अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 512, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय २५० * ४८५
मारकर सब ओरके लक्ष्यको वेधनेका अभ्यास करे॥ ८—१०॥
तदनन्तर वह तीक्ष्ण, परावृत्त, गत, निम्न, उन्नत तथा क्षिप्र वेधका अभ्यास बढ़ावे।$^१$ वेध्य लक्ष्यके ये जो उपर्युक्त स्थान हैं, इनमें सत्त्व (बल एवं धैर्य)-का पुट देते हुए विचित्र एवं दुस्तर रीतिसे सैकड़ों बार हाथसे बाणोंके निकालने एवं छोड़नेकी क्रियाद्वारा धनुषका तर्जन करे—उसपर टङ्कार$^२$ दे॥ ११-१२॥
विप्रवर! उक्त वेध्यके अनेक भेद हैं। पहले तो दृढ़, दुष्कर तथा चित्र दुष्कर—ये वेध्यके तीन भेद हैं। ये तीनों ही भेद दो-दो प्रकारके होते हैं। ‘नतनिम्न’ और ‘तीक्ष्ण’—ये ‘दृढ़वेध्य’के दो भेद हैं। ‘दुष्करवेध्य’के भी ‘निम्न’ और ‘ऊर्ध्वगत’—ये दो भेद कहे गये हैं तथा ‘चित्रदुष्कर’ वेध्यके ‘मस्तकपन’ और ‘मध्य’—ये दो भेद बताये गये हैं॥ १३-१४$\frac{१}{२}$॥
इस प्रकार इन वेध्यगणोंको सिद्ध करके वीर पुरुष पहले दायें अथवा बायें पार्श्वसे शत्रुसेनापर चढ़ाई करे। इससे मनुष्यको अपने लक्ष्यपर विजय प्राप्त होती है। प्रयोक्ता पुरुषोंने वेध्यके विषयमें यही विधि देखी और बतायी है॥ १५-१६॥
योद्धाके लिये उस वेध्यकी अपेक्षा भ्रमणको अधिक उत्तम बताया गया है। वह लक्ष्यको अपने बाणके पुङ्खभागसे आच्छादित करके उसकी ओर दृढ़तापूर्वक शर-संधान करे। जो लक्ष्य भ्रमणशील, अत्यन्त चञ्चल और सुस्थिर हो, उसपर सब ओरसे प्रहार करे। उसका भेदन और छेदन करे तथा उसे सर्वथा पीड़ा पहुँचाये॥ १७-१८॥
कर्मयोगके विधानका ज्ञाता पुरुष इस प्रकार समझ-बूझकर उचित विधिके आचरण (अनुष्ठान) करे। जिसने मन, नेत्र और दृष्टिके द्वारा लक्ष्यके साथ एकता-स्थापनकी कला सीख ली है, वह योद्धा यमराजको भी जीत सकता है। (पाठान्तरके अनुसार वह श्रमको जीत लेता है—युद्ध करते-करते थकता नहीं।)॥ १९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘धनुर्वेदका कथन’ नामक दो सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५०॥
पाद-टिप्पणियाँ:
१. 'वासिष्ठ-धनुर्वेद'में 'वेध' तीन प्रकारका बताया गया है—पुष्पवेध, मत्स्यवेध और मांसवेध। फलरहित बाणसे फूलको वेधना 'पुष्पवेध' है। फलयुक्त बाणसे मत्स्यका भेदन करना 'मत्स्यवेध' है। तदनन्तर मांसके प्रति लक्ष्यका स्थिरीकरण 'मांसवेध' कहलाता है। इन वेधोंके सिद्ध हो जानेपर मनुष्योंके बाण उनके लिये सर्वसाधक होते हैं—'एतैर्विंधैः कृतैः पुंसां शराः स्युः सर्वसाधकाः।'
२. 'वीरचिन्तामणि'में 'श्रमकरण' (धनुष चलानेके परिश्रमपूर्वक अभ्यास)-के प्रकरणमें इस तरहकी बातें लिखी हैं। यथा—पहले धनुषको चढ़ाकर शिखा बाँध ले, पूर्वोक्त स्थानभेदमेंसे किसी एकका आश्रय ले, खड़ा हो, बाणके ऊपर हाथ रखे। धनुषके तोलनपूर्वक उसे बायें हाथमें ले। तदनन्तर बाणका आदान करके संधान करे। एक बार धनुषकी प्रत्यञ्चा खींचकर भूमिवेधन करे। पहले भगवान् शंकर, विघ्नराज गणेश, गुरुदेव तथा धनुष-बाणको नमस्कार करे। फिर बाण खींचनेके लिये गुरुसे आज्ञा माँगे। प्राणवायुके प्रयत्न (पूरक प्राणायाम)-के साथ बाणसे धनुषको पूरित करे। कुम्भक प्राणायामके द्वारा उसे स्थिर करके रेचक प्राणायाम एवं हुंकारके साथ वायु एवं बाणका विसर्जन करे। सिद्धिकी इच्छावाले धनुर्धर योद्धाको यह अभ्यास-क्रिया अवश्य करनी चाहिये। छः मासमें 'मुष्टि' सिद्ध होती है और एक वर्षमें 'बाण'। 'नाराच' तो उसीके सिद्ध होते हैं, जिसपर भगवान् महेश्वरकी कृपा हो जाय। अपनी सिद्धि चाहनेवाला योद्धा बाणको फूलकी भाँति धारण करे। फिर धनुषको सर्पकी भाँति दबावे तथा लक्ष्यका बहुमूल्य धनकी भाँति चिन्तन करे, इत्यादि।