अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 517, कुल 878 में से
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सीमाके घटने-बढ़नेके विषयमें जो विवाद होता है, वह 'क्षेत्रज' कहा गया है। जो स्त्री और पुरुषके विवाहादिसे सम्बन्धित विवादपद है, उसे 'स्त्री-पुंस योग' कहते हैं। पुत्रगण पैतृक धनका जो विभाजन करते हैं, विद्वानोंने उसको 'दायभाग' नामक व्यवहारपद माना है। बलके अभिमानसे जो कर्म सहसा किया जाता है, उसे 'साहस' नामक विवादपद बतलाया गया है। किसीके देश, जाति एवं कुल आदिपर दोषारोपण करके प्रतिकूल अर्थसे युक्त व्यंग्यपूर्ण वचन कहना 'वाक्-पारुष्य' माना गया है। दूसरेके शरीरपर हाथ-पैर या आयुधसे प्रहार अथवा अग्नि आदिसे आघात करना 'दण्ड-पारुष्य' कहलाता है। पासे, वध्र (चमड़ेकी पट्टी) और शलाका (हाथीदाँतकी गोटियों)-से जो क्रीडा होती है, उसको 'द्यूत' कहा जाता है। (घोड़े आदि) पशुओं और (बटेर आदि) पक्षियोंसे होनेवाली क्रीडाको 'प्राणिद्यूत' समझना चाहिये। राजाकी आज्ञाका उल्लङ्घन और उसका कार्य न करना यह 'प्रकीर्णक' नामक व्यवहारपद जानना चाहिये। यह विवादपद राजापर आश्रित है। इस प्रकार व्यवहार अठारह पदोंसे युक्त है। इनके भी सौ भेद माने गये हैं। मनुष्योंकी क्रियाके भेदसे यह सौ शाखाओंवाला कहा जाता है॥ २२-३१॥
राजा क्रोधरहित होकर ज्ञान-सम्पन्न ब्राह्मणोंके साथ व्यवहारका विचार करे और ऐसे मनुष्योंको सभासद बनाये, जो वेदवेत्ता, लोभरहित और शत्रु एवं मित्रको समान दृष्टिसे देखनेवाले हों। यदि राजा कार्यवश स्वयं व्यवहारका विचार न कर सके तो सभासदोंके साथ विद्वान् ब्राह्मणको नियुक्त करे। यदि सभासद राग, लोभ या भयसे धर्मशास्त्र एवं आचारके विरुद्ध कार्य करे, तो राजा प्रत्येक सभासदपर अलग-अलग विवादसे दुगुना अर्थदण्ड करे। यदि कोई मनुष्य दूसरोंके द्वारा धर्मशास्त्र और समयाचारके विरुद्ध मार्गसे धर्षित किया गया हो और वह राजाके समीप आवेदन करे तो उसको 'व्यवहार' (पद$^१$) कहते हैं। वादीने जो निवेदन किया हो, राजा उसको वर्ष, मास, पक्ष, दिन, नाम और जाति आदिसे चिह्नित करके प्रतिवादीके सामने लिख ले। (वादीके आवेदन या बयानको 'भाषा', 'प्रतिज्ञा' अथवा 'पक्ष' कहते हैं।) प्रतिवादी वादीका आवेदन सुनकर उसके सामने ही उसका उत्तर$^२$ लिखावे। तब वादी उसी समय अपने निवेदनका प्रमाण लिखावे। निवेदनके प्रमाणित हो जानेपर वादी जीतता है, अन्यथा पराजित हो जाता है॥ ३२-३७॥
इस प्रकार विवादमें चार पाद (अंश$^३$)-से युक्त व्यवहार दिखाया गया है। जबतक अभियुक्तके वर्तमान अभियोगका निर्णय (फैसला) न हो जाय, तबतक उसके ऊपर दूसरे अपराधका मामला न चलाये। जिसपर किसी दूसरेने अभियोग कर दिया हो, उसपर भी कोई वादी दूसरा अभियोग न चलावे। आवेदनके समय जो कुछ कहा गया हो, अपने उस कथनके विपरीत (विरुद्ध) कुछ न कहे। (हिंसा आदि)-का अपराध बन जाय तो पूर्व अभियोगका फैसला होनेके पहले ही मामला चलाया जा सकता है॥ ३८-३९॥
सभासदोंसहित सभापति या प्राड्विवाकको चाहिये कि वह वादी और प्रतिवादी दोनोंके सभी विवादोंमें जो निर्णयका कार्य है, उसके सम्पादनमें समर्थ पुरुषको 'प्रतिभू' बनाये।$^४$ अर्थिके
१. मिताक्षराकारने व्यवहारके सात अङ्ग बताये हैं। यथा—प्रतिज्ञा, उत्तर, संशय, हेतु-परामर्श, प्रमाण, निर्णय एवं प्रयोजन।
२. उत्तरके चार भेद हैं—'सम्प्रतिपत्ति', 'मिथ्या', 'प्रत्यवस्कन्दन' तथा 'प्राङ्न्याय'। उत्तर वह अच्छा माना गया है, जो पक्षके खण्डनमें समर्थ, न्यायसंगत, संदेहरहित, पूर्वापर-विरोधसे वर्जित तथा सुबोध हो—उसे समझनेके लिये व्याख्या अथवा टीका-टिप्पणी न करनी पड़े।
३. १-भाषापाद, २-उत्तरपाद, ३-क्रियापाद और ४-साध्य-सिद्धिपाद।
४. प्रतिभूके अभावमें वेतन देकर रक्षक-पुरुषोंकी नियुक्ति करनी चाहिये। जैसा कि कात्यायनका कथन है—
अथ चेत् प्रतिभूर्नास्ति कार्ययोग्यस्तु वादिनः। स रक्षितो दिनस्यान्ते दद्याद् भृत्याय वेतनम् ॥