अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अध्याय २५७ * ५०७
कोयले, धानकी भूसी तथा बरगद आदिके वृक्षोंद्वारा सीमाका निश्चय$^१$ करें। वह सीमा कैसी हो, इस प्रश्नके उत्तरमें कहते हैं—वह सीमा सेतु (पुल), वल्मीक (बाँबी), चैत्य (पत्थरके चबूतरे या देवस्थान), बाँस और बालू आदिसे उपलक्षित होनी चाहिये$^२$॥ १-२ ॥
सामन्त अथवा निकटवर्ती ग्रामवाले चार, आठ अथवा दस मनुष्य लाल फूलोंकी माला और लाल वस्त्र धारण करके, सिरपर मिट्टी रखकर सीमाका निर्णय करें। सीमा-विवादमें सामन्तोंके असत्य-भाषण करनेपर राजा सबको अलग-अलग मध्यम साहसका दण्ड दे। सीमाका ज्ञान करानेवाले चिह्नोंके अभावमें राजा ही सीमाका प्रवर्तक होता है। आराम (बाग), आयतन (मन्दिर या खलिहान), ग्राम, वापी या कूप, उद्यान (क्रीडावन), गृह और वर्षाके जलको प्रवाहित करनेवाले नाले आदिकी सीमाके निर्णयमें भी यही विधि जाननी चाहिये। मर्यादाका भेदन, सीमाका उल्लङ्घन एवं क्षेत्रका अपहरण करनेपर राजा क्रमशः अधम, उत्तम और मध्यम साहसका दण्ड दे। यदि सार्वजनिक सेतु (पुल या बाँध) और छोटे क्षेत्रमें अधिक जलवाला कुआँ बनाया जा रहा हो तथा वह दूसरेकी कुछ भूमि अपनी सीमामें ले रहा हो, परंतु उससे हानि तो बहुत कम हो और बहुत-से लोगोंकी अधिक भलाई हो रही हो तो उसके निर्माणमें रुकावट नहीं डालनी चाहिये। जो क्षेत्रके स्वामीको सूचना दिये बिना उसके क्षेत्रमें सेतुका निर्माण करता है, वह उस सेतुसे प्राप्त फलका उपभोग स्वयं नहीं कर सकता, क्षेत्रका स्वामी ही उसके फलका भोगी-भागी होगा और उसके अभावमें राजाका उसपर अधिकार होगा। जो कृषक किसीके खेतमें एक बार हल चलाकर भी उसमें स्वयं खेती न करे और दूसरेसे भी न कराये, राजा उससे क्षेत्रस्वामीको कृषिका सम्भावित फल दिलाये और खेतको दूसरे किसानसे जुतवाये ॥ ३-९॥
स्वामिपाल-विवाद
(अब गाय-भैंस या भेड़-बकरी चरानेवाले चरवाहे जब किसीके खेत चरा दें तो उन्हें किस
१. 'सीमा' कहते हैं—क्षेत्र आदिकी मर्यादाको। वह चार प्रकारकी होती है—जनपद-सीमा, ग्राम-सीमा, क्षेत्र-सीमा और गृह-सीमा। वह यथासम्भव पाँच लक्षणोंसे युक्त होती है, जैसा कि नारदजीने बताया है—'ध्वजिनी', 'मत्स्यिनी', 'नैधानी', 'भयवर्जिता' तथा 'राजशासननीता'। इनमेंसे जो सीमा वृक्ष आदिसे लक्षित या प्रकाशित हो, वह 'ध्वजिनी' कही गयी है। 'मत्स्य' शब्द जलका उपलक्षण है। अतः 'मत्स्यिनी'का अर्थ है—जलवती। वहाँ जलसे वह सीमा उपलक्षित होती है। 'नैधानी' कहते हैं—धानकी भूसी या कोयले आदि गाड़कर निश्चित की हुई सीमाको। 'भयवर्जिता' वह सीमा है, जिसे अर्थी और प्रत्यर्थी दोनोंने मिलकर अपनी स्वीकृतिसे निर्धारित किया हो। जहाँ सीमाका ज्ञापक कोई चिह्न न हो, वहाँ राजाकी इच्छासे जो सीमा निर्मित होती है, उसको 'राजशासननीता' कहते हैं। भूमि-सम्बन्धी विवादके छः हेतु हैं। आधिक्य, न्यूनता, अंशका होना, न होना, अभोगभुक्ति तथा मर्यादा—ये भूमि-विवादके छः कारण हैं, ऐसा कात्यायनका मत है। जैसे एक कहता है कि 'मेरी भूमि यहाँ पाँच हाथसे अधिक है' तो दूसरा कहता है, 'अधिक नहीं है'—यह 'आधिक्य'को लेकर विवाद हुआ। इसी तरह यदि एक कहे, 'मेरी भूमि यहाँ तीन हाथ है' और दूसरा कहे कि 'नहीं, तीन हाथसे कम है', तो यह 'न्यूनता'को लेकर विवाद हुआ। एक कहता है, 'मेरे हिस्सेमें इतनी भूमि है' और दूसरा कहता है, 'यहाँ तुम्हारा हिस्सा ही नहीं है' तो यह अंशविषयक 'अस्तित्व' और 'नास्तित्व'को लेकर विवाद हुआ। एकका आरोप है कि 'यह मेरी भूमि है, पहले तुम्हारे उपभोगमें कभी नहीं रही। इस समय तुम बलपूर्वक इसे अपने उपभोगमें ला रहे हो'। दूसरा कहता है, 'नहीं, सदासे या चिरकालसे यह भूमि मेरे अधिकारमें है'—यह 'अभोगभुक्ति' विषयक विवाद हुआ। एक कहता है, 'यह सीमा है' और दूसरा कहता है, 'नहीं, यह है' तो वह 'सीमाविषयक' विवाद हुआ।
२. सीमाके परिचायक चिह्न दो प्रकारके होने चाहिये—'प्रकाश' और 'अप्रकाश'। बरगद, पीपल, पलाश, सेमल, साखू, ताड़, दूधवाले वृक्ष, गुल्म, वेणु, शमी और लताबेलोंसे युक्त स्थल—ये सब 'प्रकाश चिह्न' हैं। पोखरे, कुआँ, बावड़ी, झरने और देवमन्दिर आदि भी प्रकाश-चिह्नके ही अन्तर्गत हैं। सीमाज्ञानके लिये कुछ छिपे हुए चिह्न भी होने चाहिये। जैसे—पत्थर, हड्डी, गौके बाल, धानकी भूसी, राख, खोपड़ी, कर्सी, ईंटा, कोयला, कंकड़ और बालू—भूमिमें गाड़ दिये जायें।
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प्रकार दण्ड देना चाहिये—इसका विचार किया जाता है—) राजा दूसरेके खेतकी फसलको नष्ट करनेवाली भैंसपर आठ माष (पणका बीसवाँ भाग) दण्ड लगावे। गौपर उससे आधा और भेड़-बकरीपर उससे भी आधा दण्ड लगावे। यदि भैंस आदि पशु खेत चरकर वहीं बैठ जायें, तो उनपर पूर्वकथितसे दूना दण्ड लगाना चाहिये। जिसमें अधिक मात्रामें तृण और काष्ठ उपजता है, ऐसा भूप्रदेश जब स्वामीसे लेकर उसे सुरक्षित रखा जाता है तो उसे 'विवीत' (रक्षित या रखांतु) कहते हैं। उस रखांतुको भी हानि पहुँचानेपर इन भैंस आदि पशुओंपर अन्य खेतोंके समान ही दण्ड समझे। इसी अपराधमें गदहे और ऊँटोंपर भी भैंसके समान ही दण्ड लगाना चाहिये। जिस खेतमें जितनी फसल पशुओंके द्वारा नष्ट की जाय, उसका सामन्त आदिके द्वारा अनुमानित फल गो-स्वामीको क्षेत्रस्वामीके लिये दण्डके रूपमें देना चाहिये और चरवाहोंको तो केवल शारीरिक दण्ड देना (कुछ पीट देना चाहिये)। यदि गो-स्वामीने स्वयं चराया हो तो उससे पूर्वोक्त दण्ड ही वसूल करना चाहिये, ताड़ना नहीं देनी चाहिये। यदि खेत रास्तेपर हो, गाँवके समीप हो अथवा ग्रामके 'विवीत' (सुरक्षित) भूमिके निकट हो और वहाँ चरवाहे अथवा गो-स्वामीकी इच्छा न होनेपर भी अनजानेमें पशुओंने चर लिया अथवा फसलको हानि पहुँचा दी तो उसमें गो-स्वामी तथा चरवाहा—दोनोंमेंसे किसीका दोष नहीं माना जाता, अर्थात् उसके लिये दण्ड नहीं लगाना चाहिये; किंतु यदि स्वेच्छासे जान-बूझकर खेत चराया जाय तो चरानेवाला और गो-स्वामी दोनों चोरकी भाँति दण्ड पानेके अधिकारी हैं। साँड़, वृषोत्सर्गकी विधिसे या देवी-देवताको चढ़ाकर छोड़े गये पशु, दस दिनके भीतरकी ब्यायी हुई गाय तथा अपने यूथसे बिछुड़कर दूसरे स्थानपर आया हुआ पशु—ये दूसरेकी फसल चर लें तो भी दण्डनीय नहीं हैं, छोड़ देने योग्य हैं। जिसका कोई चरवाहा न हो, ऐसे देवोपहत तथा राजोपहत पशु भी छोड़ ही देने योग्य हैं। गोप (चरवाहा) प्रातःकाल गौओंके स्वामीके सँभलाये हुए पशु सायंकाल उसी प्रकार लाकर स्वामीको सौंप दे। वेतनभोगी ग्वालेके प्रमादसे मृत अथवा खोये हुए पशु राजा उससे पशु-स्वामीको दिलाये। गोपालकके दोषसे पशुओंका विनाश होनेपर उसके ऊपर साढ़े तेरह पण दण्ड लगाया जाय और वह स्वामीको नष्ट हुए पशुका मूल्य भी दे। ग्रामवासियोंकी इच्छासे अथवा राजाकी आज्ञाके अनुसार गोचारणके लिये भूमि छोड़ दे; उसे जोते-बोये नहीं। ब्राह्मण सदा, सभी स्थानोंसे तृण, काष्ठ और पुष्प ग्रहण कर सकता है। ग्राम और क्षेत्रका अन्तर सौ धनुषके प्रमाणका हो, अर्थात् गाँवके चारों ओर सौ-सौ धनुष भूमि परती छोड़ दी जाय और उसके बादकी भूमिपर ही खेती की जाय। खर्वट (बड़े गाँव) और क्षेत्रका अन्तर दो सौ धनुष एवं नगर तथा क्षेत्रका अन्तर चार सौ धनुष होना चाहिये॥ १०—१८॥
अस्वामिविक्रय
(अब अस्वामिविक्रय नामक व्यवहारपदपर विचार आरम्भ करते हैं—नारदजीने 'अस्वामिविक्रय' का लक्षण इस प्रकार बताया है—
निक्षिप्तं वा परद्रव्यं नष्टं लब्ध्वापहृत्य वा।
विक्रीयतेऽसमक्षं यत् स ज्ञेयोऽस्वामिविक्रयः॥
अर्थात् धरोहरके तौरपर रखे हुए पराये द्रव्यको खोया हुआ पाकर अथवा स्वयं चुराकर जो स्वामीके परोक्षमें बेच दिया जाता है, वह 'अस्वामिविक्रय' कहलाता है।' द्रव्यका स्वामी अपनी वस्तु दूसरेके द्वारा बेची हुई यदि किसी खरीददारके पास देखे तो उसे अवश्य पकड़े—अपने अधिकारमें ले ले। यहाँ 'विक्रीत' शब्द 'दत्त' और 'आहित'का भी उपलक्षण है। अर्थात् यदि कोई दूसरेकी रखी हुई वस्तु उसे बताये
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बिना दूसरेके यहाँ रख दे या दूसरेको दे दे तो उसपर यदि स्वामीकी दृष्टि पड़ जाय तो स्वामी उस वस्तुको हठात् ले ले या अपने अधिकारमें कर ले; क्योंकि उस वस्तुसे उसका स्वामित्व निवृत्त नहीं हुआ। यदि खरीदार उस वस्तुको खरीदकर छिपाये रखे, किसीपर प्रकट न करे तो उसका अपराध माना जाता है। तथा जो हीन पुरुष है, अर्थात् उस द्रव्यकी प्राप्तिके उपायसे रहित है, उससे एकान्तमें कम मूल्यमें और असमयमें (रात्रि आदिमें) उस वस्तुको खरीदनेवाला मनुष्य चोर होता है, अर्थात् चोरके समान दण्डनीय होता है। अपनी खोयी हुई या चोरीमें गयी हुई वस्तु जिसके पास देखे, उसे स्थानपाल आदि राजकर्मचारीसे पकड़वा दे। यदि उस स्थान अथवा समयमें राजकर्मचारी न मिले तो चोरको स्वयं पकड़कर राजकर्मचारीको सौंप दे। यदि खरीदार यह कहे कि 'मैंने चोरी नहीं की है, अमुकसे खरीदी है', तो वह बेचनेवालेको पकड़वा देनेपर शुद्ध (अभियोगसे मुक्त) हो जाता है। जो नष्ट या अपहृत वस्तुका विक्रेता है, उसके पाससे द्रव्यका स्वामी द्रव्य, राजा अर्थदण्ड और खरीदनेवाला अपना दिया हुआ मूल्य पाता है। वस्तुका स्वामी लेख्य आदि आगम या उपभोगका प्रमाण देकर खोयी हुई वस्तुको अपनी सिद्ध करे। सिद्ध न करनेपर राजा उससे वस्तुका पञ्चमांश दण्डके रूपमें ग्रहण करे। जो मनुष्य अपनी खोयी हुई अथवा चुरायी गयी वस्तुको राजाको बिना बतलाये दूसरेसे ले ले, राजा उसपर छानबे पणका अर्थदण्ड लगावे। शौल्कि क (शुल्कके अधिकारी) या स्थानपाल (स्थानरक्षक) जिस खोये अथवा चुराये गये द्रव्यको राजाके पास लायें, उस द्रव्यको एक वर्षके पूर्व ही वस्तुका स्वामी प्रमाण देकर प्राप्त कर ले; एक वर्षके बाद राजा स्वयं उसे ले ले। घोड़े आदि एक खुरवाले पशु खोनेके बाद मिलें, तो स्वामी उनकी रक्षाके निमित्त चार पण राजाको दे; मनुष्यजातीय द्रव्यके मिलनेपर पाँच पण; भैंस, ऊँट और गौके प्राप्त होनेपर दो-दो पण तथा भेड़-बकरीके मिलनेपर पणका चतुर्थांश राजाको अर्पित करे॥ १९—२५॥
दत्ताप्रदानिक
[‘दत्ताप्रदानिक’ का स्वरूप नारदने इस प्रकार बताया है—"जो असम्यग्रूपसे (अयोग्य मार्गका आश्रय लेकर) कोई द्रव्य देनेके पश्चात् फिर उसे लेना चाहता है, उसे 'दत्ताप्रदानिक' नामक व्यवहारपद कहा जाता है।" इस प्रकरणमें इसीपर विचार किया जाता है।]
जीविकाका उपरोध न करते हुए ही अपनी वस्तुका दान करे; अर्थात् कुटुम्बके भरण-पोषणसे बचा हुआ धन ही देनेयोग्य है। स्त्री और पुत्र किसीको न दे। अपना वंश होनेपर किसीको सर्वस्वका दान न करे। जिस वस्तुको दूसरेके लिये देनेकी प्रतिज्ञा कर ली गयी हो, वह वस्तु उसीको दे, दूसरेको न दे। प्रतिग्रह प्रकटरूपमें ग्रहण करे। विशेषतः स्थावर भूमि, वृक्ष आदिका प्रतिग्रह तो सबके सामने ही ग्रहण करना चाहिये। जो वस्तु जिसे धर्मार्थ देनेकी प्रतिज्ञा की गयी हो, वह उसे अवश्य दे दे और दी हुई वस्तुका कदापि फिर अपहरण न करे—उसे वापस न ले॥ २६-२७॥
क्रीतानुशय
(अब 'क्रीतानुशय' बताया जाता है। इसका स्वरूप नारदजीने इस प्रकार कहा है—"जो खरीदार मूल्य देकर किसी पण्य वस्तुको खरीदनेके बाद उसे अधिक महत्त्वकी वस्तु नहीं मानता है, अतः उसे लौटाना चाहता है तो यह मामला 'क्रीतानुशय' नामक विवादपद कहलाता है। ऐसी वस्तुको जिस दिन खरीदा जाय, उसी दिन अविकृतरूपसे मालधनीको लौटा दिया जाय। यदि दूसरे दिन लौटावे तो क्रेता मूल्यसे $\frac{१}{३०}$ वाँ भाग छोड़ दे।
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यदि तीसरे दिन लौटावे तो $\frac{१}{१६}$ वाँ भाग छोड़ दे। इसके बाद वह वस्तु खरीददारकी ही हो जाती है, वह उसे लौटा नहीं सकता।'') अब बीज आदिके विषयमें बताते हैं— ॥ २७ $\frac{१}{२}$ ॥
बीजकी दस दिन, लोहेकी एक दिन, वाहनकी पाँच दिन, रत्नोंकी सात दिन, दासीकी एक मास, दूध देनेवाले पशुकी तीन दिन और दासकी एक पक्षतक परीक्षा होती है। सुवर्ण अग्निमें डालनेपर क्षीण नहीं होता; परंतु चाँदी प्रतिशत दो पल, राँगे और सीसेमें प्रतिशत आठ पल, ताँबेमें पाँच पल और लोहेमें दस पल कमी होती है। ऊन और रूईके स्थूल सूतसे बुने हुए कपड़ेमें सौ पलमें दस पलकी वृद्धि होती है। इसी प्रकार मध्यम सूतमें पाँच पल और सूक्ष्म सूतमें तीन पलकी वृद्धि जाननी चाहिये। कार्मिक (अनेक रङ्गके चित्रोंसे युक्त) और रोमबद्ध (किनारेपर गुच्छोंसे युक्त) वस्त्रमें तीसवाँ भाग क्षय होता है। रेशम और वल्कलके बुने हुए वस्त्रमें न तो क्षय होता है और न वृद्धि ही। उपर्युक्त द्रव्योंके नष्ट होनेपर द्रव्य-ज्ञानकुशल व्यक्ति देश, काल, उपयोग और नष्ट हुए वस्तुके सारासारकी परीक्षा करके जितनी हानिका निर्णय कर दें, राजा उस हानिकी शिल्पियोंसे अवश्य पूर्ति कराये ॥ २८—३२ ॥
अभ्युपेत्याशुश्रूषा
(सेवा स्वीकार करके जो उसे नहीं करता है, उसका यह बर्ताव 'अभ्युपेत्याशुश्रूषा' नामक व्यवहारपद है।) जो बलपूर्वक दास बनाया गया है और जो चोरोंके द्वारा चुराकर किसीके हाथ बेचा गया है—ये दोनों दासभावसे मुक्त हो सकते हैं। यदि स्वामी इन्हें न छोड़े तो राजा अपनी शक्तिसे इन्हें दासभावसे छुटकारा दिलाये। जो स्वामीको प्राणसंकटसे बचा दे, वह भी दासभावसे मुक्त कर देनेयोग्य है। जो स्वामीसे भरण-पोषण पाकर उसका दास्य स्वीकार करके कार्य कर रहा है, वह भरण-पोषणमें स्वामीका जितना धन खर्च करा चुका है, उतना धन वापस कर दे तो दास-भावसे छुटकारा पा जाता है। जितना धन लेकर स्वामीने किसीको किसी धनीके पास बन्धक रख दिया है, अथवा जितना धन देकर किसी धनीने किसी ऋणग्राहीको ऋणदातासे छुड़ाया है, उतना धन सूदसहित वापस कर देनेपर आहित दास भी दासत्वसे छुटकारा पा सकता है। प्रव्रज्यावसित (संन्यासभ्रष्ट अथवा आरूढ़पतित) मनुष्य यदि इसका प्रायश्चित्त न कर ले तो मरणपर्यन्त राजाका दास होता है। चारों वर्ण अनुलोमक्रमसे ही दास हो सकते हैं, प्रतिलोमक्रमसे नहीं। विद्यार्थी विद्याग्रहणके पश्चात् गुरुके घरमें आयुर्वेदादि शिल्प-शिक्षाके लिये यदि रहना चाहे तो समय निश्चित करके रहे। यदि निश्चित समयसे पहले वह शिल्प-शिक्षा प्राप्त कर ले तो भी उतने समयतक वहाँ अवश्य निवास करे। उन दिनों वह गुरुके घर भोजन करे और उस शिल्पसे उपार्जित धन गुरुको ही समर्पित करे॥ ३३—३५ ॥
संविद्-व्यतिक्रम
(नियत की हुई व्यवस्थाका नाम 'समय' या 'संविद्' है। उसका उल्लङ्घन 'संविद्-व्यतिक्रम' कहलाता है। यह विवादका पद है।)
राजा अपने नगरमें भवन-निर्माण कराकर उनमें वेदविद्या-सम्पन्न ब्राह्मणोंको जीविका देकर बसावे और उनसे प्रार्थना करे कि 'आप यहाँ रहकर अपने धर्मका अनुष्ठान कीजिये।' ब्राह्मणोंको अपने धर्ममें बाधा न डालते हुए जो सामयिक और राजाद्वारा निर्धारित धर्म हो, उसका भी यत्नपूर्वक पालन करना चाहिये। जो मनुष्य समूह या संस्थाका द्रव्यग्रहण और मर्यादाका उल्लङ्घन करता हो, राजा उसका सर्वस्व छीनकर उसे राज्यसे निर्वासित कर दे। अपने समाजके हितैषी
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मनुष्योंके कथनानुसार ही सब मनुष्योंको कार्य करना चाहिये। जो मनुष्य समाजके विपरीत आचरण करे, राजा उसे प्रथम साहसका दण्ड* दे। समूहके कार्यकी सिद्धिके लिये राजाके पास भेजा हुआ मनुष्य राजासे जो कुछ भी मिले, वह समाजके श्रेष्ठ व्यक्तियोंको बुलाकर समर्पित कर दे। यदि वह स्वयं लाकर नहीं देता तो राजा उससे ग्यारहगुना धन दिलावे। जो वेदज्ञान-सम्पन्न, पवित्र अन्तःकरणवाले, लोभशून्य तथा कार्यका विचार करनेमें कुशल हों, उन समूहके हितैषी मनुष्योंका वचन सबके लिये पालनीय है। 'श्रेणी' (एक व्यापारसे जीविका चलानेवाले), 'नैगम' (वेदोक्त धर्मका आचरण करनेवाले), 'पाखण्डी' (वेदविरुद्ध आचरणवाले) और 'गण' (अस्त्र-शस्त्रोंसे जीविका चलानेवाले)—इन सब लोगोंके लिये भी यही विधि है। राजा इनके धर्मभेद और पूर्ववृत्तिका संरक्षण करे॥ ३६—४२॥
वेतनादान
जो भृत्य वेतन लेकर काम छोड़ दे, वह स्वामीको उस वेतनसे दुगुना धन लौटाये। वेतन न लिया हो तो वेतनके समान धन उससे ले। भृत्य सदा खेती आदिके सामानकी रक्षा करे। जो वेतनका निश्चय किये बिना भृत्यसे काम लेता है, राजा उसके वाणिज्य, पशु और शस्यकी आयका दशांश भृत्यको दिलाये। जो भृत्य देश-कालका अतिक्रमण करके लाभको अन्यथा (औसतसे भी कम) कर देता है, उसे स्वामी अपने इच्छानुसार वेतन दे। परंतु औसतसे अधिक लाभ प्राप्त करानेपर भृत्यको वेतनसे अधिक दे। वेतन निश्चित करके दो मनुष्योंसे एक ही काम कराया जाय और यदि वह काम उनसे समाप्त न हो सके तो जिसने जितना काम किया हो, उसको उतना वेतन दे और यदि कार्य सिद्ध हो गया हो तो पूर्वनिश्चित वेतन दे। यदि भारवाहकसे राजा और देवता-सम्बन्धी पात्रके सिवा दूसरेका पात्र फूट जाय तो राजा भारवाहकसे पात्र दिलाये। यात्रामें विघ्न करनेवाले भृत्यपर वेतनसे दुगुना अर्थदण्ड करे। जो भृत्य यात्रारम्भके समय काम छोड़ दे, उससे वेतनका सातवाँ भाग, कुछ दूर चलकर काम छोड़ दे, उससे चतुर्थ भाग और जो मार्गके मध्यमें काम छोड़ दे, उससे पूरा वेतन राजा स्वामीको दिलावे। इसी प्रकार भृत्यका त्याग करनेवाले स्वामीसे राजा भृत्यको दिलाये॥ ४३—४८॥
द्यूत-समाह्वय
(जूएमें छलसे काम लेना 'द्यूतसमाह्वय' है। प्राणिभिन्न पदार्थ—सोना, चाँदी आदिसे खेला जानेवाला जूआ 'द्यूत' कहलाता है। किंतु प्राणियोंको घुड़दौड़ आदिमें दाँवपर लगाकर खेला जाय तो उसको 'समाह्वय' कहा जाता है।) परस्परकी स्वीकृतिसे जुआरियोंद्वारा कल्पित पण (शर्त)-को 'ग्लह' कहते हैं। जो जुआरियोंको खेलनेके लिये सभा-भवन प्रदान करता है, वह 'सभिक' कहलाता है। 'ग्लह' या दाँवमें सौ या इससे अधिक वृद्धि (लाभ) प्राप्त करनेवाले धूर्त जुआरीसे 'सभिक' प्रतिशत पाँच पण अपने भरण-पोषणके लिये ले। फिर दूसरी बार उतनी ही वृद्धि प्राप्त करनेवाले अन्य जुआरीसे प्रतिशत दस पण ग्रहण करे। राजाके द्वारा भलीभाँति सुरक्षित द्यूतका अधिकारी सभिक राजाका निश्चित भाग उसे दे। जीता हुआ धन जीतनेवालेको दिलाये और क्षमा-परायण होकर सत्य-भाषण करे। जब द्यूतका सभिक और प्रख्यात जुआरियोंका समूह राजाके समीप आये तथा राजाको उनका भाग दे दिया
* 'नारदस्मृति' में कहा है कि 'प्रथम' साहसका दण्ड सौ पण, 'मध्यम' साहसका दण्ड पाँच सौ पण और 'उत्तम' साहसका दण्ड एक हजार पण है।
५१२ * अग्निपुराण *
गया हो तो राजा जीतनेवालेको जीतका धन दिला दे, अन्यथा न दिलाये। द्यूत-व्यवहारको देखनेवाले सभासदके पदपर राजा उन जुआरियोंको ही नियुक्त करे तथा साक्षी भी द्यूतकारोंको ही बनाये। कृत्रिम पाशोंसे छलपूर्वक जूआ खेलनेवाले मनुष्योंके ललाटमें चिह्न करके राजा उन्हें देशसे निर्वासित कर दे। चोरोंको पहचाननेके लिये द्यूतमें एक ही किसीको प्रधान बनाये, यही विधि 'प्राणि-द्यूत-समाह्वय' (घुड़दौड़) आदिमें भी जाननी चाहिये॥ ४९—५३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सीमा-विवादादिके कथनका निर्णय' नामक दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५७॥
दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याय
व्यवहारके वाक्पारुष्य, दण्डपारुष्य, साहस, विक्रियासम्प्रदान, सम्भूय-समुत्थान, स्तेय, स्त्री-संग्रहण तथा प्रकीर्णक—इन विवादास्पद विषयोंपर विचार
वाक्पारुष्य
[अब 'वाक्पारुष्य' (कठोर गाली देने आदि)-के विषयमें विचार किया जाता है। इसका लक्षण नारदजीने इस प्रकार बताया है—'देश, जाति और कुल आदिको कोसते हुए उनके सम्बन्धमें जो अश्लील और प्रतिकूल अर्थवाली बात कही जाती है, उसको 'वाक्पारुष्य' कहते हैं।' प्रतिकूल अर्थवालीसे तात्पर्य है—उद्वेगजनक वाक्यसे। जैसे कोई कहे—'गौडदेशवाले बड़े झगड़ालू होते हैं' तो यह देशपर आक्षेप हुआ। 'ब्राह्मण बड़े लालची होते हैं'—यह जातिपर आक्षेप हुआ, तथा 'विश्वामित्रगोत्रीय बड़े क्रूर चरित्रवाले होते हैं'—यह कुलपर आक्षेप हुआ। यह 'वाक्पारुष्य' तीन प्रकारका होता है—'निष्ठुर', 'अश्लील' और 'तीव्र'। इनका दण्ड भी उत्तरोत्तर भारी होता है। आक्षेपयुक्त वचनको 'निष्ठुर' कहते हैं, जिसमें अभद्र बात कही जाय, वह 'अश्लील' है और जिससे किसीपर पातकी होनेका आरोप हो, वह वाक्य 'तीव्र' है। जैसे किसीने कहा—'तू मूर्ख है, मौगड़ है, तुझे धिक्कार है'—यह साक्षेप वचन 'निष्ठुर'की कोटिमें आता है, किसीकी माँ-बहिनके लिये गाली निकालना 'अश्लील' है और किसीको यह कहना कि 'तू शराबी है, गुरुपत्नीगामी है'—ऐसा कटुवचन 'तीव्र' कहा गया है। इस तरह वाक्पारुष्यके अपराधोंपर दण्डविधान कैसे किया जाता है, इसीका यहाँ विचार है—]
जो न्यूनाङ्ग (लँगड़े-लूले आदि) हैं, न्यूनेन्द्रिय (अन्धे-बहरे आदि) हैं तथा जो रोगी (दूषित चर्मवाले, कोढ़ी आदि) हैं, उनपर सत्यवचन, असत्यवचन अथवा अन्यथा-स्तुतिके द्वारा कोई आक्षेप करे तो राजा उसपर साढ़े बारह पण दण्ड लगाये। (''इन महोदयकी दोनों आँखें नहीं हैं, इसलिये लोग इन्हें 'अंधा' कहते हैं''—यह सत्यवचनद्वारा आक्षेप हुआ। ''इनकी आँखें तो सही-सलामत हैं, फिर भी लोग इन्हें 'अंधा' कहते हैं''—यह असत्यवचनद्वारा आक्षेप हुआ। 'तुम विकृताकार होनेसे ही दर्शनीय हो गये हो' यह 'अन्यथास्तुति' है।)॥ १॥
जो मनुष्य किसीपर आक्षेप करते हुए इस प्रकार कहे कि 'मैं तेरी बहिनसे, तेरी माँसे समागम करूँगा' तो राजा उसपर पचीस पणका अर्थदण्ड लगाये। यदि गाली देनेवालेकी अपेक्षा गाली पानेवाला अधम* है तो उसको गाली
* गुण और आचरणकी दृष्टिसे गिरा हुआ।
* अध्याय २५८ * ५१३
देनेके अपराधमें श्रेष्ठ पुरुषपर उक्त दण्डका आधा लगेगा तथा परायी स्त्री एवं उच्चजातिवालेको अधमके द्वारा गाली दी गयी हो तो उसके ऊपर पूर्वोक्त दण्ड दुगुना लगाया जाय। वर्ण और जातिकी लघुता और श्रेष्ठताको देखकर राजा दण्डकी व्यवस्था करे। वर्णोंके ‘प्रातिलोम्यापवाद’ में अर्थात् निम्नवर्णके पुरुषद्वारा उच्चवर्णके पुरुषपर आक्षेप किये जानेपर दुगुने और तिगुने दण्डका विधान है। जैसे ब्राह्मणको कटुवचन सुनानेवाले क्षत्रियपर पूर्वोक्त द्विगुण दण्ड, पचास पणसे दुगुने दण्ड सौ पण, लगाये जाने चाहिये तथा वही अपराध करनेवाले वैश्यपर तिगुने, अर्थात् डेढ़ सौ पण दण्ड लगने चाहिये। इसी तरह ‘आनुलोम्यापवाद’में, अर्थात् उच्चवर्णद्वारा हीनवर्णके मनुष्यपर आक्षेप किये जानेपर क्रमशः आधे-आधे दण्डकी कमी हो जाती है। अर्थात् ब्राह्मण क्षत्रियपर आक्रोश करे तो पचास पण दण्ड दे, वैश्यपर करे तो पच्चीस पण और यदि शूद्रपर करे तो साढ़े बारह पण दण्ड दे। यदि कोई मनुष्य वाणीद्वारा दूसरोंको इस प्रकार धमकावे कि 'मैं तुम्हारी बाँह उखाड़ लूँगा, गर्दन मरोड़ दूँगा, आँखें फोड़ दूँगा और जाँघ तोड़ डालूँगा' तो राजा उसपर सौ पणका दण्ड लगावे और जो पैर, नाक, कान और हाथ आदि तोड़नेको कहे, उसपर पचास पणका अर्थदण्ड लागू करे। यदि असमर्थ मनुष्य ऐसा कहे, तो राजा उसपर दस पण दण्ड लगावे और समर्थ मनुष्य असमर्थको ऐसा कहे, तो उससे पूर्वोक्त सौ पण दण्ड वसूल करे। साथ ही असमर्थ मनुष्यकी रक्षाके लिये उससे कोई ‘प्रतिभू’ (जमानतदार) भी माँगे। किसीको पतित सिद्ध करनेके लिये आक्षेप करनेवाले मनुष्यको मध्यम साहसका दण्ड देना चाहिये तथा उपपातकका मिथ्या आरोप करनेवालेपर प्रथम साहसका दण्ड लगाना चाहिये। वेदविद्या-सम्पन्न ब्राह्मण, राजा अथवा देवताकी निन्दा करनेवालोंको उत्तम साहस, जातियोंके सङ्घकी निन्दा करनेवालेको मध्यम साहस और ग्राम या देशकी निन्दा करनेवालेको प्रथम साहसका दण्ड देना चाहिये॥ २-८॥
दण्डपारुष्य
[अब ‘दण्डपारुष्य’ प्रस्तुत किया जाता है। नारदजीके कथनानुसार उसका स्वरूप इस प्रकार है—‘‘दूसरोंके शरीरपर, अथवा उसकी स्थावर-जङ्गम वस्तुओंपर हाथ, पैर, अस्त्र-शस्त्र तथा पत्थर आदिसे जो चोट पहुँचायी जाती है तथा राख, धूल और मल-मूत्र आदि फेंककर उसके मनमें दुःख उत्पन्न किया जाता है, यह दोनों ही प्रकारका व्यवहार ‘दण्डपारुष्य’ कहलाता है।’’ उसके तीन कारण बताये जाते हैं—‘अवगोरण’ (मारनेके लिये उद्योग), ‘निःसङ्गपातन’ (निष्ठुरतापूर्वक नीचे गिरा देना) और ‘क्षतदर्शन’ (रक्त निकाल देना)। इन तीनोंके द्वारा हीन द्रव्यपर, मध्यम द्रव्यपर और उत्तम द्रव्यपर जो आक्रमण होता है, उसको दृष्टिमें रखकर ‘दण्डपारुष्य’के तीन भेद किये जाते हैं। ‘दण्डपारुष्य’का निर्णय करके उसके लिये अपराधीको दण्ड दिया जाता है। उसके स्वरूपमें संदेह होनेपर निर्णयके कारण बता रहे हैं—]
यदि कोई मनुष्य राजाके पास आकर इस आशयका अभियोगपत्र दे कि ‘अमुक व्यक्तिने एकान्त स्थानमें मुझे मारा है’, तो राजा इस कार्यमें चिह्नोंसे, युक्तियोंसे, आशय (जनप्रवादसे) तथा दिव्य-प्रमाणसे निश्चय करे। ‘अभियोग लगानेवालेने अपने शरीरपर घावका कपटपूर्वक चिह्न तो नहीं बना लिया है’, इस संदेहके कारण उसका परीक्षण (छानबीन) आवश्यक है। दूसरेके ऊपर राख, कीचड़ या धूल फेंकनेवालेपर दस पण और अपवित्र वस्तु या थूक डालनेवाले, अथवा अपने पैरकी एड़ी छुआ देनेवालेपर राजा बीस पण दण्ड लगाये। यह दण्ड समान वर्णवालोंके
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प्रति ऐसा अपराध करनेवालोंके लिये ही बताया गया है। परायी स्त्रियों और अपनेसे उत्तम वर्णवाले पुरुषोंके प्रति पूर्वोक्त व्यवहार करनेपर मनुष्य दुगुने दण्डका भागी होता है और अपनेसे हीन वर्णवालोंके प्रति ऐसा व्यवहार करनेपर मनुष्य आधा दण्ड पानेका अधिकारी होता है। यदि कोई मोह एवं मदके वशीभूत (नशेमें) होकर ऐसा अपराध कर बैठे तो उसे दण्ड नहीं देना चाहिये॥ ९-११॥
ब्राह्मणेतर मनुष्य अपने जिस अङ्गसे ब्राह्मणको पीड़ा दे—मारे-पीटे, उसका वह अङ्ग छेदन कर देने योग्य है। ब्राह्मणके वधके लिये शस्त्र उठा लेनेपर उस पुरुषको प्रथम साहसका दण्ड मिलना चाहिये। यदि उसने मारनेकी इच्छासे शस्त्र आदिका स्पर्शमात्र किया हो तो उसे प्रथम साहसके आधे दण्डसे दण्डित करना चाहिये। अपने समान जातिवाले मनुष्यको मारनेके लिये हाथ उठानेवालेको दस पण, लात उठानेवालेको बीस पण और एक-दूसरेके वधके लिये शस्त्र उठानेपर सभी वर्णके लोगोंको मध्यम साहसका दण्ड देना चाहिये। किसीके पैर, केश, वस्त्र और हाथ—इनमेंसे कोई-सा भी पकड़कर खींचने या झटका देनेपर अपराधीको दस पणका दण्ड लगावे। इसी तरह दूसरेको कपड़ेमें लपेटकर जोर-जोरसे दबाने, घसीटने और पैरोंसे आघात करनेपर आक्रामकसे सौ पण वसूल करे। जो किसीपर लाठी आदिसे ऐसा प्रहार करे कि उसे दुःख तो हो, किंतु शरीरसे रक्त न निकले, तो उस मनुष्यपर बत्तीस पण दण्ड लगावे। यदि उस प्रहारसे रक्त निकल आवे तो अपराधीपर इससे दूना, चौंसठ पण दण्ड लगाया जाना चाहिये। किसीके हाथ-पाँव अथवा दाँत तोड़नेवाले, नाक-कान काटनेवाले, घावको कुचल देनेवाले या मारकर मृतकतुल्य बना देनेवालेपर मध्यम साहस—पाँच सौ पणका दण्ड लगाया जाय। किसीकी चेष्टा, भोजन या
वाणीको रोकनेवाले आँख, जिह्वा आदिको फोड़ने या छेदनेवाले या कंधा, भुजा और जाँघ तोड़नेवालेको भी मध्यम साहसका दण्ड देना चाहिये। यदि बहुत-से मनुष्य मिलकर एक मनुष्यका अङ्ग-भङ्ग करें तो जिस-जिस अपराधके लिये जो-जो दण्ड बताया गया है, उससे दूना दण्ड प्रत्येकको दे। परस्पर कलह होते समय जिसने जिसकी जो वस्तु हड़प ली हो, राजाकी आज्ञासे उसे उसकी वह वस्तु लौटा देनी होगी और अपहरणके अपराधमें उस अपहृत वस्तुके मूल्यसे दूना दण्ड राजाके लिये देना होगा। जो मनुष्य किसीपर प्रहार करके उसे घायल कर दे, वह उसके घाव भरने और स्वस्थ होनेतक औषध, पथ्य एवं चिकित्सामें जितना व्यय हो, उसका भार वहन करे। साथ ही जिस कलहके लिये जो दण्ड बताया गया है, उतना अर्थदण्ड भी चुकाये। नावसे लोगोंको पार उतारनेवाला नाविक यदि स्थलमार्गका शुल्क ग्रहण करता है तो उसपर दस पण दण्ड लगाना चाहिये। यदि यजमानके पास वैभव हो और पड़ोसमें विद्वान् और सदाचारी ब्राह्मण बसते हों तो श्राद्ध आदिमें उनको निमन्त्रण न देनेपर उस यजमानपर भी वही दण्ड लगाना चाहिये। किसीकी दीवारपर मुद्गर आदिसे आघात करनेवालेपर पाँच पण, उसे विदीर्ण करनेवालेपर दस पण तथा उसको फोड़ने या दो टूक करनेवालेपर बीस पण दण्ड लगाया जाय और वह दीवार गिरा देनेवालेसे पैंतीस पण दण्ड वसूल किया जाय। साथ ही उस दीवारके मालिकको नये सिरेसे दीवार बनानेका व्यय उससे दिलाया जाय। किसीके घरमें दुःखोत्पादक वस्तु—कण्टक आदि फेंकनेवालेपर सोलह पण और शीघ्र प्राण हरण करनेवाली वस्तु—विषधर सर्प आदि फेंकनेपर मध्यम साहस—पाँच सौ पण दण्ड देनेका विधान है। क्षुद्र पशुको पीड़ा पहुँचानेवालेपर दो पण, उसके शरीरसे रुधिर निकाल देनेवालेपर चार
- अध्याय २५८ * ५१५
पण, सींग तोड़नेवालेपर छः पण तथा अङ्ग-भङ्ग करनेवालेपर आठ पण दण्ड लगावे। क्षुद्र पशुका लिङ्ग-छेदन करने या उसको मार डालनेपर मध्यम साहसका दण्ड दे और अपराधीसे स्वामीको उस पशुका मूल्य दिलाये। महान् पशु—हाथी-घोड़े आदिके प्रति दुःखोत्पादन आदि पूर्वोक्त अपराध करनेपर क्षुद्र पशुओंकी अपेक्षा दूना दण्ड जानना चाहिये। जिनकी डालियाँ काटकर अन्यत्र लगा दी जानेपर अङ्कुरित हो जाती हैं, वे बरगद आदि वृक्ष 'प्ररोहिशाखी' कहलाते हैं। ऐसे प्ररोही वृक्षोंकी तथा जिनकी डालियाँ अङ्कुरित नहीं होतीं, परंतु जो जीविका चलानेके साधन बनते हैं, उन आम आदि वृक्षोंकी शाखा, स्कन्ध तथा मूलसहित समूचे वृक्षका छेदन करनेपर क्रमशः बीस पण, चालीस पण और अस्सी पण दण्ड लगानेका विधान है॥ १२—२५॥
साहस-प्रकरण
(अब 'साहस' नामक विवादपदका विवेचन करनेके लिये पहले उसका लक्षण बताते हैं—) सामान्य द्रव्य अथवा परकीय द्रव्यका बलपूर्वक अपहरण 'साहस' कहलाता है। (यहाँ यह कहा गया कि राजदण्डका उल्लङ्घन करके, जनसाधारणके आक्रोशकी कोई परवा किये बिना राजकीय पुरुषोंसे भिन्न लोगोंके सामने जो मारण, अपहरण तथा परस्त्रीके प्रति बलात्कार आदि किया जाता है, वह सब 'साहस'की कोटिमें आता है।) जो दूसरोंके द्रव्यका अपहरण करता है, उसके ऊपर उस अपहृत द्रव्यके मूल्यसे दूना दण्ड लगाना चाहिये। जो 'साहस' (लूट-पाट, डकैती आदि) कर्म करके उसे स्वीकार नहीं करता—'मैंने नहीं किया है'—ऐसा उत्तर देता है, उसके ऊपर वस्तुके मूल्यसे चौगुना दण्ड लगाना उचित है॥ २६॥
जो मनुष्य दूसरेसे डकैती आदि 'साहस' करवाता है, उससे उस साहसके लिये कथित दण्डसे दूना दण्ड लेना चाहिये। जो ऐसा कहकर कि "मैं तुम्हें धन दूँगा, तुम 'साहस' (डकैती आदि) करो", दूसरेसे 'साहस'का काम कराता है, उससे साहसिकके लिये नियत दण्डकी अपेक्षा चौगुना दण्ड वसूल करना चाहिये। श्रेष्ठ पुरुष (आचार्य आदि)-की निन्दा या आज्ञाका उल्लङ्घन करनेवाले, भ्रातृपत्नी (भौजाई या भयहू)-पर प्रहार करनेवाले, प्रतिज्ञा करके न देनेवाले, किसीके बंद घरका ताला तोड़कर खोलनेवाले तथा पड़ोसी और कुटुम्बीजनोंका अपकार करनेवालेपर राजा पचास पणका दण्ड लगावे, यह शास्त्रका निर्णय है॥ २७-२८॥
(बिना नियोगके) स्वेच्छाचारपूर्वक विधवासे गमन करनेवाले, संकटग्रस्त मनुष्यके पुकारनेपर उसकी रक्षाके लिये दौड़कर न जानेवाले, अकारण ही लोगोंको रक्षाके लिये पुकारनेवाले, चाण्डाल होकर श्रेष्ठ जातिवालोंका स्पर्श करनेवाले, दैव एवं पितृकार्यमें संन्यासीको भोजन करानेवाले, शूद्र, अनुचित शपथ करनेवाले, अयोग्य (अनधिकारी) होनेपर भी योग्य (अधिकारी)-के कर्म (वेदाध्ययनादि) करनेवाले, बैल एवं क्षुद्र पशु—बकरे आदिको बधिया करनेवाले, साधारण वस्तुमें भी ठगी करनेवाले तथा दासीका गर्भ गिरानेवालेपर एवं पिता-पुत्र, बहिन-भाई, पति-पत्नी तथा आचार्य-शिष्य—ये पतित न होते हुए भी यदि एक-दूसरेका त्याग करते हों तो इनके ऊपर भी सौ पण दण्ड लगावे। यदि धोबी दूसरोंके वस्त्र पहने तो तीन पण और यदि बेचे, भाड़ेपर दे, बन्धक रखे या मँगनी दे, तो दस पण
* उपर्युक्त अपराधोंके लिये जो राजदण्ड है, वही मूलमें बताया गया है; परंतु जो वस्त्र उसने गायब कर दिया हो, उसका मूल्य वह वस्त्र-स्वामीको अलगसे दे। मनुजीने यह व्यवस्था दी है कि 'यदि वस्त्र एक बारका धुला है तो धोबी उसके मूल्यका अष्टमांश कम करके शेष मूल्य स्वामीको चुकावे। इसी तरह कई बारके धुले हुए वस्त्रका पादांश, तृतीयांश इत्यादि कम करके वह लौटावे।'
५१६ * अग्निपुराण *
अर्थदण्डके योग्य होता है*। तोलनदण्ड, शासन, मान (प्रस्थ, द्रोण आदि) तथा नाणक (मुद्रा आदिसे चिह्नित निष्क आदि)—इनमें जो कूटकारी (मानके वजनमें कमी-बेशी तथा सुवर्णमें ताँबे आदिकी मिलावट करनेवाला) हो तथा उससे कूट-तुला आदि व्यवहार करता हो, उन दोनोंको पृथक्-पृथक् उत्तम साहसके दण्डसे दण्डित करना चाहिये। सिक्कोंकी परीक्षा करते समय यदि पारखी असली सिक्केको नकली या नकली सिक्केको असली बतावे तो राजा उससे भी प्रथम साहसका दण्ड वसूल करे। जो वैद्य आयुर्वेदको न जाननेपर भी पशुओं, मनुष्यों और राजकर्मचारियोंकी मिथ्या चिकित्सा करे, उसे क्रमशः प्रथम, मध्यम और उत्तम साहसके दण्डसे दण्डित करे। जो राजपुरुष कैद न करनेयोग्य (निरपराध) मनुष्योंको राजाकी आज्ञाके बिना कैद करता है और बन्धनके योग्य बन्दीको उसके अभियोगका निर्णय होनेके पहले ही छोड़ देता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यापारी कूटमान अथवा तुलासे धान-कपास आदि पण्यद्रव्यका अष्टमांश हरण करता है, वह दो सौ पणके दण्डसे दण्डनीय होता है। अपहृत द्रव्य यदि अष्टमांशसे अधिक या कम हो तो दण्डमें भी वृद्धि और कमी करनी चाहिये। ओषधि, घृत, तेल, लवण, गन्धद्रव्य, धान्य और गुड़ आदि पण्यवस्तुओंमें जो निस्सार वस्तुका मिश्रण कर देता है, राजा उसपर सोलह पण दण्ड लगावे॥ २९—३९॥
यदि व्यापारीलोग संगठित होकर राजाके द्वारा निश्चित किये हुए भावको जानते हुए भी लोभवश कारु और शिल्पियोंको पीड़ा देनेवाले मूल्यकी वृद्धि या कमी करें तो राजा उनपर एक हजार पणका दण्ड लागू करे। राजा निकटवर्ती हो तो उनके द्वारा जिस वस्तुका जो मूल्य निर्धारित कर दिया गया हो, व्यापारीगण प्रतिदिन उसी भावसे क्रय-विक्रय करें; उसमें जो बचत हो, वही बनियोंके लिये लाभकारक मानी गयी है। व्यापारी देशज वस्तुपर पाँच प्रतिशत लाभ रखे और विदेशी द्रव्यको यदि शीघ्र ही क्रय-विक्रय कर ले तो उसपर दस प्रतिशत लाभ ले। राजा दूकानका खर्च पण्यवस्तुपर रखकर उसका भाव इस प्रकार निश्चित करे, जिससे क्रेता और विक्रेताको लाभ हो॥ ४०—४३॥
विक्रीयासम्प्रदान
(प्रसङ्गप्राप्त ‘साहस’ का प्रकरण समाप्त करके अब ‘विक्रीयासम्प्रदान’ आरम्भ करते हैं। नारदजीके वचनानुसार ‘विक्रीयासम्प्रदान’ का स्वरूप इस प्रकार है—‘‘मूल्य लेकर पण्यवस्तुका विक्रय करके जब खरीदारको वह वस्तु नहीं दी जाती है, तब वह ‘विक्रीयासम्प्रदान’ (बेचकर भी वस्तुको न देना) नामक विवादास्पद कहलाता है।’’ विक्रेय वस्तु ‘चल’ और ‘अचल’के भेदसे दो प्रकारकी होती है। फिर उसके छः भेद किये गये हैं—गणित, तुलित, मेय, क्रियोपलक्षित, रूपोपलक्षित और दीप्तिसे उपलक्षित। सुपारीके फल आदि ‘गणित’ हैं; क्योंकि वे गिनकर बेचे जाते हैं। सोना, कस्तूरी और केसर आदि ‘तुलित’ हैं; क्योंकि वे तौलकर बेचे जाते हैं। शाली (अगहनी धान) आदि ‘मेय’ हैं; क्योंकि वे पात्रविशेषसे माप कर दिये जाते हैं। ‘क्रियोपलक्षित’ वस्तुमें घोड़े, भैंस आदिकी गणना है; क्योंकि उनकी चाल और दोहन आदिकी क्रियाको दृष्टिमें रखकर ही उनका क्रय-विक्रय होता है। ‘रूपोपलक्षित’ वस्तुमें पण्यस्त्री (वेश्या) आदिकी गणना है; क्योंकि उनके रूपके अनुसार ही उनका मूल्य होता है। ‘दीप्तिसे उपलक्षित’ वस्तुओंमें हीरा, मोती, मरकत और पद्मराग आदिकी गणना है। इन छहों प्रकारकी पण्यवस्तुको बेचकर, मूल्य लेकर भी यदि क्रेताको वह वस्तु नहीं दी जाती
- अध्याय २५८ * ५१७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
तो विक्रेताको किस प्रकार दण्डित करना चाहिये, यह बताते हैं—)
जो व्यापारी मूल्य लेकर भी ग्राहकको माल न दे, उससे वृद्धिसहित वह माल ग्राहकको दिलाया जाय। यदि ग्राहक परदेशका हो तो उसके देशमें ले जाकर बेचनेसे जो लाभ होता है, उस लाभसहित वह वस्तु राजा व्यापारीसे ग्राहकको दिलावे। यदि पहला ग्राहक मालमें किसी प्रकार संदेह होनेपर वस्तुको न लेना चाहे तो व्यापारी उस बेची हुई वस्तुको भी दूसरेके हाथ बेच सकता है। यदि विक्रेताके देनेपर भी ग्राहक न ले और वह पण्यवस्तु राजा या दैवकी बाधासे नष्ट हो जाय तो वह हानि क्रेताके ही दोषसे होनेके कारण वही उस हानिको सहन करेगा, बेचनेवाला नहीं। यदि ग्राहकके माँगनेपर भी उस बेची हुई पण्यवस्तुको बेचनेवाला नहीं दे और वह पण्यद्रव्य राजा या दैवके कोपसे उपहत हो जाय तो वह हानि विक्रेताकी होगी ॥ ४४-४६ ॥
जो व्यापारी किसीको बेची हुई वस्तु दूसरेके हाथ बेचता है, अथवा दूषित वस्तुको दोषरहित बतलाकर बेचता है, राजा उसपर वस्तुके मूल्यसे दुगुना अर्थदण्ड लगावे। जान-बूझकर खरीदे हुए पण्यद्रव्योंका मूल्य खरीदनेके बाद यदि बढ़ गया या घट गया तो उससे होनेवाले लाभ या हानिको जो ग्राहक नहीं जानता, उसे 'अनुशय' (माल लेनेमें आनाकानी) नहीं करनी चाहिये। विक्रेता भी यदि बढ़े हुए दामके कारण अपनेको लगे हुए घाटेको नहीं जान पाया है तो उसे भी माल देनेमें आनाकानी नहीं करनी चाहिये। इससे यह बात स्वतः स्पष्ट हो जाती है कि खरीद-बिक्रीके पश्चात् यदि ग्राहकको घाटा दिखायी दे तो वह माल लेनेमें आपत्ति कर सकता है। इसी तरह विक्रेता उस भावपर माल देनेमें यदि हानि देखे तो वह उस मालको रोक सकता है। यदि अनुशय न करनेकी स्थितिमें क्रेता या विक्रेता अनुशय करें तो उनपर पण्यवस्तुके मूल्यका छठा अंश दण्ड लगाना चाहिये ॥ ४७-४८ ॥
सम्भूयसमुत्थान
जो व्यापारी सम्मिलित होकर लाभके लिये व्यापार करते हैं, वे अपने नियोजित धनके अनुसार अथवा पहलेके समझौतेके अनुसार लाभ-हानिमें भाग ग्रहण करें। यदि उनमें कोई अपने साझीदारोंके मना करनेपर या उनके अनुमति न देनेपर, अथवा प्रमादवश किसी वस्तुमें हानि करेगा, तो क्षतिपूर्ति उसे ही करनी होगी। यदि उनमेंसे कोई पण्यद्रव्यकी विप्लवोंसे रक्षा करेगा तो वह दशांश लाभका भागी होगा ॥ ४९-५० ॥
पण्यद्रव्योंका मूल्य निश्चित करनेके कारण राजा मूल्यका बीसवाँ भाग अपने शुल्कके रूपमें ग्रहण करे। यदि कोई व्यापारी राजाके द्वारा निषिद्ध एवं राजोपयोगी वस्तुको लाभके लोभसे किसी दूसरेके हाथ बेचता है तो राजा उससे वह वस्तु बिना मूल्य दिये ले सकता है। जो मनुष्य शुल्कस्थानमें वस्तुका मिथ्या परिमाण बतलाता है, अथवा वहाँसे खिसक जानेकी चेष्टा करता है तथा जो कोई बहाना बनाकर किसी विवादास्पद वस्तुका क्रय-विक्रय करता है—इन सबपर पण्यवस्तुके मूल्यसे आठगुना दण्ड लगाना चाहिये। यदि संघबद्ध होकर काम करनेवालोंमेंसे कोई देशान्तरमें जाकर मृत्युको प्राप्त हो जाय तो उसके हिस्सेके द्रव्यको दायाद (पुत्र आदि), बान्धव (मातुल आदि) अथवा ज्ञाति (सजातीय-सपिण्ड) आकर ले लें। उनके न होनेपर उस धनको राजा ग्रहण करे। संघबद्ध होकर काम करनेवालोंमें जो कुटिल या वञ्चक हो, उसे किसी तरहका लाभ दिये बिना ही संघसे बाहर कर दे। उनमेंसे जो अपना कार्य स्वयं करनेमें असमर्थ हो, वह दूसरेसे करावे। होता आदि
५१८ * अग्निपुराण *
ऋत्विजों, किसानों तथा शिल्पकर्मोपजीवी नट, नर्तकादिकोंके लिये भी रहन-सहनका ढंग उपर्युक्त कथनसे स्पष्ट कर दिया गया॥ ५१-५४॥
स्तेय-प्रकरण
(अब 'स्तेय' अथवा चोरीके विषयमें बताया जाता है। मनुजीने 'साहस' और 'चोरी' में अन्तर बताते हुए लिखा है—"जो द्रव्य-रक्षकोंके समक्ष बलात् पराये धनको लूटा जाता है, वह 'साहस' या 'डकैती' है। तथा जो पराया धन स्वामीकी दृष्टिसे बचकर या किसीको चकमा देकर हड़प लिया जाता है, तथा 'मैंने यह कर्म किया है'—यह बात भयके कारण छिपायी जाती है, किसीपर प्रकट नहीं होने दी जाती, वह सब 'स्तेय' (चोरी) कर्म है।" चोरको कैसे पकड़ना चाहिये, यह बात बता रहे हैं—)
किसीके यहाँ चोरी होनेपर ग्राहक—राजकीय कर्मचारी या आरक्षा-विभागका सिपाही ऐसे व्यक्तिको पकड़े, जो लोगोंमें चोरीके लिये विख्यात हो—जिसे सब लोग चोर कहते हैं, अथवा जिसके पास चोरीका चिह्न—चोरी गया हुआ माल मिल जाय, उसे पकड़े। अथवा चोरीके दिनसे ही चोरके पदचिह्नोंका अनुसरण करते हुए पता लग जानेपर उस चोरको बंदी बनावे। जो पहले भी चौर्य-कर्मका अपराधी रहा हो तथा जिसका कोई शुद्ध-निश्चित निवासस्थान न हो, ऐसे व्यक्तिको भी संदेहमें कैद करे। जो पूछनेपर अपनी जाति और नाम आदिको छिपावें, जो द्यूतक्रीडा, वेश्यागमन और मद्यपानमें आसक्त हों, चोरीके विषयमें पूछनेपर जिनका मुँह सूख जाय और स्वर विकृत हो जाय, जो दूसरोंके धन और घरके विषयमें पूछते फिरें, जो गुप्तरूपसे विचरण करें, जो आय न होनेपर भी बहुत व्यय करनेवाले हों तथा जो विनष्ट द्रव्यों (फटे-पुराने वस्त्रों और टूटे-फूटे बर्तन आदि)-को बेचते हों—ऐसे अन्य लोगोंको भी चोरीके संदेहमें पकड़ लेना चाहिये। जो मनुष्य चोरीके संदेहमें पकड़ा गया हो, वह यदि अपनी निर्दोषिताको प्रमाणित न कर सके तो राजा उससे चोरीका धन दिलाकर उसे चोरका दण्ड दे। राजा चोरसे चोरीका धन दिलाकर उसे अनेक प्रकारके शारीरिक दण्ड देते हुए मरवा डाले। यह दण्ड बहुमूल्य वस्तुओंकी भारी चोरी होनेपर ही देनेयोग्य है; किंतु यदि चोरी करनेवाला ब्राह्मण हो तो उसके ललाटमें दाग देकर उसको अपने राज्यसे निर्वासित कर दे। यदि गाँवमें मनुष्य आदि किसी प्राणीका वध हो जाय, अथवा धनकी चोरी हो जाय और चोरके गाँवसे बाहर निकल जानेका कोई चिह्न न दिखायी दे तो सारा दोष ग्रामपालपर आता है। वही चोरको पकड़कर राजाके हवाले करे। यदि ऐसा न कर सके तो जिसके घरमें धनकी चोरी हुई है, उस गृहस्वामीको चोरीका सारा धन अपने पाससे दे। यदि चोरके गाँवसे बाहर निकल जानेका कोई चिह्न वह दिखा सके तो जिस भूभागमें चोरका प्रवेश हुआ है, उसका अधिपति ही चोरको पकड़वावे, अथवा चोरीका धन अपने पाससे दे। यदि विवीत-स्थानमें अपहरणकी घटना हुई है तो विवीत-स्वामीका ही सारा दोष है। यदि मार्गमें या विवीत-स्थानसे बाहर दूसरे क्षेत्रमें चोरीका कोई माल मिले या चोरका ही चिह्न लक्षित हो तो चोर पकड़नेके कामपर नियुक्त हुए मार्गपालका अथवा उस दिशाके संरक्षकका दोष होता है। यदि गाँवसे बाहर, किंतु ग्रामकी सीमाके अंदरके क्षेत्रमें चोरी आदिकी घटना घटित हो तो उस ग्रामके निवासी ही क्षतिपूर्ति करें। उनपर यह उत्तरदायित्व तभीतक आता है, जबतक चोरका पदचिह्न सीमाके बाहर गया हुआ नहीं दिखायी देता। यदि सीमाके बाहर गया दिखायी पड़े, तो जिस ग्राम आदिमें उसका
- अध्याय २५८ * ५१९
प्रवेश हो, वहींके लोग चोरको पकड़वाने और चोरीका माल वापस देनेके लिये जिम्मेदार हैं। यदि अनेक गाँवोंके बीचमें एक कोसकी सीमासे बाहर हत्या और चोरीकी घटना घटित हुई हो और अधिक जनसमूहकी दौड़-धूपसे चोरका पदचिह्न मिट गया हो तो पाँच गाँवके लोग अथवा दस गाँवके लोग मिलकर चोरको पकड़वाने तथा चोरीका माल वापस देनेका उत्तरदायित्व अपने ऊपर लें। बंदीको गुप्तरूपसे जेलसे छुड़ाकर भगा ले जानेवाले, घोड़ों और हाथियोंकी चोरी करनेवाले तथा बलपूर्वक किसीकी हत्या करनेवाले लोगोंको राजा शूलीपर चढ़वा दे। राजा वस्त्र आदिकी चोरी करनेवाले और गठरी आदि काटनेवाले चोरोंके प्रथम अपराधमें क्रमशः अङ्गुष्ठ और तर्जनी कटवा दे और दूसरी बार वही अपराध करनेपर उन दोनोंको क्रमशः एक हाथ तथा एक पैरसे हीन कर दे। जो मनुष्य जान-बूझकर चोर या हत्यारेको भोजन, रहनेके लिये स्थान, सर्दीमें तापनेके लिये अग्नि, प्यासे हुएको जल, चोरी करनेके तौर-तरीकेकी सलाह, चोरीके साधन और उसी कार्यके लिये परदेश जानेके लिये मार्गव्यय देता है, उसको उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। दूसरेके शरीरपर घातक शस्त्रसे प्रहार करने तथा गर्भवती स्त्रीके गर्भ गिरानेपर भी उत्तम साहसका ही दण्ड देना उचित है। किसी भी पुरुष या स्त्रीकी हत्या करनेपर उसके शील और आचारको दृष्टिमें रखते हुए उत्तम या अधम साहसका दण्ड देना चाहिये। जो पुरुषकी हत्या करनेवाली तथा दूसरोंको जहर देकर मारनेवाली है, ऐसी स्त्रीके गलेमें पत्थर बाँधकर उसे पानीमें फेंक देना चाहिये; (परंतु यदि वह गर्भवती हो तो उस समय उसे ऐसा दण्ड न दे।) विष देनेवाली, आग लगानेवाली तथा अपने पति, गुरु या संतानको मारनेवाली स्त्रीको कान, हाथ, नाक और ओठ काटकर उसे साँड़ोंसे कुचलवाकर मरवा डाले। खेत, घर, वन, ग्राम, रक्षित भूभाग अथवा खलिहानमें आग लगानेवाले या राजपत्नीसे समागम करनेवाले मनुष्यको सूखे नरकुल या सरकंडों-तिनकोंसे ढककर जला दे॥ ५५-६७॥
स्त्री-संग्रहण
(अब 'स्त्री-संग्रहण' नामक विवादपर विचार किया जाता है। परायी स्त्री और पराये पुरुषका मिथुनीभाव (परस्पर आलिङ्गन) 'स्त्री-संग्रहण' कहलाता है। दण्डनीयताकी दृष्टिसे इसके तीन भेद हैं—प्रथम, मध्यम और उत्तम। अयोग्य देश और कालमें, एकान्त स्थानमें, बिना कुछ बोले-चाले परायी स्त्रीको कटाक्षपूर्वक देखना और हास्य करना 'प्रथम साहस' माना गया है। उसके पास सुगन्धित वस्तु—इत्र-फुलेल आदि, फूलोंके हार, धूप, भूषण और वस्त्र भेजना तथा उन्हें खाने-पीनेका प्रलोभन देना 'मध्यम साहस' कहा गया है। एकान्त स्थानोंमें एक साथ एक आसनपर बैठना, आपसमें सटना, एक-दूसरेके केश पकड़ना आदिको 'उत्तम संग्रहण' या 'उत्तम साहस' माना गया है। संग्रहणके कार्यमें प्रवृत्त पुरुषको बंदी बना लेना चाहिये—यह बात निम्नाङ्कित श्लोकमें बता रहे हैं—)
केशग्रहणपूर्वक परस्त्रीके साथ क्रीड़ा करनेवाले पुरुषको व्यभिचारके अपराधमें पकड़ना चाहिये। सजातीय नारीसे समागम करनेवालेको एक हजार पण, अपनेसे नीच जातिकी स्त्रीसे सम्भोग करनेवालेको पाँच सौ पण एवं उच्चजातिकी नारीसे संगम करनेवालेको वधका दण्ड दे और ऐसा करनेवाली स्त्रीके नाक-कान आदि कटवा डाले। जो पुरुष परस्त्रीकी नीवी (कटिवस्त्र), स्तन, कञ्चुकी, नाभि और केशोंका स्पर्श करता है, अनुचित देशकालमें सम्भाषण करता है, अथवा उसके साथ एक आसनपर बैठता है, उसे भी
५२० * अग्निपुराण *
व्यभिचारके दोषमें पकड़ना चाहिये। जो स्त्री मना करनेपर भी परपुरुषके साथ सम्भाषण करे, उसको सौ पण और जो पुरुष निषेध करनेपर भी परस्त्रीके साथ सम्भाषण करे तो उसे दो सौ पणका दण्ड देना चाहिये। यदि वे दोनों मना करनेके बाद भी सम्भाषण करते पाये जायँ तो उन्हें व्यभिचारका दण्ड देना चाहिये। पशुके साथ मैथुन करनेवालेपर सौ पण तथा नीचजातिकी स्त्री या गौसे समागम करनेवालेपर पाँच सौ पणका दण्ड करे। किसीकी अवरुद्धा (खरीदी हुई) दासी तथा रखेल स्त्रीके साथ उसके समागमके योग्य होनेपर भी समागम करनेवाले पुरुषपर पचास पणका दण्ड लगाना चाहिये। दासीके साथ बलात्कार करनेवालेके लिये दस पणका विधान है। चाण्डाली या संन्यासिनीसे समागम करनेवाले मनुष्यके ललाटमें 'भग'का चिह्न अङ्कित करके उसे देशसे निर्वासित कर दे॥ ६८-७३॥
प्रकीर्णक-प्रकरण
जो मनुष्य राजाज्ञाको न्यूनाधिक करके लिखता है, अथवा व्यभिचारी या चोरको छोड़ देता है, राजा उसे उत्तम साहसका दण्ड दे। ब्राह्मणको अभक्ष्य पदार्थका भोजन कराके दूषित करनेवाला उत्तम साहसके दण्डका भागी होता है। कृत्रिम स्वर्णका व्यवहार करनेवाले तथा मांस बेचनेवालेको एक हजार पणका दण्ड दे और उसे नाक, कान और हाथ—इन तीन अङ्गोंसे हीन कर दे। यदि पशुओंका स्वामी समर्थ होते हुए भी अपने दाढ़ों और सींगोंवाले पशुओंसे मारे जाते हुए मनुष्यको छुड़ाता नहीं है तो उसको प्रथम साहसका दण्ड दिया जाना चाहिये। यदि पशुके आक्रमणका शिकार होनेवाला मनुष्य जोर-जोरसे चिल्लाकर पुकारे कि 'अरे! मैं मारा गया। मुझे बचाओ', उस दशामें भी यदि पशुओंका स्वामी उसके प्राण नहीं बचाता तो वह दूने दण्डका भागी होता है। जो अपने कुलमें कलङ्क लगनेके डरसे घरमें घुसे हुए जार (परस्त्रीलम्पट)-को चोर बताता है, अर्थात् 'चोर-चोर' कहकर निकालता है, उसपर पाँच सौ पण दण्ड लगाना चाहिये। जो राजाको प्रिय न लगनेवाली बात बोलता है, राजाकी ही निन्दा करता है तथा राजाकी गुप्त मन्त्रणाका भेदन करता—शत्रुपक्षके कानोंतक पहुँचा देता है, उस मनुष्यकी जीभ काटकर उसे राज्यसे निकाल देना चाहिये। मृतकके अङ्गसे उतारे गये वस्त्र आदिका विक्रय करनेवाले, गुरुकी ताड़ना करनेवाले तथा राजाकी सवारी और आसनपर बैठनेवालेको राजा उत्तम साहसका दण्ड दे। जो क्रोधमें आकर किसीकी दोनों आँखें फोड़ देता है, उस अपराधीको, जो राजाके अनन्य हितचिन्तकोंमें न होते हुए भी राजाके लिये अनिष्टसूचक फलादेश करता है, उस ज्योतिषीको तथा जो ब्राह्मण बनकर जीविका चला रहा हो, उस शूद्रको आठ सौ पणके दण्डसे दण्डित करना चाहिये। जो मनुष्य न्यायसे पराजित होनेपर भी अपनी पराजय न मानकर पुनः न्यायके लिये उपस्थित होता है, उसको धर्मपूर्वक पुनः जीतकर उसके ऊपर दुगुना दण्ड लगावे। राजाने अन्यायपूर्वक जो अर्थदण्ड लिया हो, उसे तीसगुना करके वरुणदेवताको निवेदन करनेके पश्चात् स्वयं ब्राह्मणोंको बाँट दे। जो राजा धर्मपूर्वक व्यवहारोंको देखता है, उसे धर्म, अर्थ, कीर्ति, लोकपंक्ति, उपग्रह (अर्थसंग्रह), प्रजाओंसे बहुत अधिक सम्मान और स्वर्गलोकमें सनातन स्थान—ये सात गुण प्राप्त होते हैं॥ ७४-८३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वाक्पारुष्यादि प्रकरणोंका कथन' नामक दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५८॥
- अध्याय २५९ * | ५२१ ---|---
दो सौ उनसठवाँ अध्याय
ऋग्विधान—विविध कामनाओंकी सिद्धिके लिये प्रयुक्त होनेवाले ऋग्वेदीय मन्त्रोंका निर्देश
अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ! अब मैं महर्षि पुष्करके द्वारा परशुरामजीके प्रति वर्णित ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदका विधान कहता हूँ, जिसके अनुसार मन्त्रोंके जप और होमसे भोग एवं मोक्षकी प्राप्ति होती है॥ १॥
पुष्कर बोले— परशुराम! अब मैं प्रत्येक वेदके अनुसार तुम्हारे लिये कर्तव्यकर्मोंका वर्णन करता हूँ। पहले तुम भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले 'ऋग्विधान'को सुनो। गायत्री-मन्त्रका विशेषतः प्राणायामपूर्वक जलमें खड़े होकर तथा होमके समय जप करनेवाले पुरुषकी समस्त मनोवाञ्छित कामनाओंको गायत्री देवी पूर्ण कर देती हैं। ब्रह्मन्! जो दिनभर उपवास करके केवल रात्रिमें भोजन करता और उसी दिन अनेक बार स्नान करके गायत्री-मन्त्रका दस सहस्र जप करता है, उसका वह जप समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। जो गायत्रीका एक लाख जप करके हवन करता है, वह मोक्षका अधिकारी होता है। 'प्रणव' परब्रह्म है। उसका जप सभी पापोंका हनन करनेवाला है। नाभिपर्यन्त जलमें स्थित होकर ॐकारका सौ बार जप करके अभिमन्त्रित किये गये जलको जो पीता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। गायत्रीके प्रथम अक्षर प्रणवकी तीन मात्राएँ—अकार, उकार और मकार—ये ही 'ऋक्', 'साम' और 'यजुष्'—तीन वेद हैं, ये ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीनों देवता हैं तथा ये ही गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि—तीनों अग्नियॉँ हैं। गायत्रीकी जो सात महाव्याहृतियाँ हैं, वे ही सातों लोक हैं। इनके उच्चारणपूर्वक गायत्री-मन्त्रसे किया हुआ होम समस्त पापोंका नाश करनेवाला होता है। सम्पूर्ण गायत्री-मन्त्र तथा महाव्याहृतियाँ—ये सब जप करनेयोग्य एवं उत्कृष्ट मन्त्र हैं। परशुरामजी! अघमर्षण-मन्त्र 'ऋतं च सत्यं च०' (१०।१९०।१—३) इत्यादि जलके भीतर डुबकी लगाकर जपा जाय तो सर्वपापनाशक होता है। 'अग्निमीळे पुरोहितम्०' (ऋग्वेद १।१।१)—यह ऋग्वेदका प्रथम मन्त्र अग्निदेवताका सूक्त है। अर्थात् 'अग्नि' इसके देवता हैं। जो मस्तकपर अग्निका पात्र धारण करके एक वर्षतक इस सूक्तका जप करता है, तीनों काल स्नान करके हवन करता है, गृहस्थोंके घरमें चूल्हेकी आग बुझ जानेपर उनके यहाँसे भिक्षान्न लाकर उससे जीवननिर्वाह करता है तथा उक्त प्रथम सूक्तके अनन्तर जो वायु आदि देवताओंके सात सूक्त (१।१।२ से ८ सूक्त) कहे गये हैं, उनका भी जो प्रतिदिन शुद्धचित्त होकर जप करता है, वह मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो मेधा (धारण-शक्ति)-को प्राप्त करना चाहे, वह प्रतिदिन 'सदसस्पत्ति०' (१।१८।६—८) इत्यादि तीन ऋचाओंका जप करे॥ २—११॥
'अम्बयो यन्त्यध्वभिः०' (१।२३।१६—२४) आदि—ये नौ ऋचाएँ अकालमृत्युका नाश करनेवाली कही गयी हैं। कैदमें पड़ा हुआ या अवरुद्ध (नजरबंद) द्विज 'शुनःशेपो यमह्वद्गृभीतः०' (१।२४।१२—१४) इत्यादि तीन ऋचाओंका जप करे। इसके जपसे पापी समस्त पापोंसे छूट जाता है और रोगी रोगरहित हो जाता है। जो शाश्वत कामनाकी सिद्धि एवं बुद्धिमान् मित्रकी प्राप्ति चाहता हो, वह प्रतिदिन इन्द्रदेवताके 'इन्द्रस्थ०' आदि सोलह ऋचाओंका जप करे। 'हिरण्यस्तूपः०' (१०।१४९।५) इत्यादि मन्त्रका
५२२ * अग्निपुराण *
जप करनेवाला शत्रुओंकी गतिविधियोंमें बाधा पहुँचाता है। 'ये ते पन्थाः०' (१।३५।११)—का जप करनेसे मनुष्य मार्गमें क्षेमका भागी होता है। जो रुद्रदेवता-सम्बन्धिनी छः ऋचाओंसे प्रतिदिन शिवकी स्तुति करता है, अथवा रुद्रदेवताको चरु अर्पित करता है, उसे परम शान्तिकी प्राप्ति होती है। जो प्रतिदिन 'उद्वयं तमसः०' (१।५०।१०) तथा 'उदुत्यं जातवेदसम्०' (१।५०।१)—इन ऋचाओंसे प्रतिदिन उदित होते हुए सूर्यका उपस्थान करता है तथा उनके उद्देश्यसे सात बार जलाञ्जलि देता है, उसके मानसिक दुःखका विनाश हो जाता है। 'द्विषन्तं०' इत्यादि आधी ऋचासे लेकर 'यद्विप्राः०' इत्यादि मन्त्रतकका जप और चिन्तन करे। इसके प्रभावसे अपराधी मनुष्य सात ही दिनोंमें दूसरोंके विद्वेषका पात्र हो जाता है॥ १२—१७ १/२ ॥
आरोग्यकी कामना करनेवाला रोगी 'पुरीष्यासोऽग्नयः०' (३।२२।४)—इस ऋचाका जप करे। इसी ऋचाका आधा भाग शत्रुनाशके लिये उत्तम है। अर्थात् शत्रु की बाधा दूर करनेके लिये इसका जप करना चाहिये। इसका सूर्योदयके समय जप करनेसे दीर्घ आयु, मध्याह्नमें जप करनेसे अक्षय तेज और सूर्यास्तकी वेलामें जप करनेसे शत्रुनाश होता है। 'नव यः०' (८।९३।२) आदि सूक्तका जप करनेवाला शत्रुओंका दमन करता है। सुपर्ण-सम्बन्धिनी ग्यारह ऋचाओंका जप सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाला है। अध्यात्मका प्रतिपादन करनेवाली 'क०' आदि ऋचाओंका जप करनेवाला मोक्ष प्राप्त करता है॥ १८—२१॥
'आ नो भद्राः०' (१।८९।१)—इस ऋचाके जपसे दीर्घ आयुकी प्राप्ति होती है। हाथमें समिधा लिये 'त्वं सोम०' (९।८६।२४)—इस ऋचासे शुक्लपक्षकी द्वितीयाके चन्द्रमाका दर्शन करे। जो हाथमें समिधा लेकर उक्त मन्त्रसे चन्द्रमाका उपस्थान करता है, उसे निस्सन्देह वस्त्रोंकी प्राप्ति होती है। दीर्घ आयु चाहनेवाला 'इमं०' (१।९४) आदि कौत्ससूक्तका सदा जप करे। जो मध्याह्नकालमें 'अप नः शोशुचदघम्०' (१।९७।१—८) इत्यादि ऋचाके द्वारा सूर्यदेवकी स्तुति करता है, वह अपने पापोंको उसी प्रकार त्याग देता है, जैसे कोई मनुष्य तिनकेसे सींकको अलग कर लेता है। यात्री 'जातवेदसे०' (१।९९।१)—इस मङ्गलमयी ऋचाका मार्गमें जप करे। ऐसा करके वह समस्त भयोंसे छूट जाता और कुशलपूर्वक घर लौट आता है। प्रभातकालमें इसका जप करनेसे दुःस्वप्नका नाश होता है। 'प्र मन्दिने पितुमदर्चता०' (१।१०१।१)—इस ऋचाका जप करनेसे प्रसव करनेवाली स्त्री सुखपूर्वक प्रसव करती है। 'इन्द्रम्०' (१।१०६।१) इत्यादि ऋचाका जप करते हुए सात बार बलिवैश्वदेव-कर्म करके घृतका होम करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे छूट जाता है। 'इमाम्०' (१०।८५।४५)—इस ऋचाका सदा जप करनेवाला अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। तीन दिन उपवास करके पवित्रतापूर्वक 'मा नस्तोके०' (१।११४।८—९) आदि दो ऋचाओंद्वारा गूलरकी घृतयुक्त समिधाओंका हवन करे। ऐसा करनेसे मनुष्य मृत्युके समस्त पाशोंका छेदन करके रोगहीन जीवन बिताता है। दोनों बाँहें ऊपर उठाकर इसी 'मा नस्तोके०' (१।११४।८) आदि ऋचासे भगवान् शंकरकी स्तुति करके शिखा बाँध लेनेपर मनुष्य सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंके लिये अजेय हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। जो मनुष्य हाथमें समिधाएँ लेकर 'चित्रं देवानाम्०' (१।११५।१) इत्यादि मन्त्रसे प्रतिदिन तीनों संध्याओंके समय भगवान् भास्करका उपस्थान करता है, वह मनोवाञ्छित धन प्राप्त कर लेता
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है। 'स्वप्नेनाभ्युप्या चुमुरिम्०' (२।१५।९) आदि ऋचाका प्रातः, मध्याह्न और अपराह्नमें जप करनेसे सम्पूर्ण दुःस्वप्नका नाश होता है एवं उत्तम भोजनकी प्राप्ति होती है। 'उभे पुनामि रोदसी०' (१।१३३।१)—यह मन्त्र राक्षसोंका विनाशक कहा गया है। 'उभयासो जातवेदः०' (२।२।१२-१३) आदि ऋचाओंका जप करनेवाला मनोऽभिलषित वस्तुओंको प्राप्त करता है। 'तमागन्म सोमरयः०' (८।१९।३२) ऋचाका जप करनेवाला मनुष्य आततायीके भयसे छुटकारा पाता है॥ २२—३४॥
'कया शुभा सवयसः०' (१।१६५।१)—इस ऋचाका जप करनेवाला अपनी जातिमें श्रेष्ठताको प्राप्त करता है। 'इमं नु सोमम्०' (१।१७९।५)—इस ऋचाका जप करनेसे मनुष्यको समस्त कामनाओंकी प्राप्ति होती है। 'पितुं नु स्तोषं०' (१।१८७।१) ऋचासे नित्य उपस्थान करनेपर नित्य अन्न उपस्थित होता है। 'अग्ने नय सुपथा०' (१।१८९।१)—इस सूक्तसे घृतका होम किया जाय तो वह परलोकमें उत्तम मार्ग प्रदान करनेवाला होता है। जो सदा सुश्लोकका जप करता है, वह वीरोंको न्यायके मार्गपर ले जाता है। 'कङ्कतो न कङ्कतो०' (१।१९१।१)—इस सूक्तका जप सब प्रकारके विघ्नोंका प्रभाव दूर कर देता है। 'यो जात एव प्रथमो०' (२।१२)—इस सूक्तका जप करनेवाला सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। 'गणानां त्वा०' (२।२३।१) सूक्तके जपसे उत्तम स्निग्ध पदार्थ प्राप्त होता है। 'यो मे राजन्०' (२।२८।१०)—यह ऋचा दुःस्वप्नोंका शमन करनेवाली है। मार्गमें प्रस्थित हुआ जो मनुष्य अपने सामने प्रशस्त या अप्रशस्त शत्रुको खड़ा हुआ देखे, वह 'कुविदङ्ग०' इत्यादि मन्त्रका जप करे, इससे उसकी रक्षा हो जाती है। बाईसवें उत्तम आध्यात्मिक सूक्तका पर्वकालमें जप करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। 'कृणुष्व पाजः०' (४।४।१)—इस सूक्तका जप करते हुए एकाग्रचित्तसे घीकी आहुति देनेवाला पुरुष शत्रुओंके प्राण ले सकता है तथा राक्षसोंका भी विनाश कर सकता है। जो स्वयं 'परि०' इत्यादि सूक्तसे प्रतिदिन अग्निका उपस्थान करता है, विश्वतोमुख अग्निदेव स्वयं उसकी सब ओरसे रक्षा करते हैं। 'हंसः शुचिषत्०' (४।४०।५) इत्यादि मन्त्रका जप करते हुए सूर्यका दर्शन करे। ऐसा करनेसे मनुष्य पवित्र हो जाता है॥ ३५—४३॥
कृषिमें संलग्न गृहस्थ मौन रहकर क्षेत्रके मध्यभागमें विधिवत् स्थालीपाक होम करे। ये आहुतियाँ 'इन्द्राय स्वाहा। मरुद्भ्यः स्वाहा। पर्जन्याय स्वाहा। एवं भगाय स्वाहा।'—कहकर उन-उन देवताओंके निमित्त अग्निमें डाले। फिर जैसे स्त्रीकी योनिमें बीज-वपनके लिये जननेन्द्रियका व्यापार होता है, उसी तरह किसान धान्यका बीज बोनेके लिये हराईके साथ हलका संयोग करे और 'शुनासीराविमां०' (४।५७।५)—इस ऋचाका जप भी करावे। इसके बाद गन्ध, माल्य और नमस्कारके द्वारा इन सबके अधिष्ठाता देवताओंकी पूजा करे। ऐसा करनेपर बीज बोने, फसल काटने और फसलको खेतसे खलिहानमें लानेके समय किया हुआ सारा कर्म अमोघ होता है, कभी व्यर्थ नहीं जाता। इससे सदैव कृषिकी वृद्धि होती है। 'समुद्रादूर्मिर्मधुमान्०' (४।५८।१) इस सूक्तके जपसे मनुष्य अग्निदेवसे अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति करता है। जो 'विश्वानि नो दुर्गहा०' (५।४।९-१०) आदि दो ऋचाओंसे जो अग्निदेवका पूजन करता है, वह सम्पूर्ण विपत्तियोंको पार कर जाता है और अक्षय यशकी प्राप्ति करता है। इतना ही नहीं, वह विपुल लक्ष्मी और उत्तम विजयको भी हस्तगत कर लेता है। 'अग्ने त्वम्०' (५।२४।१)—इस ऋचासे अग्निकी स्तुति करनेपर मनोवाञ्छित धनकी
५२४ * अग्निपुराण *
प्राप्ति होती है। संतानकी अभिलाषा रखनेवाला वरुणदेवता-सम्बन्धी तीन ऋचाओंका नित्य जप करे॥ ४४-५० ॥
'स्वस्ति न इन्द्रो०' (१।८९।६-८) आदि तीन ऋचाओंका सदा प्रातःकाल जप करे। यह महान् स्वस्त्ययन है। 'स्वस्ति पन्थामनु चरेम०' (५।५१।१५)—इस ऋचाका उच्चारण करके मनुष्य मार्गमें सकुशल यात्रा करता है। 'वि जिहीष्व वनस्पते०' (५।७८।५)-के जपसे शत्रु रोगग्रस्त हो जाते हैं। इसके जपसे गर्भवेदनासे मूर्च्छित स्त्रीको गर्भके संकटसे भलीभाँति छुटकारा मिल जाता है। वृष्टिकी कामना करनेवाला निराहार रहकर भीगे वस्त्र पहने हुए 'अच्छा वद०' (५।८३) आदि सूक्तका प्रयोग करे। इससे शीघ्र ही प्रचुर वर्षा होती है। पशुधनकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य 'मनसः कामम्०' (श्रीसूक्त १०) इत्यादि ऋचाका जप करे। संतानाभिलाषी पुरुष पवित्र व्रत ग्रहण करके 'कर्दमेन०' (श्रीसूक्त ११)—इस मन्त्रसे स्नान करे। राज्यकी कामना रखनेवाला मानव 'अश्वपूर्वा०' (श्रीसूक्त ३) इत्यादि ऋचाका जप करता हुआ स्नान करे। ब्राह्मण विधिवत् रोहितचर्मपर, क्षत्रिय व्याघ्रचर्मपर एवं वैश्य बकरेके चर्मपर स्नान करे। प्रत्येकके लिये दस-दस सहस्र होम करनेका विधान है। जो सदा अक्षय गोधनकी अभिलाषा रखता हो, वह गोष्ठमें जाकर 'आ गावो अग्मन्नुत भद्रम्०' (६।२८।१) ऋचाका जप करता हुआ लोकमाता गौको प्रणाम करे और गोचरभूमीत क उसके साथ जाय। राजा 'उप०' आदि तीन ऋचाओंसे अपनी दुन्दुभियोंको अभिमन्त्रित करे। इससे वह तेज और बलकी प्राप्ति करता है और शत्रुपर भी काबू पाता है। दस्युओंसे घिर जानेपर मनुष्य हाथमें तृण लेकर 'रक्षोघ्न-सूक्त' (१०।८७)-का जप करे। 'ये के च ज्मा०' (६।५२।१५)—इस ऋचाका जप करनेसे दीर्घायुकी प्राप्ति होती है। राजा 'जीमूत-सूक्त' से सेनाके सभी अङ्गोंको उसके चिह्नके अनुसार अभिमन्त्रित करे। इससे वह रणक्षेत्रमें शत्रुओंका विनाश करनेमें समर्थ होता है। 'प्राग्नये' (७।५) आदि तीन सूक्तोंके जपसे मनुष्यको अक्षय धनकी प्राप्ति होती है। 'अमीवहा०' (७।५५)—इस सूक्तका पाठ करके रात्रिमें भूतोंकी स्थापना करे। फिर संकट, विषम एवं दुर्गम स्थलमें, बन्धनमें या बन्धनमुक्त अवस्थामें, भागते अथवा पकड़े जाते समय सहायताकी इच्छासे इस सूक्तका जप करे। तीन दिन नियमपूर्वक उपवास रखकर खीर और चरु पकावे। फिर 'त्र्यम्बकं यजामहे०' (७।५९।१२) मन्त्रसे उसकी सौ आहुतियाँ भगवान् महादेवके उद्देश्यसे अग्निमें डाले तथा उसीसे पूर्णाहुति करे। दीर्घकालतक जीवित रहनेकी इच्छावाला पुरुष स्नान करके 'तच्चक्षुर्देवहितम्०' (७।६६।१६)—इस ऋचासे उदयकालिक एवं मध्याह्नकालिक सूर्यका उपस्थान करे। 'न हि०' आदि चार ऋचाओंके पाठसे मनुष्य महान् भयसे मुक्त हो जाता है। 'पर ऋणा सावीः०' (२।२८।९-१०) आदि दो ऋचाओंसे होम करनेपर ऐश्वर्यकी उपलब्धि होती है। 'इन्द्रा सोमा तपतम्०' (७।१०४)-से प्रारम्भ होनेवाला सूक्त शत्रुओंका विनाश करनेवाला कहा गया है। मोहवश जिसका व्रत भङ्ग हो गया अथवा व्रात्य-संसर्गके कारण जो पतित हो गया है, वह उपवास करके 'त्वमग्ने व्रतपा०' (८।११।१)—इस ऋचासे घृतका होम करे। 'आदित्य' और 'सम्राजा'—इन दोनों ऋचाओंका जप करनेवाला शास्त्रार्थमें विजयी होता है। 'मही०' आदि चार ऋचाओंके जपसे महान् भयसे मुक्ति मिलती है। 'यदि०' इत्यादि ऋचाका जप करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। इन्द्रदेवतासम्बन्धिनी बयालीसवीं ऋचाका जप करनेसे शत्रुओंका विनाश होता है। 'वाचं मही०'—इस ऋचाका जप करके मनुष्य आरोग्यलाभ करता है। प्रयत्नपूर्वक पवित्र
- अध्याय २५९ * ५२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
हो ‘शं नो भव०’ (८।४८।४-५)—इन दो ऋचाओंके जपपूर्वक भोजन करके हृदयका हाथसे स्पर्श करे। इससे मनुष्य कभी व्याधिग्रस्त नहीं होता। स्नान करके ‘उत्तमेदम्०’—इस मन्त्रसे हवन करके पुरुष अपने शत्रुओंका विनाश कर डालता है। ‘शंनो अग्नि०’ (७।३५)—इस सूक्तसे हवन करनेपर मनुष्य धन पाता है। ‘कन्या वाखायती०’ (८।९१)—इस सूक्तका जप करके वह दिग्भ्रमके दोषसे छुटकारा पाता है। सूर्योदयके समय ‘यदद्यकच्छ०’ (८।९३।४)—इस ऋचाका जप करनेसे सम्पूर्ण जगत् वशीभूत हो जाता है। ‘यद्वाग्०’ (८।१००।१०)—इत्यादि ऋचाके जपसे वाणी संस्कारयुक्त होती है। ‘वचोविदम्’ (८।१०१।१६) ऋचाका मन-ही-मन जप करनेवाला वाक्-शक्ति प्राप्त करता है। पावमानी ऋचाएँ परम पवित्र मानी गयी हैं। वैखानस-सम्बन्धिनी तीस ऋचाएँ भी परम पवित्र मानी गयी हैं। ऋषिश्रेष्ठ परशुराम! ‘परस्य०’ इत्यादि बासठ ऋचाएँ भी पवित्र कही गयी हैं। ‘स्वादिष्ठया०’ (९।१—६७) इत्यादि सरसठ सूक्त समस्त पापोंके नाशक, सबको पवित्र करनेवाले तथा कल्याणकारी कहे गये हैं। छः सौ दस पावमानी ऋचाएँ कही गयी हैं। इनका जप और इनसे हवन करनेवाला मनुष्य भयंकर मृत्युभयको जीत लेता है। पाप-भयके विनाशके लिये ‘आपो हि ष्ठाः’ (१०।९।१—३) इत्यादि ऋचाका जलमें स्थित होकर जप करे। ‘प्र देवत्रा ब्रह्मणे०’ (१०।३०।१)—इस ऋचाका मरुप्रदेशमें मनुष्य प्राणान्तक भयके उपस्थित होनेपर नियमपूर्वक जप करे। उससे शीघ्र भयमुक्त होकर मनुष्य दीर्घायु प्राप्त करता है। ‘प्रा वेपा मा बृहतः०’ (१०।३४।१)—इस एक ऋचाका प्रातःकाल सूर्योदयके समय मानसिक जप करे। इससे द्यूतमें विजयकी प्राप्ति होती है। ‘मा प्र गाम०’ (१०।५७।१)—इस ऋचाका जप करनेसे पथभ्रान्त मनुष्य उचित मार्गको पा जाता है। यदि अपने किसी प्रिय सुहृद्की आयु क्षीण हुई जाने तो स्नान करके ‘यत्ते यमं०’ (१०।५८।१)—इस मन्त्रका जप करते हुए उसके मस्तकका स्पर्श करे। पाँच दिनतक हजार बार ऐसा करनेसे वह लंबी आयु प्राप्त करता है। विद्वान् पुरुष ‘इदमित्था रौद्रं गूर्तवचा०’ (१०।६१।१)—इस ऋचासे घृतकी एक हजार आहुतियाँ दे। पशुओंकी इच्छा करनेवालेको गोशालामें और अर्थकामीको चौराहेपर हवन करना चाहिये। ‘वयःसुपर्णा०’ (१०।७३।११)—इस ऋचाका जप करनेवाला लक्ष्मीको प्राप्त करता है। ‘हविष्यन्तमजरं स्वर्विदि०’ (१०। ८८।१)—इस मन्त्रका जप करके मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है, उसके रोग नष्ट हो जाते हैं तथा उसकी जठराग्नि प्रबल हो जाती है। ‘या ओषधयः०’ यह मन्त्र स्वस्त्ययन (मङ्गलकारक) है। इसके जपसे रोगोंका विनाश हो जाता है। वृष्टिकी कामना करनेवाला ‘बृहस्पते अति यदर्यो०’ (२।२३।१५) आदि ऋचाका प्रयोग करे। ‘सर्वत्र०’ इत्यादि मन्त्रके जपसे अनुपम पराशान्तिकी प्राप्ति होती है, ऐसा जानना चाहिये। संतानकी कामनावाले पुरुषके लिये **‘संकाश्य-सूक्त’**का जप सदा हितकर बताया गया है। ‘अहं रुद्रेभिर्वसुभिः०’ (१०। १२५।१)—इस ऋचाके जपसे मानव प्रवचनकुशल हो जाता है। ‘रात्री व्यख्यदायती०’ (१०।१२७। १)—इस ऋचाका जप करनेवाला विद्वान् पुरुष पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होता। रात्रिके समय **‘रात्रिसूक्त’**का जप करनेवाला मनुष्य रात्रिको कुशलपूर्वक व्यतीत करता है। ‘कल्पयन्ती०’—इस ऋचाका नित्य जप करनेवाला शत्रुओंका विनाश करनेमें समर्थ होता है। ‘दाक्षायणसूक्त’ महान् आयु एवं तेजकी प्राप्ति कराता है। ‘उत देवाः०’ (१०।१३७।१)—यह रोगनाशक मन्त्र है। व्रतधारणपूर्वक इसका जप करना चाहिये। अग्निसे भय होनेपर ‘अयमग्ने
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जरिता त्वे०' (१०।१४२।१) इत्यादि ऋचाका जप करे। जंगलोंमें 'अरण्यान्य-रण्यानि०' (१०।१४६।१)—इस मन्त्रका जप करे तो भयका नाश होता है। ब्राह्मीको प्राप्त करके ब्रह्म-सम्बन्धिनी दो ऋचाओंका जप करे और पृथक्-पृथक् जलसे ब्राह्मीलता एवं शतावरीको ग्रहण करे। इससे मेधाशक्ति और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। 'शाश इत्था०' (१०।१५२।१)—यह ऋचा शत्रुनाशिनी मानी गयी है। संग्राममें विजयकी अभिलाषा रखनेवाले वीरको इसका जप करना चाहिये। 'ब्रह्मणाग्निः संविदानः०' (१०।१६२। १)—यह ऋचा गर्भमृत्युका निवारण करनेवाली है॥ ५१-९१॥
'अपेहि०' (१०।१६४)—इस सूक्तका पवित्र होकर जप करना चाहिये। यह दुःस्वप्नको नाश करनेवाला है। 'येनेदम्०' इत्यादि ऋचाका जप करके साधक परम समाधिमें स्थिर होता है। 'मयोभूर्वातः०' (१०।१६९।१)—यह ऋचा गौओंके लिये परम मङ्गलकारक है। इसके द्वारा शाम्बरी माया अथवा इन्द्रजालका निवारण करे। 'महि त्रीणामवोऽस्तु०' (१०।१८५।१)—इस कल्याणकारी ऋचाका मार्गमें जप करे। द्वेषपात्रके प्रति विद्वेष रखनेवाला पुरुष 'प्राग्नये०' (१०।१८७।१) इत्यादि ऋचाका जप करे, इससे शत्रुओंका नाश होता है। 'वास्तोष्पते०' आदि चार मन्त्रोंसे गृहदेवताका पूजन करे। यह जपकी विधि बतायी गयी है। अब हवनमें जो विशेष विधि है, वह जाननी चाहिये। होमके अन्तमें दक्षिणा देनी चाहिये। होमसे पापकी शान्ति, अन्नसे होमकी शान्ति और स्वर्णदानसे अन्नकी शान्ति होती है। इससे मिलनेवाले ब्राह्मणोंके आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहीं जाते। यजमानको सब ओरसे बाह्य स्नान करना चाहिये। सिद्धार्थक (सरसों), यव, धान्य, दुग्ध, दधि, घृत, क्षीरवृक्षकी समिधाएँ हवनमें प्रयुक्त होनेपर सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाली हैं तथा अभिचारमें कण्टकयुक्त समिधा, राई, रुधिर एवं विषका हवन करे। होमकालमें शिलोञ्छवृत्तिसे प्राप्त अन्न, भिक्षान्न, सत्तू, दूध, दही एवं फल-मूलका भोजन करना चाहिये। यह 'ऋग्विधान' कहा गया है॥ ९२-९८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'ऋग्विधानका कथन' नामक दो सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५९॥
दो सौ साठवाँ अध्याय
यजुर्विधान—यजुर्वेदके विभिन्न मन्त्रोंका विभिन्न कार्योंके लिये प्रयोग
पुष्कर कहते हैं— परशुराम! अब मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले 'यजुर्विधान' का वर्णन करता हूँ, सुनो। ॐकार-संयुक्त महाव्याहृतियाँ समस्त पापोंका विनाश करनेवाली और सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली मानी गयी हैं। विद्वान् पुरुष इनके द्वारा एक हजार घृताहुतियाँ देकर देवताओंकी आराधना करे। परशुराम! इससे मनोवाञ्छित कामनाकी सिद्धि होती है; क्योंकि यह कर्म अभीष्ट मनोरथ देनेवाला है। शान्तिकी इच्छावाला पुरुष प्रणवयुक्त व्याहृति-मन्त्रसे जौकी आहुति दे और जो पापोंसे मुक्ति चाहता हो, वह उक्त मन्त्रसे तिलोंद्वारा हवन करे। धान्य एवं पीली सरसोंके हवनसे समस्त कामनाओंकी सिद्धि होती है। परधनकी कामनावालेके लिये गूलरकी समिधाओंन्द्वारा होम प्रशस्त माना गया है। अन्न चाहनेवालेके लिये दधिसे, शान्तिकी इच्छा