अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 392, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय १७७ * ३६५
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नाशसे बचे रहें और मुझसे दाम्पत्य-भेद न हो। जैसे आप कभी लक्ष्मीजीसे विलग नहीं होते, उसी प्रकार मेरा भी पत्नीके साथका सम्बन्ध कभी टूटने या छूटने न पावे। वरदानी प्रभो! जैसे आपकी शय्या कभी लक्ष्मीजीसे सूनी नहीं होती, मधुसूदन! उसी प्रकार मेरी शय्या भी पत्नीसे सूनी न हो।' इस प्रकार व्रत आरम्भ करके एक वर्षतक प्रतिमासकी द्वितीयाको श्रीलक्ष्मी और विष्णुका विधिवत् पूजन करे। शय्या और फलका दान भी करे। साथ ही प्रत्येक मासमें उसी तिथिको चन्द्रमाके लिये मन्त्रोच्चारणपूर्वक अर्घ्य दे। (अर्घ्यका मन्त्र—) 'भगवान् चन्द्रदेव! आप गगन-प्राङ्गणके दीपक हैं। क्षीरसागरके मन्थनसे आपका आविर्भाव हुआ है। आप अपनी प्रभासे सम्पूर्ण दिङ्मण्डलको प्रकाशित करते हैं। भगवती लक्ष्मीके छोटे भाई! आपको नमस्कार है।'* तत्पश्चात् 'ॐ श्रं श्रीधराय नमः।'— इस मन्त्रसे सोमस्वरूप श्रीहरिका पूजन करे। 'घं टं हं सं श्रियै नमः।'— इस मन्त्रसे लक्ष्मीजीकी तथा 'दशरूपमहात्मने नमः।'— इस मन्त्रसे श्रीविष्णुकी पूजा करे। रातमें घीसे हवन करके ब्राह्मणको शय्या-दान करे। उसके साथ दीप, अन्नसे भरे हुए पात्र, छाता, जूता, आसन, जलसे भरा कलश, श्रीहरिकी प्रतिमा तथा पात्र भी ब्राह्मणको दे। जो इस प्रकार उक्त व्रतका पालन करता है, वह भोग और मोक्षका भागी होता है॥ ३—१२$\frac{१}{२}$॥
अब 'कान्तिव्रत' का वर्णन करता हूँ। इसका प्रारम्भ कार्तिक शुक्ला द्वितीयाको करना चाहिये। दिनमें उपवास और रातमें भोजन करे। इसमें बलराम तथा भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करे। एक वर्षतक ऐसा करनेसे व्रती पुरुष कान्ति, आयु और आरोग्य आदि प्राप्त करता है॥ १३-१४॥
अब मैं 'विष्णुव्रत' का वर्णन करूँगा, जो मनोवाञ्छित फलको देनेवाला है। पौष मासके शुक्लपक्षकी द्वितीयासे आरम्भ करके लगातार चार दिनोंतक इस व्रतका अनुष्ठान किया जाता है। पहले दिन सरसों-मिश्रित जलसे स्नानका विधान है। दूसरे दिन काले तिल मिलाये हुए जलसे स्नान बताया गया है। तीसरे दिन वचा या वच नामक ओषधिसे युक्त जलके द्वारा तथा चौथे दिन सर्वौषधि-मिश्रित जलके द्वारा स्नान करना चाहिये। मुरा (कपूर-कचरी), वचा (वच), कुष्ठ (कूठ), शैलेय (शिलाजीत या भूरिछरीला), दो प्रकारकी हल्दी (गाँठ हल्दी और दारुहल्दी), कचूर, चम्पा और मोथा—यह 'सर्वौषधि-समुदाय' कहा गया है। पहले दिन 'श्रीकृष्णाय नमः।', दूसरे दिन 'अच्युताय नमः।', तीसरे दिन 'अनन्ताय नमः।' और चौथे दिन 'हृषीकेशाय नमः।' इस नाम-मन्त्रसे क्रमशः भगवान्के चरण, नाभि, नेत्र एवं मस्तकपर पुष्प समर्पित करते हुए पूजन करना चाहिये। प्रतिदिन प्रदोषकालमें चन्द्रमाको अर्घ्य देना चाहिये। पहले दिनके अर्घ्यमें 'शशिने नमः।', दूसरे दिनके अर्घ्यमें 'चन्द्राय नमः।', तीसरे दिन 'शशाङ्काय नमः।' और चौथे दिन 'इन्दवे नमः।' का उच्चारण करना चाहिये। रातमें जबतक चन्द्रमा दिखायी देते हों, तभीतक मनुष्यको भोजन कर लेना चाहिये। व्रती पुरुष छः मास या एक सालतक इस व्रतका पालन करके सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलको प्राप्त कर लेता है। पूर्वकालमें राजाओंने, स्त्रियोंने और देवता आदिने भी इस व्रतका अनुष्ठान किया था॥ १५-२०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'द्वितीया-सम्बन्धी व्रतका वर्णन' नामक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७७॥
* गगनाङ्गणसंदीप दुग्धाब्धिमथनोद्भव॥ भाभासितदिगाभोग रमानुज नमोऽस्तु ते। (अग्नि० १७७। ९-१०)