अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 511, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें४८४ * अग्निपुराण *
सदा तीन हाथके ही धनुषको ग्रहण करनेका विधान है। घोड़े, रथ और हाथीपर श्रेष्ठ धनुषका ही प्रयोग करनेका विधान किया गया है॥ ३६-३७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'धनुर्वेदका वर्णन' नामक दो सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४९॥
दो सौ पचासवाँ अध्याय
लक्ष्यवेधके लिये धनुष-बाण लेने और उनके समुचित प्रयोग करनेकी शिक्षा तथा वेध्यके विविध भेदोंका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं— ब्रह्मन्! द्विजको चाहिये कि पूरी लम्बाईवाले धनुषका निर्माण कराकर, उसे अच्छी तरह धो-पोंछकर यज्ञभूमिमें स्थापित करे तथा गदा आदि आयुधोंको भलीभाँति साफ करके रखे॥ १॥
तत्पश्चात् बाणोंका संग्रह करके, कवच-धारणपूर्वक एकाग्रचित्त हो, तूणीर ले, उसे पीठकी ओर दाहिनी काँखके पास दृढ़ताके साथ बाँधे। ऐसा करनेसे विलक्ष्य बाण भी उस तूणीरमें सुस्थिर रहता है। फिर दाहिने हाथसे तूणीरके भीतरसे बाणको निकाले। उसके साथ ही बायें हाथसे धनुषको वहाँसे उठा ले और उसके मध्यभागमें बाणका संधान$^१$ करे॥ २-४॥
चित्तमें विषादको न आने दे—उत्साह-सम्पन्न हो, धनुषकी डोरीपर बाणका पुङ्खभाग रखे, फिर 'सिंहकर्ण'$^२$ नामक मुष्टिद्वारा डोरीको पुङ्खके साथ ही दृढ़तापूर्वक दबाकर समभावसे संधान करे और बाणको लक्ष्यकी ओर छोड़े। यदि बायें हाथसे बाणको चलाना हो तो बायें हाथमें बाण ले और दाहिने हाथसे धनुषकी मुट्ठी पकड़े। फिर प्रत्यञ्चापर बाणको इस तरह रखे कि खींचनेपर उसका फल या पुङ्ख बायें कानके समीप आ जाय। उस समय बाणको बायें हाथकी (तर्जनी और अङ्गुष्ठके अतिरिक्त) मध्यमा अङ्गुलीसे भी धारण किये रहे। बाण चलानेकी विधिको जाननेवाला पुरुष उपर्युक्त मुष्टिके द्वारा धनुषको दृढ़तापूर्वक पकड़कर, मनको दृष्टिके साथ ही लक्ष्यगत करके बाणको शरीरके दाहिने भागकी ओर रखते हुए लक्ष्यकी ओर छोड़े॥ ५-७॥
धनुषका दण्ड इतना बड़ा हो कि भूमिपर खड़ा करनेपर उसकी ऊँचाई ललाटतक आ जाय। उसपर लक्ष्यवेधके लिये सोलह अङ्गुल लंबे चन्द्रक (बाणविशेष)-का संधान करे और उसे भलीभाँति खींचकर लक्ष्यपर प्रहार करे। इस तरह एक बाणका प्रहार करके फिर तत्काल ही तूणीरसे अङ्गुष्ठ एवं तर्जनी अङ्गुलिद्वारा बारंबार बाण निकाले। उसे मध्यमा अङ्गुलिसे भी दबाकर काबूमें करे और शीघ्र ही दृष्टिगत लक्ष्यकी ओर चलावे। चारों ओर तथा दक्षिण ओर लक्ष्यवेधका क्रम जारी रखे। योद्धा पहलेसे ही चारों ओर बाण
$^१$. 'वासिष्ठ-धनुर्वेद'के अनुसार 'संधान' तीन प्रकारके हैं—अध, ऊर्ध्व और सम। इनका क्रमशः तीन कार्योंमें ही उपयोग करना चाहिये। दूरके लक्ष्यको मार गिराना हो तो 'अधःसंधान' उपयोगी होता है। लक्ष्य निश्चल हो तो 'समसंधान' से उसका वेध करना चाहिये तथा चञ्चल लक्ष्यका वेध करनेके लिये 'ऊर्ध्वसंधान'से काम लेना चाहिये।
$^२$. महर्षि वसिष्ठकृत 'धनुर्वेद-संहिता' में 'मुष्टि' के पाँच भेद बताये गये हैं—पताका, वज्रमुष्टि, सिंहकर्ण, मत्सरी तथा काकतुण्डी। वहीं 'सिंहकर्ण'नामक मुष्टिका लक्षण इस प्रकार दिया गया है—'अङ्गुष्ठमध्यदेशे तु तर्जन्यग्रं शुभं स्थितम्। सिंहकर्णः स विज्ञेयो दृढ़लक्ष्यस्य वेधने॥' अर्थात् 'धनुष पकड़ते समय अङ्गुष्ठके मध्यदेशमें तर्जनीके अग्रभागको भलीभाँति टिकाकर जो मुष्टि बाँधी जाती है, उसका नाम 'सिंहकर्ण' जानना चाहिये। वह दृढ़लक्ष्यके वेधके लिये उपयोगी है।'