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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 555, कुल 878 में से

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पृष्ठ 555

५२८ * अग्निपुराण *

बार अभिमन्त्रित करके उसका तिलक करनेसे मनुष्य लोकप्रिय हो जाता है। रुद्र-मन्त्रोंका जप सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला है। उनके द्वारा किया गया होम सम्पूर्ण कर्मोंका साधक और सर्वत्र शान्ति प्रदान करनेवाला है। धर्मज्ञ भृगुनन्दन ! बकरी, भेड़, घोड़े, हाथी, गौ, मनुष्य, राजा, बालक, नारी, ग्राम, नगर और देश यदि विविध उपद्रवोंसे पीड़ित एवं रोगग्रस्त हो गये हों, अथवा महामारी या शत्रुओंका भय उपस्थित हो गया हो तो घृतमिश्रित खीरसे रुद्रदेवताके लिये किया गया होम परम शान्तिदायक होता है। रुद्रमन्त्रोंसे कूष्माण्ड एवं घृतका होम सम्पूर्ण पापोंका विनाश करता है। नरश्रेष्ठ ! जो मानव केवल रातमें सत्तू, जौकी लप्सी एवं भिक्षान्न भोजन करते हुए एक मासतक बाहर नदी या जलाशयमें स्नान करता है, वह ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है। ‘मधुवाता०’ (१३। २७) इत्यादि मन्त्रसे होम आदिका अनुष्ठान करनेपर सब कुछ मिलता है। ‘दधिक्राव्णो०’ (२३। ३२) — इस मन्त्रसे हवन करके गृहस्थ पुत्रोंको प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं है। इसी प्रकार ‘घृतवती भुवनानामभि०’ (३४। ४५) — इस मन्त्रसे किया गया घृतका होम आयुको बढ़ानेवाला है। ‘स्वस्ति न इन्द्रो०’ (२५। १९) — यह मन्त्र समस्त बाधाओंका निवारण करनेवाला है। ‘इह गावः प्रजायध्वम्०’ — यह मन्त्र पुष्टिवर्धक है। इससे घृतकी एक हजार आहुतियाँ देनेपर दरिद्रताका विनाश होता है। ‘देवस्य त्वा०’ — इस मन्त्रसे स्रुवाद्द्वारा अपामार्ग और तण्डुलका हवन करनेपर मनुष्य विकृत अभिचारसे शीघ्र छुटकारा पा जाता है, इसमें संशय नहीं है। ‘रुद्र यत्ते०’ (१०। २०) मन्त्रसे पलाशकी समिधाओंका हवन करनेसे सुवर्णकी उपलब्धि होती है। अग्निके उत्पातमें मनुष्य ‘शिवो भव०’ (११। ४५) मन्त्रसे धान्यकी आहुति दे। ‘या सेनाः०’ (११। ७७) — इस मन्त्रसे किया गया हवन चोरोंसे प्राप्त होनेवाले भयको दूर करता है। ब्रह्मन् ! जो मनुष्य ‘यो अस्मभ्यमरातीयात्०’ (११। ८०) — इस मन्त्रसे काले तिलोंकी एक हजार आहुति देता है, वह विकृत अभिचारसे मुक्त हो जाता है। ‘अन्नपते०’ (११। ८३) — इस मन्त्रसे अन्नका हवन करनेसे मनुष्यको प्रचुर अन्न प्राप्त होता है। ‘हंसः शुचिषत्०’ (१०। २४) इत्यादि मन्त्रका जलमें किया गया जप समस्त पापोंका नाश करता है। ‘चत्वारि शृङ्गा०’ (१७।९१) इत्यादि मन्त्रका जलमें किया गया जप समस्त पापोंका अपहरण करनेवाला है। ‘देवा यज्ञमतन्वत०’ (१९। १२) इसका जप करके साधक ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। ‘वसन्तो स्यासीद्’ (३१। १४) इत्यादि मन्त्रसे घृतकी आहुति देनेपर भगवान् सूर्यसे अभीष्ट वरकी प्राप्ति होती है। ‘सुपर्णोऽसि०’ (१७। ७२) इत्यादि मन्त्रसे साध्यकर्म व्याहृति-मन्त्रोंसे साध्यकर्मके समान ही होता है। ‘नमः स्वाहा०’ आदि मन्त्रका तीन बार जप करके मनुष्य बन्धनसे मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जलके भीतर ‘द्रुपदादिव मुमुचानः०’ (२०। २०) इत्यादि मन्त्रकी तीन आवृत्तियाँ करके मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। ‘इह गावः प्रजायध्वम्०’ — इस मन्त्रसे घृत, दधि, दुग्ध अथवा खीरका हवन करनेपर बुद्धिकी वृद्धि होती है। ‘शं नो देवीः०’ (३६। १२) — इस मन्त्रसे पलाशके फलोंकी आहुति देनेसे मनुष्य आरोग्य, लक्ष्मी और दीर्घ जीवन प्राप्त करता है। ‘ओषधीः प्रतिमोदध्वम्०’ (१२। ७७) — इस मन्त्रसे बीज बोने और फसल काटनेके समय होम करनेपर अर्थकी प्राप्ति होती है। ‘अश्वावतीर्गोमतीर्न उषासो०’ (३४। ४०) मन्त्रसे पायसका होम करनेसे शान्तिकी प्राप्ति होती है। ‘तस्मा अरं गमाम०’ (३६। १६) इत्यादि मन्त्रसे होम करनेपर बन्धनग्रस्त

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