’ शान्तिमूर्ति एवं कलाकुला, ‘ऋ’ खङ्गिनी, ‘उ’ वलिता, ‘लृ’ कुला, ‘लॄ’ सुभगा, वेदनादिनी और कराली, ‘अं’ मध्यमा तथा ‘अः’ अपेतर्या—इन शक्तियोंका योगपीठपर क्रमशः पूजन करना चाहिये॥१०—१७॥

‘स्खां स्कीं स्खौं महाभैरवाय नमः।’—यह महाभैरवके पूजनका मन्त्र है। (ब्रह्माणी आदि आठ शक्तियोंके साथ पृथक् आठ-आठ शक्तियाँ और हैं, जिन्हें ‘अष्टक’ कहा गया है। उनका क्रमशः वर्णन किया जाता है।) अक्षोद्या, ऋक्षकणीं, राक्षसी, क्षपणा, क्षया, पिङ्गाक्षी, अक्षया और क्षेमा—ये ब्रह्माणीके अष्टक-दलमें स्थित होती हैं। इला, लीलावती, नीला, लङ्का, लङ्केश्वरी, लालसा, विमला और माला—ये माहेश्वरी-अष्टकमें स्थित हैं। हुताशना, विशालाक्षी, हुंकारी, वडवामुखी, हाहारवा, क्रूरा, क्रोधा तथा खरानना बाला—ये आठ कौमारीके शरीरसे प्रकट हुई हैं। इनका पूजन करनेपर ये सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनवाली होती हैं। सर्वज्ञा, तरला, तारा, ऋग्वेदा, हयानना, सारासारा, स्वयंग्राहा तथा शाश्वती—ये आठ शक्तियाँ वैष्णवीके कुलमें प्रकट हुई हैं॥१८—२२$\frac{१}{२}$॥

तालुजिह्वा, रक्ताक्षी, विद्युज्जिह्वा, करङ्गिणी, मेघनादा, प्रचण्डोग्रा, कालकर्णी तथा कलिप्रिया—ये वाराहीके कुलमें उत्पन्न हुई हैं। विजयकी इच्छावाले पुरुषको इनकी पूजा करनी चाहिये। चम्पा, चम्पावती, प्रचम्पा, ज्वलितानना, पिशाची, पिचुवक्त्रा तथा लोलुपा—ये इन्द्राणी शक्तिके कुलमें उत्पन्न हुई हैं। पावनी, याचनी, वामनी,