अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 516, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २५३ * ४८९
'प्रतिपक्ष' कहलाता है। 'भूत' और 'छल'—इनका अनुसरण करनेसे यह दो गतियोंसे युक्त माना जाता है ॥ ३—१२ ॥
कैसा ऋण देय है, कैसा ऋण अदेय है—कौन दे, किस समय दे, किस प्रकारसे दे, ऋण देनेकी विधि या पद्धति क्या है तथा उसे लेने या वसूल करनेका विधान क्या है? इन सब बातोंका विचार$^१$ 'ऋणादान' कहा गया है। जब कोई मनुष्य किसीपर विश्वास करके शङ्कारहित होकर उसके पास अपना कोई द्रव्य धरोहरके तौरपर देता है, तब उसे विद्वान् लोग 'निक्षेप' नामक व्यवहारपद कहते हैं। जब वणिक् आदि अनेक मनुष्य मिलकर सहकारिता या साझेदारीके तौरपर कोई कार्य करते हैं तो उसको 'सम्भूयसमुत्थान' संज्ञक विवादपद बतलाते हैं। यदि कोई मनुष्य पहले विधिपूर्वक किसी द्रव्यका दान देकर पुन: उसे रख लेनेकी इच्छा करे, तो वह 'दत्ताप्रदानिक' नामक विवादपद कहा जाता है। जो सेवा स्वीकार करके भी उसका सम्पादन नहीं करता या उपस्थित नहीं होता, उसका यह व्यवहार 'अभ्युपेत्य अशूश्रूषा' नामक विवादपद होता है। भृत्योंको वेतन देने-न-देनेसे सम्बन्ध रखनेवाला विवाद 'वेतनस्यानपाकर्म' माना गया है। धरोहरमें रखे हुए या खोये हुए पराये द्रव्यको पाकर अथवा चुराकर स्वामीके परोक्षमें बेचा जाय तो यह 'अस्वामिविक्रय' नामक विवादपद है। यदि कोई व्यापारी किसी पण्य-द्रव्यका मूल्य लेकर विक्रय कर देनेके बाद भी खरीददारको वह द्रव्य नहीं देता है तो उसको 'विक्रीयासम्प्रदान' नामक विवादपद कहा जाता है। यदि ग्राहक किसी वस्तुका मूल्य देकर खरीदनेके बाद उस वस्तुको ठीक नहीं समझता, तो उसका यह आचरण 'क्रीतानुशय' नामक विवादपद कहलाता है। यदि ग्राहक या खरीददार मूल्य देकर वस्तुको खरीद लेनेके बाद यह समझता है कि यह खरीददारी ठीक नहीं है, (अतः वह वस्तु लौटाकर दाम वापस लेना चाहता है) तो उसी दिन यदि वह लौटा दे तो विक्रेता उसका मूल्य पूरा-पूरा लौटा दे, उसमें काट-छाट न करे$^२$ ॥ १३—२१ ॥
पाखण्डी और नैगम आदिकी स्थितिको 'समय' कहते हैं। इससे सम्बद्ध विवादपदको 'समयानपा-कर्म' कहा जाता है। (याज्ञवल्क्यने इसे 'संविद्-व्यतिक्रम' नाम दिया है।) क्षेत्रके अधिकारको लेकर सेतु, केदार (मेड़) और क्षेत्र
१. ऋणादानके सात प्रकार हैं— १-अमुक प्रकारका ऋण 'देय' है, २-अमुक प्रकारका ऋण 'अदेय' है, ३-अमुक अधिकारीको ऋण देनेका अधिकार है, ४-अमुक समयमें ऋण देना चाहिये, ५-इस प्रकारसे ऋण दिया जाना चाहिये—ये पाँच अधमर्ण (ऋण लेनेवाले) व्यक्तिको लक्ष्य करके विचारणीय हैं और शेष दो बातें साहूकारके लिये विचारणीय हैं—६-साहूकार किस विधानसे ऋण दे तथा ७-किस विधानसे उसको वसूल करे। इन्हीं सातों बातोंको इस श्लोकमें स्पष्ट किया गया है। 'नारद-स्मृति' में भी इसका इसी रूपमें उल्लेख हुआ है। इन सब बातोंके विचारपूर्वक जो ऋणका आदान-प्रदान होता है, उसे 'ऋणादान' नामक व्यवहारपद समझना चाहिये।
२. 'नारदस्मृति' में भी इन श्लोकोंका ठीक ऐसा ही पाठ है। वहाँ इस विषयमें कुछ अधिक बातें बतायी गयी हैं, जो इस प्रकार हैं—
द्वितीयेऽह्नि ददत् क्रेता मूल्यात् त्रिंशांशमाहरेत्। द्विगुणं तु तृतीयेऽह्नि परतः क्रेतुरेव तत्॥
'यदि ग्राहक नापसंद माल (पहले ही दिन न लौटाकर) दूसरे दिन लौटावे तो वह वस्तुके पूरे मूल्यका $\frac{१}{३}$ अर्थात् $३\frac{१}{३}$ प्रतिशत हरजानेके तौरपर विक्रेताको दे। यदि वह तीसरे दिन लौटाये तो इससे दूनी रकम हर्जानेके तौरपर दे। इसके बाद 'अनुशय'का अधिकार समाप्त हो जाता है। फिर तो ग्राहकको माल लेना ही पड़ेगा।'
याज्ञवल्क्य और मिताक्षराकारकी दृष्टिमें यह नियम बीज आदिसे भिन्न वस्तुओंपर लागू होता है। बीज, लोहा, बैल-घोड़े आदि वाहन, मोती-मूँगा आदि रत्न, दासी, दूध देनेवाली भैंस आदि तथा दास—इनके परीक्षणका काल अधिक है। यथा—बीजके परीक्षणका समय दस दिन, लोहेके एक दिन, बैल आदिके पाँच दिन, रत्नके एक सप्ताह, दासीके एक मास, दूध देनेवाली भैंस आदिके तीन दिन तथा दासके परीक्षणका समय पंद्रह दिनतक है। इस समयके भीतर ही ये ठीक न जँचें तो इनको लौटाया जा सकता है; अन्यथा नहीं। मनुने गृह, क्षेत्र आदि वस्तुओंको दस दिनके अंदर ही लौटानेका आदेश दिया है। इसके बाद लौटानेका अधिकार नहीं रह जाता है।