अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 549, कुल 878 में से
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जप करनेवाला शत्रुओंकी गतिविधियोंमें बाधा पहुँचाता है। 'ये ते पन्थाः०' (१।३५।११)—का जप करनेसे मनुष्य मार्गमें क्षेमका भागी होता है। जो रुद्रदेवता-सम्बन्धिनी छः ऋचाओंसे प्रतिदिन शिवकी स्तुति करता है, अथवा रुद्रदेवताको चरु अर्पित करता है, उसे परम शान्तिकी प्राप्ति होती है। जो प्रतिदिन 'उद्वयं तमसः०' (१।५०।१०) तथा 'उदुत्यं जातवेदसम्०' (१।५०।१)—इन ऋचाओंसे प्रतिदिन उदित होते हुए सूर्यका उपस्थान करता है तथा उनके उद्देश्यसे सात बार जलाञ्जलि देता है, उसके मानसिक दुःखका विनाश हो जाता है। 'द्विषन्तं०' इत्यादि आधी ऋचासे लेकर 'यद्विप्राः०' इत्यादि मन्त्रतकका जप और चिन्तन करे। इसके प्रभावसे अपराधी मनुष्य सात ही दिनोंमें दूसरोंके विद्वेषका पात्र हो जाता है॥ १२—१७ १/२ ॥
आरोग्यकी कामना करनेवाला रोगी 'पुरीष्यासोऽग्नयः०' (३।२२।४)—इस ऋचाका जप करे। इसी ऋचाका आधा भाग शत्रुनाशके लिये उत्तम है। अर्थात् शत्रु की बाधा दूर करनेके लिये इसका जप करना चाहिये। इसका सूर्योदयके समय जप करनेसे दीर्घ आयु, मध्याह्नमें जप करनेसे अक्षय तेज और सूर्यास्तकी वेलामें जप करनेसे शत्रुनाश होता है। 'नव यः०' (८।९३।२) आदि सूक्तका जप करनेवाला शत्रुओंका दमन करता है। सुपर्ण-सम्बन्धिनी ग्यारह ऋचाओंका जप सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाला है। अध्यात्मका प्रतिपादन करनेवाली 'क०' आदि ऋचाओंका जप करनेवाला मोक्ष प्राप्त करता है॥ १८—२१॥
'आ नो भद्राः०' (१।८९।१)—इस ऋचाके जपसे दीर्घ आयुकी प्राप्ति होती है। हाथमें समिधा लिये 'त्वं सोम०' (९।८६।२४)—इस ऋचासे शुक्लपक्षकी द्वितीयाके चन्द्रमाका दर्शन करे। जो हाथमें समिधा लेकर उक्त मन्त्रसे चन्द्रमाका उपस्थान करता है, उसे निस्सन्देह वस्त्रोंकी प्राप्ति होती है। दीर्घ आयु चाहनेवाला 'इमं०' (१।९४) आदि कौत्ससूक्तका सदा जप करे। जो मध्याह्नकालमें 'अप नः शोशुचदघम्०' (१।९७।१—८) इत्यादि ऋचाके द्वारा सूर्यदेवकी स्तुति करता है, वह अपने पापोंको उसी प्रकार त्याग देता है, जैसे कोई मनुष्य तिनकेसे सींकको अलग कर लेता है। यात्री 'जातवेदसे०' (१।९९।१)—इस मङ्गलमयी ऋचाका मार्गमें जप करे। ऐसा करके वह समस्त भयोंसे छूट जाता और कुशलपूर्वक घर लौट आता है। प्रभातकालमें इसका जप करनेसे दुःस्वप्नका नाश होता है। 'प्र मन्दिने पितुमदर्चता०' (१।१०१।१)—इस ऋचाका जप करनेसे प्रसव करनेवाली स्त्री सुखपूर्वक प्रसव करती है। 'इन्द्रम्०' (१।१०६।१) इत्यादि ऋचाका जप करते हुए सात बार बलिवैश्वदेव-कर्म करके घृतका होम करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे छूट जाता है। 'इमाम्०' (१०।८५।४५)—इस ऋचाका सदा जप करनेवाला अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। तीन दिन उपवास करके पवित्रतापूर्वक 'मा नस्तोके०' (१।११४।८—९) आदि दो ऋचाओंद्वारा गूलरकी घृतयुक्त समिधाओंका हवन करे। ऐसा करनेसे मनुष्य मृत्युके समस्त पाशोंका छेदन करके रोगहीन जीवन बिताता है। दोनों बाँहें ऊपर उठाकर इसी 'मा नस्तोके०' (१।११४।८) आदि ऋचासे भगवान् शंकरकी स्तुति करके शिखा बाँध लेनेपर मनुष्य सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंके लिये अजेय हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। जो मनुष्य हाथमें समिधाएँ लेकर 'चित्रं देवानाम्०' (१।११५।१) इत्यादि मन्त्रसे प्रतिदिन तीनों संध्याओंके समय भगवान् भास्करका उपस्थान करता है, वह मनोवाञ्छित धन प्राप्त कर लेता