अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 340, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय १४७ * ३१३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
दमनी, विन्दुवेला, बृहत्कुक्षी, विद्युता तथा विश्वरूपिणी—ये चामुण्डाके कुलमें प्रकट हुई हैं और मण्डलमें पूजित होनेपर विजयदायिनी होती हैं॥ २३—२६ $\frac{१}{२}$ ॥
यमजिह्वा, जयन्ती, दुर्जया, यमान्तिका, विडाली, रेवती, जया और विजया—ये महालक्ष्मीके कुलमें उत्पन्न हुई हैं। इस प्रकार आठ अष्टकोंका वर्णन किया गया॥ २७-२८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'आठ अष्टक देवियोंका वर्णन' नामक
एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४६॥
एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय
गुह्यकुब्जिका, नवा त्वरिता तथा दूतियोंके मन्त्र एवं न्यास-पूजन आदिका वर्णन
भगवान् महेश्वर कहते हैं—स्कन्द ! (अब मैं गुह्य-कुब्जिका, नवा त्वरिता, दूती तथा त्वरिताके गुह्याङ्ग एवं तत्त्वोंका वर्णन करूँगा—) 'ॐ गुह्यकुब्जिके हुं फट् मम सर्वोपद्रवान् यन्त्रमन्त्रतन्त्रचूर्णप्रयोगादिकं येन कृतं कारितं कुरुते करिष्यति कारयिष्यति तान् सर्वान् हन हन द्रंष्ट्रा-करालिनि हैं ह्रीं हुं गुह्यकुब्जिकायै स्वाहा हौं, ॐ खें वों गुह्यकुब्जिकायै नमः।' (इस मन्त्रसे गुह्यकुब्जिकाका पूजन एवं जप करना चाहिये।) 'ह्रीं सर्वजनक्षोभणी जनानुकर्षिणी ॐ खें ख्यां ख्यां सर्वजनवशंकरी जनमोहनी, ॐ ख्यौं सर्वजनस्तम्भनी, ऐं खं खां क्षोभणी, ऐं त्रितत्त्वं बीजं श्रेष्ठं कुले पञ्चाक्षरी, फं श्रीं क्षीं ह्रीं क्षें वच्छे क्षे क्षे हूं फट्, ह्रीं नमः। ॐ हां वच्छे क्षे क्षें क्षौं ह्रीं फट्'॥ १—४॥
यह 'नवा त्वरिता' बतायी गयी है। इसे बारंबार जानना (जपना) चाहिये। इसकी पूजा की जाय तो यह विजयदायिनी होती है। 'हौं सिंहाय नमः।' इस मन्त्रसे आसनकी पूजा करके देवीको सिंहासन समर्पित करे। 'ह्रीं क्षे हृदयाय नमः।' बोलकर हृदयका स्पर्श करे। 'वच्छे शिरसे स्वाहा।' बोलकर सिरका स्पर्श करे—इस प्रकार यह 'त्वरितामन्त्र'का शिरोन्यास बताया गया है। 'क्षें ह्रीं शिखायै वषट्।' ऐसा कहकर शिखाका स्पर्श करे। 'क्षें कवचाय हुम्।' कहकर दोनों भुजाओंका स्पर्श करे। 'हूं नेत्रत्रयाय वौषट्।' कहकर दोनों नेत्रोंका तथा ललाटके मध्यभागका स्पर्श करे। 'ह्रीं अस्त्राय फट्।' कहकर ताली बजाये। ह्रींकारी, खेचरी, चण्डा, छेदनी, क्षोभणी, क्रिया, क्षेमकारी, हुंकारी तथा फट्कारी—ये नौ शक्तियाँ हैं॥ ५—७ $\frac{१}{२}$ ॥
अब दूतियोंका वर्णन करता हूँ। इन सबका पूर्व आदि दिशाओंमें पूजन करना चाहिये—'ह्रीं नले बहुतुण्डे च खगे ह्रीं खेचरे ज्वालिनि ज्वल ख खे छ च्छे शवविभीषणे चच्छे चण्डे छेदनि करालि ख खे छे खे खरहाङ्गी ह्रीं क्षे वक्षे कपिले ह क्षे हूं कूं तेजोवति रौद्रि मातः ह्रीं फे वे फे फे वक्त्रे वरी फे पुटि पुटि घोरे हूं फट् ब्रह्मवेतालि मध्ये।' (यह दूती-मन्त्र है) ॥ ८-९ ॥
अब पुनः त्वरिताके गुह्याङ्गों तथा तत्त्वोंका वर्णन करता हूँ। 'हौं हूं हः हृदयाय नमः।' इसका हृदयमें न्यास करे। 'ह्रीं हः शिरसे स्वाहा।' ऐसा कहकर सिरमें न्यास करे। 'फां ज्वल ज्वल शिखायै वषट्।' कहकर शिखामें, 'इले हं हूं कवचाय हुम्।' कहकर दोनों भुजाओंमें 'क्रों क्षूं श्रीं नेत्रत्रयाय वौषट्।' बोलकर नेत्रोंमें तथा ललाटके मध्यभागमें न्यास करे। 'क्षौं अस्त्राय फट्।' कहकर दोनों हाथोंसे ताली बजाये अथवा