अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 550, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २५९ * ५२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
है। 'स्वप्नेनाभ्युप्या चुमुरिम्०' (२।१५।९) आदि ऋचाका प्रातः, मध्याह्न और अपराह्नमें जप करनेसे सम्पूर्ण दुःस्वप्नका नाश होता है एवं उत्तम भोजनकी प्राप्ति होती है। 'उभे पुनामि रोदसी०' (१।१३३।१)—यह मन्त्र राक्षसोंका विनाशक कहा गया है। 'उभयासो जातवेदः०' (२।२।१२-१३) आदि ऋचाओंका जप करनेवाला मनोऽभिलषित वस्तुओंको प्राप्त करता है। 'तमागन्म सोमरयः०' (८।१९।३२) ऋचाका जप करनेवाला मनुष्य आततायीके भयसे छुटकारा पाता है॥ २२—३४॥
'कया शुभा सवयसः०' (१।१६५।१)—इस ऋचाका जप करनेवाला अपनी जातिमें श्रेष्ठताको प्राप्त करता है। 'इमं नु सोमम्०' (१।१७९।५)—इस ऋचाका जप करनेसे मनुष्यको समस्त कामनाओंकी प्राप्ति होती है। 'पितुं नु स्तोषं०' (१।१८७।१) ऋचासे नित्य उपस्थान करनेपर नित्य अन्न उपस्थित होता है। 'अग्ने नय सुपथा०' (१।१८९।१)—इस सूक्तसे घृतका होम किया जाय तो वह परलोकमें उत्तम मार्ग प्रदान करनेवाला होता है। जो सदा सुश्लोकका जप करता है, वह वीरोंको न्यायके मार्गपर ले जाता है। 'कङ्कतो न कङ्कतो०' (१।१९१।१)—इस सूक्तका जप सब प्रकारके विघ्नोंका प्रभाव दूर कर देता है। 'यो जात एव प्रथमो०' (२।१२)—इस सूक्तका जप करनेवाला सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। 'गणानां त्वा०' (२।२३।१) सूक्तके जपसे उत्तम स्निग्ध पदार्थ प्राप्त होता है। 'यो मे राजन्०' (२।२८।१०)—यह ऋचा दुःस्वप्नोंका शमन करनेवाली है। मार्गमें प्रस्थित हुआ जो मनुष्य अपने सामने प्रशस्त या अप्रशस्त शत्रुको खड़ा हुआ देखे, वह 'कुविदङ्ग०' इत्यादि मन्त्रका जप करे, इससे उसकी रक्षा हो जाती है। बाईसवें उत्तम आध्यात्मिक सूक्तका पर्वकालमें जप करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। 'कृणुष्व पाजः०' (४।४।१)—इस सूक्तका जप करते हुए एकाग्रचित्तसे घीकी आहुति देनेवाला पुरुष शत्रुओंके प्राण ले सकता है तथा राक्षसोंका भी विनाश कर सकता है। जो स्वयं 'परि०' इत्यादि सूक्तसे प्रतिदिन अग्निका उपस्थान करता है, विश्वतोमुख अग्निदेव स्वयं उसकी सब ओरसे रक्षा करते हैं। 'हंसः शुचिषत्०' (४।४०।५) इत्यादि मन्त्रका जप करते हुए सूर्यका दर्शन करे। ऐसा करनेसे मनुष्य पवित्र हो जाता है॥ ३५—४३॥
कृषिमें संलग्न गृहस्थ मौन रहकर क्षेत्रके मध्यभागमें विधिवत् स्थालीपाक होम करे। ये आहुतियाँ 'इन्द्राय स्वाहा। मरुद्भ्यः स्वाहा। पर्जन्याय स्वाहा। एवं भगाय स्वाहा।'—कहकर उन-उन देवताओंके निमित्त अग्निमें डाले। फिर जैसे स्त्रीकी योनिमें बीज-वपनके लिये जननेन्द्रियका व्यापार होता है, उसी तरह किसान धान्यका बीज बोनेके लिये हराईके साथ हलका संयोग करे और 'शुनासीराविमां०' (४।५७।५)—इस ऋचाका जप भी करावे। इसके बाद गन्ध, माल्य और नमस्कारके द्वारा इन सबके अधिष्ठाता देवताओंकी पूजा करे। ऐसा करनेपर बीज बोने, फसल काटने और फसलको खेतसे खलिहानमें लानेके समय किया हुआ सारा कर्म अमोघ होता है, कभी व्यर्थ नहीं जाता। इससे सदैव कृषिकी वृद्धि होती है। 'समुद्रादूर्मिर्मधुमान्०' (४।५८।१) इस सूक्तके जपसे मनुष्य अग्निदेवसे अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति करता है। जो 'विश्वानि नो दुर्गहा०' (५।४।९-१०) आदि दो ऋचाओंसे जो अग्निदेवका पूजन करता है, वह सम्पूर्ण विपत्तियोंको पार कर जाता है और अक्षय यशकी प्राप्ति करता है। इतना ही नहीं, वह विपुल लक्ष्मी और उत्तम विजयको भी हस्तगत कर लेता है। 'अग्ने त्वम्०' (५।२४।१)—इस ऋचासे अग्निकी स्तुति करनेपर मनोवाञ्छित धनकी