अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 534, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २५७ * ५०७
कोयले, धानकी भूसी तथा बरगद आदिके वृक्षोंद्वारा सीमाका निश्चय$^१$ करें। वह सीमा कैसी हो, इस प्रश्नके उत्तरमें कहते हैं—वह सीमा सेतु (पुल), वल्मीक (बाँबी), चैत्य (पत्थरके चबूतरे या देवस्थान), बाँस और बालू आदिसे उपलक्षित होनी चाहिये$^२$॥ १-२ ॥
सामन्त अथवा निकटवर्ती ग्रामवाले चार, आठ अथवा दस मनुष्य लाल फूलोंकी माला और लाल वस्त्र धारण करके, सिरपर मिट्टी रखकर सीमाका निर्णय करें। सीमा-विवादमें सामन्तोंके असत्य-भाषण करनेपर राजा सबको अलग-अलग मध्यम साहसका दण्ड दे। सीमाका ज्ञान करानेवाले चिह्नोंके अभावमें राजा ही सीमाका प्रवर्तक होता है। आराम (बाग), आयतन (मन्दिर या खलिहान), ग्राम, वापी या कूप, उद्यान (क्रीडावन), गृह और वर्षाके जलको प्रवाहित करनेवाले नाले आदिकी सीमाके निर्णयमें भी यही विधि जाननी चाहिये। मर्यादाका भेदन, सीमाका उल्लङ्घन एवं क्षेत्रका अपहरण करनेपर राजा क्रमशः अधम, उत्तम और मध्यम साहसका दण्ड दे। यदि सार्वजनिक सेतु (पुल या बाँध) और छोटे क्षेत्रमें अधिक जलवाला कुआँ बनाया जा रहा हो तथा वह दूसरेकी कुछ भूमि अपनी सीमामें ले रहा हो, परंतु उससे हानि तो बहुत कम हो और बहुत-से लोगोंकी अधिक भलाई हो रही हो तो उसके निर्माणमें रुकावट नहीं डालनी चाहिये। जो क्षेत्रके स्वामीको सूचना दिये बिना उसके क्षेत्रमें सेतुका निर्माण करता है, वह उस सेतुसे प्राप्त फलका उपभोग स्वयं नहीं कर सकता, क्षेत्रका स्वामी ही उसके फलका भोगी-भागी होगा और उसके अभावमें राजाका उसपर अधिकार होगा। जो कृषक किसीके खेतमें एक बार हल चलाकर भी उसमें स्वयं खेती न करे और दूसरेसे भी न कराये, राजा उससे क्षेत्रस्वामीको कृषिका सम्भावित फल दिलाये और खेतको दूसरे किसानसे जुतवाये ॥ ३-९॥
स्वामिपाल-विवाद
(अब गाय-भैंस या भेड़-बकरी चरानेवाले चरवाहे जब किसीके खेत चरा दें तो उन्हें किस
१. 'सीमा' कहते हैं—क्षेत्र आदिकी मर्यादाको। वह चार प्रकारकी होती है—जनपद-सीमा, ग्राम-सीमा, क्षेत्र-सीमा और गृह-सीमा। वह यथासम्भव पाँच लक्षणोंसे युक्त होती है, जैसा कि नारदजीने बताया है—'ध्वजिनी', 'मत्स्यिनी', 'नैधानी', 'भयवर्जिता' तथा 'राजशासननीता'। इनमेंसे जो सीमा वृक्ष आदिसे लक्षित या प्रकाशित हो, वह 'ध्वजिनी' कही गयी है। 'मत्स्य' शब्द जलका उपलक्षण है। अतः 'मत्स्यिनी'का अर्थ है—जलवती। वहाँ जलसे वह सीमा उपलक्षित होती है। 'नैधानी' कहते हैं—धानकी भूसी या कोयले आदि गाड़कर निश्चित की हुई सीमाको। 'भयवर्जिता' वह सीमा है, जिसे अर्थी और प्रत्यर्थी दोनोंने मिलकर अपनी स्वीकृतिसे निर्धारित किया हो। जहाँ सीमाका ज्ञापक कोई चिह्न न हो, वहाँ राजाकी इच्छासे जो सीमा निर्मित होती है, उसको 'राजशासननीता' कहते हैं। भूमि-सम्बन्धी विवादके छः हेतु हैं। आधिक्य, न्यूनता, अंशका होना, न होना, अभोगभुक्ति तथा मर्यादा—ये भूमि-विवादके छः कारण हैं, ऐसा कात्यायनका मत है। जैसे एक कहता है कि 'मेरी भूमि यहाँ पाँच हाथसे अधिक है' तो दूसरा कहता है, 'अधिक नहीं है'—यह 'आधिक्य'को लेकर विवाद हुआ। इसी तरह यदि एक कहे, 'मेरी भूमि यहाँ तीन हाथ है' और दूसरा कहे कि 'नहीं, तीन हाथसे कम है', तो यह 'न्यूनता'को लेकर विवाद हुआ। एक कहता है, 'मेरे हिस्सेमें इतनी भूमि है' और दूसरा कहता है, 'यहाँ तुम्हारा हिस्सा ही नहीं है' तो यह अंशविषयक 'अस्तित्व' और 'नास्तित्व'को लेकर विवाद हुआ। एकका आरोप है कि 'यह मेरी भूमि है, पहले तुम्हारे उपभोगमें कभी नहीं रही। इस समय तुम बलपूर्वक इसे अपने उपभोगमें ला रहे हो'। दूसरा कहता है, 'नहीं, सदासे या चिरकालसे यह भूमि मेरे अधिकारमें है'—यह 'अभोगभुक्ति' विषयक विवाद हुआ। एक कहता है, 'यह सीमा है' और दूसरा कहता है, 'नहीं, यह है' तो वह 'सीमाविषयक' विवाद हुआ।
२. सीमाके परिचायक चिह्न दो प्रकारके होने चाहिये—'प्रकाश' और 'अप्रकाश'। बरगद, पीपल, पलाश, सेमल, साखू, ताड़, दूधवाले वृक्ष, गुल्म, वेणु, शमी और लताबेलोंसे युक्त स्थल—ये सब 'प्रकाश चिह्न' हैं। पोखरे, कुआँ, बावड़ी, झरने और देवमन्दिर आदि भी प्रकाश-चिह्नके ही अन्तर्गत हैं। सीमाज्ञानके लिये कुछ छिपे हुए चिह्न भी होने चाहिये। जैसे—पत्थर, हड्डी, गौके बाल, धानकी भूसी, राख, खोपड़ी, कर्सी, ईंटा, कोयला, कंकड़ और बालू—भूमिमें गाड़ दिये जायें।