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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 551, कुल 878 में से

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पृष्ठ 551

५२४ * अग्निपुराण *

प्राप्ति होती है। संतानकी अभिलाषा रखनेवाला वरुणदेवता-सम्बन्धी तीन ऋचाओंका नित्य जप करे॥ ४४-५० ॥

'स्वस्ति न इन्द्रो०' (१।८९।६-८) आदि तीन ऋचाओंका सदा प्रातःकाल जप करे। यह महान् स्वस्त्ययन है। 'स्वस्ति पन्थामनु चरेम०' (५।५१।१५)—इस ऋचाका उच्चारण करके मनुष्य मार्गमें सकुशल यात्रा करता है। 'वि जिहीष्व वनस्पते०' (५।७८।५)-के जपसे शत्रु रोगग्रस्त हो जाते हैं। इसके जपसे गर्भवेदनासे मूर्च्छित स्त्रीको गर्भके संकटसे भलीभाँति छुटकारा मिल जाता है। वृष्टिकी कामना करनेवाला निराहार रहकर भीगे वस्त्र पहने हुए 'अच्छा वद०' (५।८३) आदि सूक्तका प्रयोग करे। इससे शीघ्र ही प्रचुर वर्षा होती है। पशुधनकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य 'मनसः कामम्०' (श्रीसूक्त १०) इत्यादि ऋचाका जप करे। संतानाभिलाषी पुरुष पवित्र व्रत ग्रहण करके 'कर्दमेन०' (श्रीसूक्त ११)—इस मन्त्रसे स्नान करे। राज्यकी कामना रखनेवाला मानव 'अश्वपूर्वा०' (श्रीसूक्त ३) इत्यादि ऋचाका जप करता हुआ स्नान करे। ब्राह्मण विधिवत् रोहितचर्मपर, क्षत्रिय व्याघ्रचर्मपर एवं वैश्य बकरेके चर्मपर स्नान करे। प्रत्येकके लिये दस-दस सहस्र होम करनेका विधान है। जो सदा अक्षय गोधनकी अभिलाषा रखता हो, वह गोष्ठमें जाकर 'आ गावो अग्मन्नुत भद्रम्०' (६।२८।१) ऋचाका जप करता हुआ लोकमाता गौको प्रणाम करे और गोचरभूमीत क उसके साथ जाय। राजा 'उप०' आदि तीन ऋचाओंसे अपनी दुन्दुभियोंको अभिमन्त्रित करे। इससे वह तेज और बलकी प्राप्ति करता है और शत्रुपर भी काबू पाता है। दस्युओंसे घिर जानेपर मनुष्य हाथमें तृण लेकर 'रक्षोघ्न-सूक्त' (१०।८७)-का जप करे। 'ये के च ज्मा०' (६।५२।१५)—इस ऋचाका जप करनेसे दीर्घायुकी प्राप्ति होती है। राजा 'जीमूत-सूक्त' से सेनाके सभी अङ्गोंको उसके चिह्नके अनुसार अभिमन्त्रित करे। इससे वह रणक्षेत्रमें शत्रुओंका विनाश करनेमें समर्थ होता है। 'प्राग्नये' (७।५) आदि तीन सूक्तोंके जपसे मनुष्यको अक्षय धनकी प्राप्ति होती है। 'अमीवहा०' (७।५५)—इस सूक्तका पाठ करके रात्रिमें भूतोंकी स्थापना करे। फिर संकट, विषम एवं दुर्गम स्थलमें, बन्धनमें या बन्धनमुक्त अवस्थामें, भागते अथवा पकड़े जाते समय सहायताकी इच्छासे इस सूक्तका जप करे। तीन दिन नियमपूर्वक उपवास रखकर खीर और चरु पकावे। फिर 'त्र्यम्बकं यजामहे०' (७।५९।१२) मन्त्रसे उसकी सौ आहुतियाँ भगवान् महादेवके उद्देश्यसे अग्निमें डाले तथा उसीसे पूर्णाहुति करे। दीर्घकालतक जीवित रहनेकी इच्छावाला पुरुष स्नान करके 'तच्चक्षुर्देवहितम्०' (७।६६।१६)—इस ऋचासे उदयकालिक एवं मध्याह्नकालिक सूर्यका उपस्थान करे। 'न हि०' आदि चार ऋचाओंके पाठसे मनुष्य महान् भयसे मुक्त हो जाता है। 'पर ऋणा सावीः०' (२।२८।९-१०) आदि दो ऋचाओंसे होम करनेपर ऐश्वर्यकी उपलब्धि होती है। 'इन्द्रा सोमा तपतम्०' (७।१०४)-से प्रारम्भ होनेवाला सूक्त शत्रुओंका विनाश करनेवाला कहा गया है। मोहवश जिसका व्रत भङ्ग हो गया अथवा व्रात्य-संसर्गके कारण जो पतित हो गया है, वह उपवास करके 'त्वमग्ने व्रतपा०' (८।११।१)—इस ऋचासे घृतका होम करे। 'आदित्य' और 'सम्राजा'—इन दोनों ऋचाओंका जप करनेवाला शास्त्रार्थमें विजयी होता है। 'मही०' आदि चार ऋचाओंके जपसे महान् भयसे मुक्ति मिलती है। 'यदि०' इत्यादि ऋचाका जप करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। इन्द्रदेवतासम्बन्धिनी बयालीसवीं ऋचाका जप करनेसे शत्रुओंका विनाश होता है। 'वाचं मही०'—इस ऋचाका जप करके मनुष्य आरोग्यलाभ करता है। प्रयत्नपूर्वक पवित्र