अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 554, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २६० * ५२७
करनेवालेके लिये दुग्धसे एवं प्रचुर सुवर्णकी कामना करनेवालेके लिये अपामार्गकी समिधाओंसे हवन करना उत्तम माना गया है। कन्या चाहनेवाला एक सूत्रमें ग्रथित दो-दो जातीपुष्पोंको घीमें डुबोकर उनकी आहुति दे। ग्रामाभिलाषी तिल एवं चावलोंका हवन करे। वशीकरण कर्ममें शाखोट (सिंहेर), वासा (अडूसा) और अपामार्ग (चिचिड़ा या ऊँगा)-की समिधाओंका होम करना चाहिये। भृगुनन्दन! रोगका नाश करनेके लिये विष एवं रक्तसे सिक्त समिधाओंका हवन प्रशस्त है। शत्रुओंके वधकी इच्छासे उक्त समिधाओंका क्रोधपूर्वक भलीभाँति हवन करे। द्विज सभी धान्योंसे राजाकी प्रतिमाका निर्माण करे और उसका हजार बार हवन करे। इससे राजा वशमें हो जाता है। वस्त्राभिलाषीको पुष्पोंसे हवन करना चाहिये। दूर्वाका होम व्याधिका विनाश करनेवाला है। ब्रह्मतेजकी इच्छा करनेवाले पुरुषके लिये भगवत्प्रीत्यर्थ वासोग्र्य (उत्तम वस्त्र) अर्पण करनेका विधान है। विद्वेषण-कर्मके लिये प्रत्यङ्गिराप्रोक्त विधिके अनुसार स्थापित अग्निमें धानकी भूसी, कण्टक और भस्मके साथ काक और उलूकके पंखोंका हवन करे। ब्रह्मन् ! चन्द्रग्रहणके समय कपिला गायके घीसे गायत्री-मन्त्रद्वारा आहुति देकर उस घीमें वचाका चूर्ण मिलाकर 'सम्पात' नामक आहुति दे और अवशिष्ट वचाको लेकर उसे गायत्री-मन्त्रसे एक सहस्र बार अभिमन्त्रित करे। फिर उस वचाको खानेसे मनुष्य मेधावी होता है। लोहे या खदिर काष्ठकी ग्यारह अङ्गुल लंबी कील 'द्विषतो वधोऽसि०' (१। २८) आदि मन्त्रका जप करते हुए शत्रुके घरमें गाड़ दे। यह मैंने तुमसे शत्रुओंका नाश और उच्चाटन करनेवाला कर्म बतलाया है। 'चक्षुष्पा०' (२। १६) इत्यादि मन्त्र अथवा चाक्षुषी-जपसे मनुष्य अपनी खोयी हुई नेत्रज्योतिको पुनः पा लेता है। 'उपयुञ्जत०' इत्यादि अनुवाक अन्नकी प्राप्ति करानेवाला है।
'तनूपा अग्रेऽसि०' (३। १७) इत्यादि मन्त्रद्वारा दूर्वाका होम करनेसे मनुष्यका संकट दूर हो जाता है। 'भेषजमसि०' (३। ५९) इत्यादि मन्त्रसे दधि एवं घृतका हवन किया जाय तो वह पशुओंपर आनेवाली महामारी रोगोंको दूर कर देता है। 'त्र्यम्बकं यजामहे०' (३। ६०)—इस मन्त्रसे किया हुआ होम सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला है। कन्याका नाम लेकर अथवा कन्याके उद्देश्यसे यदि उक्त मन्त्रका जप और होम किया जाय तो वह कन्याकी प्राप्ति करानेवाला उत्तम साधन है। भय उपस्थित होनेपर 'त्र्यम्बकं०' (३। ६०) मन्त्रका नित्य जप करनेवाला पुरुष सब प्रकारके भयोंसे छुटकारा पा जाता है। परशुराम ! घृतसहित धतूरेके फूलकी उक्त मन्त्रसे आहुति देकर साधक अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो 'त्र्यम्बक' मन्त्रसे गुग्गुलकी आहुति देता है, वह स्वप्नमें भगवान् शंकरका दर्शन पाता है। 'युञ्जते मनः०' (५। १४)—इस अनुवाकका जप करनेसे दीर्घ आयुकी प्राप्ति होती है। 'विष्णो रराटमसि०' (५। २१) आदि मन्त्र सम्पूर्ण बाधाओंका निवारण करनेवाला है। यह मन्त्र राक्षसोंका नाशक, कीर्तिवर्द्धक एवं विजयप्रद है। 'अयं नो अग्निः०' (५। ३७) इत्यादि मन्त्र संग्राममें विजय दिलानेवाला है। स्नानकालमें 'इदमापः प्रवहत०' इत्यादि (६। १७) मन्त्रका जप पापनाशक है। दस अङ्गुल लंबी लोहेकी सुईको 'विश्वकर्मन् हविषा०' (१७। २२)—इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके जिस कन्याके द्वारपर गाड़ दे, वह कन्या दूसरे किसीको नहीं दी जा सकती। 'देव सवितः०' (११। ७)—इस मन्त्रसे होम करनेपर मनुष्य प्रचुर अन्न-राशिसे सम्पन्न होता है॥ १–२२॥
धर्मज्ञ जमदग्निनन्दन! बलकी इच्छा रखनेवाला श्रेष्ठ द्विज 'अग्नौ स्वाहा०' मन्त्रसे तिल, यव, अपामार्ग एवं तण्डुलोंसे युक्त हवन-सामग्रीद्वारा होम करे। विप्रवर ! इसी मन्त्रसे गोरोचनको सहस्र