भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 391

३६४ * अग्निपुराण *


एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय

प्रतिपदा तिथिके व्रत

अग्निदेव कहते हैं— अब मैं आपसे प्रतिपद् आदि तिथियोंके व्रतोंका वर्णन करूँगा, जो सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाले हैं। कार्तिक, आश्विन और चैत्र मासमें कृष्णपक्षकी प्रतिपद् ब्रह्माजीकी तिथि है। पूर्णिमाको उपवास करके प्रतिपद्को ब्रह्माजीका पूजन करे। पूजा 'ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः।'—इस मन्त्रसे अथवा गायत्री-मन्त्रसे करनी चाहिये। यह व्रत एक वर्षतक करे। ब्रह्माजीके सुवर्णमय विग्रहका पूजन करे, जिसके दाहिने हाथोंमें स्फटिकाक्षकी माला और स्रुवा हों तथा बायें हाथोंमें स्रुक् एवं कमण्डलु हों। साथ ही लंबी दाढ़ी और सिरपर जटा भी हो। यथाशक्ति दूध चढ़ावे और मनमें यह उद्देश्य रखे कि 'ब्रह्माजी मुझपर प्रसन्न हों।' यों करनेवाला मनुष्य निष्पाप होकर स्वर्गमें उत्तम भोग भोगता है और पृथ्वीपर धनवान् ब्राह्मणके रूपमें जन्म लेता है॥ १-४॥

अब 'धन्यव्रत'का वर्णन करता हूँ। इसका अनुष्ठान करनेसे अधन्य भी धन्य हो जाता है। पहले मार्गशीर्ष-मासकी प्रतिपद्को उपवास करके रातमें 'अग्नये नमः।'—इस मन्त्रसे होम और अग्निकी पूजा करे। इसी प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक मासकी प्रतिपद्को अग्निकी आराधना करनेसे मनुष्य सब सुखोंका भागी होता है।

प्रत्येक प्रतिपदाको एकभुक्त (दिनमें एक समय भोजन करके) रहे। सालभरमें व्रतकी समाप्ति होनेपर ब्राह्मण कपिला गौ दान करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य 'वैश्वानर'-पदको प्राप्त होता है। यह 'शिखिव्रत' कहलाता है॥ ५-७॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रतिपद्-व्रतोंका वर्णन' नामक एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७६॥


एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय

द्वितीया तिथिके व्रत

अग्निदेव कहते हैं— अब मैं द्वितीयाके व्रतोंका वर्णन करूँगा, जो भोग और मोक्ष आदि देनेवाले हैं। प्रत्येक मासकी द्वितीयाको फूल खाकर रहे और दोनों अश्विनीकुमार नामक देवताओंकी पूजा करे। एक वर्षतक इस व्रतके अनुष्ठानसे सुन्दर स्वरूप एवं सौभाग्यकी प्राप्ति होती है और अन्तमें व्रती पुरुष स्वर्गलोकका भागी होता है। कार्तिकमें शुक्लपक्षकी द्वितीयाको यमकी पूजा करे। फिर एक वर्षतक प्रत्येक शुक्ल-द्वितीयाको उपवासपूर्वक व्रत रखे। ऐसा करनेवाला पुरुष स्वर्गमें जाता है, नरकमें नहीं पड़ता॥ १-२$\frac{१}{२}$॥

अब 'अशून्य-शयन' नामक व्रत बतलाता हूँ, जो स्त्रियोंको अवैधव्य (सदा सुहाग) और पुरुषोंको पत्नी-सुख आदि देनेवाला है। श्रावण मासके कृष्णपक्षकी द्वितीयाको इस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। (इस व्रतमें भगवान्‌से इस प्रकार प्रार्थना की जाती है—) 'वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न धारण करनेवाले श्रीकान्त! आप लक्ष्मीजीके धाम और स्वामी हैं; अविनाशी एवं सनातन परमेश्वर हैं। आपकी कृपासे धर्म, अर्थ और काम प्रदान करनेवाला मेरा गार्हस्थ्य-आश्रम नष्ट न हो। मेरे घरके अग्निहोत्रकी आग कभी न बुझे, गृहदेवता कभी अदृश्य न हों। मेरे पितर