अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
५२८ * अग्निपुराण *
बार अभिमन्त्रित करके उसका तिलक करनेसे मनुष्य लोकप्रिय हो जाता है। रुद्र-मन्त्रोंका जप सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला है। उनके द्वारा किया गया होम सम्पूर्ण कर्मोंका साधक और सर्वत्र शान्ति प्रदान करनेवाला है। धर्मज्ञ भृगुनन्दन ! बकरी, भेड़, घोड़े, हाथी, गौ, मनुष्य, राजा, बालक, नारी, ग्राम, नगर और देश यदि विविध उपद्रवोंसे पीड़ित एवं रोगग्रस्त हो गये हों, अथवा महामारी या शत्रुओंका भय उपस्थित हो गया हो तो घृतमिश्रित खीरसे रुद्रदेवताके लिये किया गया होम परम शान्तिदायक होता है। रुद्रमन्त्रोंसे कूष्माण्ड एवं घृतका होम सम्पूर्ण पापोंका विनाश करता है। नरश्रेष्ठ ! जो मानव केवल रातमें सत्तू, जौकी लप्सी एवं भिक्षान्न भोजन करते हुए एक मासतक बाहर नदी या जलाशयमें स्नान करता है, वह ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है। ‘मधुवाता०’ (१३। २७) इत्यादि मन्त्रसे होम आदिका अनुष्ठान करनेपर सब कुछ मिलता है। ‘दधिक्राव्णो०’ (२३। ३२) — इस मन्त्रसे हवन करके गृहस्थ पुत्रोंको प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं है। इसी प्रकार ‘घृतवती भुवनानामभि०’ (३४। ४५) — इस मन्त्रसे किया गया घृतका होम आयुको बढ़ानेवाला है। ‘स्वस्ति न इन्द्रो०’ (२५। १९) — यह मन्त्र समस्त बाधाओंका निवारण करनेवाला है। ‘इह गावः प्रजायध्वम्०’ — यह मन्त्र पुष्टिवर्धक है। इससे घृतकी एक हजार आहुतियाँ देनेपर दरिद्रताका विनाश होता है। ‘देवस्य त्वा०’ — इस मन्त्रसे स्रुवाद्द्वारा अपामार्ग और तण्डुलका हवन करनेपर मनुष्य विकृत अभिचारसे शीघ्र छुटकारा पा जाता है, इसमें संशय नहीं है। ‘रुद्र यत्ते०’ (१०। २०) मन्त्रसे पलाशकी समिधाओंका हवन करनेसे सुवर्णकी उपलब्धि होती है। अग्निके उत्पातमें मनुष्य ‘शिवो भव०’ (११। ४५) मन्त्रसे धान्यकी आहुति दे। ‘या सेनाः०’ (११। ७७) — इस मन्त्रसे किया गया हवन चोरोंसे प्राप्त होनेवाले भयको दूर करता है। ब्रह्मन् ! जो मनुष्य ‘यो अस्मभ्यमरातीयात्०’ (११। ८०) — इस मन्त्रसे काले तिलोंकी एक हजार आहुति देता है, वह विकृत अभिचारसे मुक्त हो जाता है। ‘अन्नपते०’ (११। ८३) — इस मन्त्रसे अन्नका हवन करनेसे मनुष्यको प्रचुर अन्न प्राप्त होता है। ‘हंसः शुचिषत्०’ (१०। २४) इत्यादि मन्त्रका जलमें किया गया जप समस्त पापोंका नाश करता है। ‘चत्वारि शृङ्गा०’ (१७।९१) इत्यादि मन्त्रका जलमें किया गया जप समस्त पापोंका अपहरण करनेवाला है। ‘देवा यज्ञमतन्वत०’ (१९। १२) इसका जप करके साधक ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। ‘वसन्तो स्यासीद्’ (३१। १४) इत्यादि मन्त्रसे घृतकी आहुति देनेपर भगवान् सूर्यसे अभीष्ट वरकी प्राप्ति होती है। ‘सुपर्णोऽसि०’ (१७। ७२) इत्यादि मन्त्रसे साध्यकर्म व्याहृति-मन्त्रोंसे साध्यकर्मके समान ही होता है। ‘नमः स्वाहा०’ आदि मन्त्रका तीन बार जप करके मनुष्य बन्धनसे मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जलके भीतर ‘द्रुपदादिव मुमुचानः०’ (२०। २०) इत्यादि मन्त्रकी तीन आवृत्तियाँ करके मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। ‘इह गावः प्रजायध्वम्०’ — इस मन्त्रसे घृत, दधि, दुग्ध अथवा खीरका हवन करनेपर बुद्धिकी वृद्धि होती है। ‘शं नो देवीः०’ (३६। १२) — इस मन्त्रसे पलाशके फलोंकी आहुति देनेसे मनुष्य आरोग्य, लक्ष्मी और दीर्घ जीवन प्राप्त करता है। ‘ओषधीः प्रतिमोदध्वम्०’ (१२। ७७) — इस मन्त्रसे बीज बोने और फसल काटनेके समय होम करनेपर अर्थकी प्राप्ति होती है। ‘अश्वावतीर्गोमतीर्न उषासो०’ (३४। ४०) मन्त्रसे पायसका होम करनेसे शान्तिकी प्राप्ति होती है। ‘तस्मा अरं गमाम०’ (३६। १६) इत्यादि मन्त्रसे होम करनेपर बन्धनग्रस्त
- अध्याय २६० * ५२९
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मनुष्य मुक्त हो जाता है। ‘युवा सुवासा०’ (तै० ब्रा० ३।६।१३) इत्यादि मन्त्रसे हवन करनेपर उत्तम वस्त्रोंकी प्राप्ति होती है। ‘मुञ्चन्तु मा शपथ्यात्०’ (१२।९०) इत्यादि मन्त्रसे हवन करनेपर शाप या शपथ आदि समस्त किल्बिषोंका नाश होता है। ‘मा मा हिंसीज्जनिताः०’ (१२।१०२) इत्यादि मन्त्रसे घृतमिश्रित तिलोंका होम शत्रुओंका विनाश करनेवाला होता है। ‘नमोऽस्तु सर्पेभ्यो०’ (१३।६) इत्यादि मन्त्रसे घृतका होम एवं ‘कृणुष्व पाजः०’ (१३।९) इत्यादि मन्त्रसे खीरका होम अभिचारका उपसंहार करनेवाला है। ‘काण्डात् काण्डात्०’ (१३।२०) इत्यादि मन्त्रसे दूर्वाकाण्डकी दस हजार आहुतियाँ देकर होता ग्राम या जनपदमें फैली हुई महामारीको शान्त करे। इससे रोगपीडित मनुष्य रोगसे और दुःखग्रस्त मानव दुःखसे छुटकारा पाता है। परशुराम ! ‘मधुमान्नो वनस्पतिः०’ (१३।२९) इत्यादि मन्त्रसे उदुम्बरकी एक हजार समिधाओंका हवन करके मनुष्य धन प्राप्त करता है तथा महान् सौभाग्य एवं व्यवहारमें विजय लाभ करता है। ‘अपां गम्भन्सीद मा त्वा०’ (वा० १३।३०) इत्यादि मन्त्रसे हवन करके मनुष्य निश्चय ही पर्जन्यदेवसे वर्षा करवा सकता है। धर्मज्ञ परशुराम ! ‘अपः पिवन् वौषधीः०’ (१४।८) इत्यादि मन्त्रसे दधि, घृत एवं मधुका हवन करके यजमान तत्काल महावृष्टि करवाता है। ‘नमस्ते रुद्र०’ (१६।१) इत्यादि मन्त्रसे आहुति दी जाय तो यह कर्म समस्त उपद्रवोंका नाशक, सर्वशान्तिदायक तथा महापातकोंका निवारक कहा गया है। ‘अध्यवोचदधिवक्ता०’ (१६।५) इत्यादि मन्त्रसे आहुति देनेपर व्याधिग्रस्त मनुष्यकी रक्षा होती है। इस मन्त्रसे किया गया हवन राक्षसोंका नाशक, कीर्तिकारक तथा दीर्घायु एवं पुष्टिका वर्धक है। मार्गमें सफेद सरसों फेंकते हुए इसका जप करनेवाला राहगीर सुखी होता है। धर्मज्ञ भृगुनन्दन ! ‘असौ यस्ताम्रः०’ (१६।६)—इसका पाठ करते हुए नित्य प्रातःकाल एवं सायंकाल आलस्यरहित होकर भगवान् सूर्यका उपस्थान करे। इससे वह अक्षय अन्न एवं दीर्घ आयु प्राप्त करता है। ‘प्रमुञ्च धन्वन्०’ (१६।९—१४) इत्यादि छः मन्त्रोंसे किया गया आयुधोंका अभिमन्त्रण युद्धमें शत्रुओंके लिये भयदायक है, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। ‘मा नो महान्तम्०’ (१६।१५) इत्यादि मन्त्रका जप एवं होम बालकोंके लिये शान्तिकारक होता है। ‘नमो हिरण्यबाहवे०’ (१६।१७) इत्यादि सात अनुवाकोंसे कडुए तेलमें मिलायी गयी राईकी आहुति दे तो वह शत्रुओंका नाश करनेवाली होती है। ‘नमो वः किरिकेभ्यो०’ (१६।४६)—इस अर्धमन्त्रसे एक लाख कमल-पुष्पोंका हवन करके मनुष्य राज्यलक्ष्मी प्राप्त कर लेता है तथा बिल्वफलोंसे उतनी ही आहुतियाँ देनेपर उसे सुवर्णराशिकी उपलब्धि होती है। ‘इमा रुद्राय०’ (१६।४८) मन्त्रसे तिलोंका होम करनेपर धनकी प्राप्ति होती है। एवं इसी मन्त्रसे घृतसिक्त दूर्वाका हवन करनेपर मनुष्य समस्त व्याधियोंसे मुक्त होता है। परशुराम ! ‘आशुः शिशानः०’ (१७।३३)—यह मन्त्र आयुधोंकी रक्षा एवं संग्राममें सम्पूर्ण शत्रुओंका विनाश करनेवाला है। धर्मज्ञ द्विजश्रेष्ठ ! ‘वाजश्च मे०’ (१८।१५—१९) इत्यादि पाँच मन्त्रोंसे घृतकी एक हजार आहुतियाँ दे। इससे मनुष्य नेत्ररोगसे मुक्त हो जाता है। ‘शं नो वनस्पते०’ (१९।३८) इस मन्त्रसे घरमें आहुति देनेपर वास्तुदोषका नाश होता है। ‘अग्न आयूंषि०’ (१९।३८) इत्यादि मन्त्रसे घृतका हवन करके मनुष्य किसीका द्वेषपात्र नहीं होता। ‘अपां फेनेन०’ (१९।७१) मन्त्रसे लाजाका होम करके योद्धा विजय प्राप्त करता है। ‘भद्रा उत प्रशस्तयो०’ (१४।३९) इत्यादि
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मन्त्रके जपसे इन्द्रियहीन अथवा दुर्बलेन्द्रिय मनुष्य समस्त इन्द्रियोंकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। ‘अग्निश्च पृथिवी च०’ (२६।१) इत्यादि मन्त्र उत्तम वशीकरण है। ‘अध्वना०’ (५।३३) आदि मन्त्रका जप करनेवाला मनुष्य व्यवहार (मुकदमे)-में विजयी होता है। कार्यके आरम्भमें ‘ब्रह्म क्षत्रं पवते०’ (१९।५) इत्यादि मन्त्रका जप सिद्धि प्रदान करता है। ‘संवत्सरोऽसि०’ (२७।४५) इत्यादि मन्त्रसे घृतकी एक लाख आहुतियाँ देनेवाला रोगमुक्त हो जाता है। ‘केतुं कृण्वन्०’ (२९।३७) इत्यादि मन्त्र संग्राममें विजय दिलानेवाला है। ‘इन्द्रोऽग्निर्धर्मः०’ मन्त्र युद्धमें धर्मसंगत विजयकी प्राप्ति कराता है। ‘धन्वना गा०’ (२९।३९) मन्त्रका धनुष ग्रहण करनेके समय जप करना उत्तम माना गया है। ‘यजीत०’— यह मन्त्र धनुषकी प्रत्यञ्चाको अभिमन्त्रित करनेके लिये है, ऐसा जानना चाहिये। ‘अहिरिव भोगैः०’ (२९।५१) मन्त्रका बाणोंको अभिमन्त्रित करनेमें प्रयोग करे। ‘वह्नीनां पिता०’ (२९।४२)—यह तूणीरको अभिमन्त्रित करनेका मन्त्र बतलाया गया है। ‘युञ्जन्त्यस्य०’ (२३।६) इत्यादि मन्त्र अश्वोंको रथमें जोतनेके लिये उपयोगी बताया गया है। ‘आशुः शिशानः०’ (१७।३३)—यह मन्त्र यात्रारम्भके समय मङ्गलके रूपमें पठनीय कहा जाता है। ‘विष्णोः क्रमोऽसि०’ (१२।५) मन्त्रका पाठ रथारोहणके समय करना उत्तम है। ‘आजङ्घन्ति०’ (२९।५०)—इस मन्त्रसे अश्वको प्रेरित करनेके लिये प्रथम बार चाबुकसे हाँके। ‘याः सेना अभित्वरीः०’ (११।७७) इत्यादि मन्त्रका शत्रुसेनाके सम्मुख जप करे। ‘दुन्दुभ्यः०’ इत्यादि मन्त्रसे दुन्दुभि या नगारेको पीटे। इन मन्त्रोंसे पहले हवन करके तब उपर्युक्त कर्म करनेपर योद्धाको संग्राममें विजय प्राप्त होती है। विद्वान् पुरुष ‘यमेन दत्तं०’ (२९।१३)—इस मन्त्रसे एक करोड़ आहुतियाँ देकर संग्रामके लिये शीघ्र ही विजयप्रद रथ उत्पन्न कर सकता है। ‘आकृष्णेन०’ (३४।३१) इत्यादि मन्त्रसे साध्यकर्म व्याहृतियोंके समान ही होता है। ‘यज्जाग्रतो०’ (३४।१) इत्यादि शिवसंकल्प-सम्बन्धी सूक्तोंके जपसे साधकका मन एकाग्र होता है। ‘पञ्चनद्यः०’ (३४।११) इत्यादि मन्त्रसे पाँच लाख घीकी आहुतियाँ देनेपर लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। ‘यदाबध्नन् दाक्षायणाः०’ (३४।५२)—इस मन्त्रसे हजार बार अभिमन्त्रित करके सुवर्णको धारण करे। यह प्रयोग शत्रुओंका निवारण करनेवाला होता है। ‘इमं जीवेभ्यः०’ (३५।१५) मन्त्रसे शिला अथवा ढेलेको अभिमन्त्रित करके घरमें चारों ओर फेंक दे। ऐसा करनेवालेको रातमें चोरोंसे भय नहीं होता। ‘परीमे गामनेषत्०’ (३५।१८)—यह उत्तम वशीकरण-मन्त्र है। इस मन्त्रके प्रयोगसे मारनेके लिये आया हुआ मनुष्य भी वशमें हो जाता है। धर्मात्मन्! उक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित भक्ष्य, ताम्बूल, पुष्प आदि किसीको दे दिया जाय तो वह शीघ्र ही देनेवालेके वशीभूत हो जायगा। ‘शं नो मित्रः०’ (३६।९)—यह मन्त्र सदैव सभी स्थानोंपर शान्ति प्रदान करनेवाला है। ‘गणानां त्वा गणपतिं०’ (२३।१९)—इस मन्त्रसे चौराहेपर सप्तधान्यका हवन करके होता सम्पूर्ण जगत्को वशीभूत कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। ‘हिरण्यवर्णाः शुचयः०’— इस मन्त्रका अभिषेकमें प्रयोग करना चाहिये। ‘शं नो देवीरभीष्टये०’ (३६।१२)—यह मन्त्र परम शान्तिकारक है। ‘एकचक्र०’ इत्यादि मन्त्रसे आज्यभागपूर्वक ग्रहोंके लिये घीकी आहुति देनेपर साधकको शान्ति प्राप्त होती है और निस्संदेह उसे ग्रहोंका कृपाप्रसाद सुलभ हो जाता है। ‘गाव उपावतावम्०’ (३३।२९) एवं ‘भग प्रणेतः०’
- अध्याय २६१ * ५३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
(३४।३६-३७) इत्यादि दो मन्त्रोंसे घृतका हवन करके मनुष्य गौओंकी प्राप्ति करता है। 'प्रवादां षः सोपतु०' — इस मन्त्रका ग्रहयज्ञमें प्रयोग होता है। 'देवेभ्यो वनस्पते०' इत्यादि मन्त्रका वृक्षयज्ञमें विनियोग होता है। गायत्रीको विष्णुरूपा जाने। समस्त पापोंका प्रशमन एवं समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला विष्णुका परमपद भी वही है॥ २३-८४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'यजुर्वेद-विधान-कथन' नामक दो सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६०॥
दो सौ इकसठवाँ अध्याय
सामविधान — सामवेदोक्त मन्त्रोंका भिन्न-भिन्न कार्योंके लिये प्रयोग
पुष्कर कहते हैं — परशुराम! मैंने तुम्हें 'यजुर्विधान' कह सुनाया, अब मैं 'सामविधान' कहूँगा। 'वैष्णवी-संहिता' का जप करके उसका दशांश होम करे। इससे मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका भागी होता है। 'छान्दसी-संहिता' का विधिपूर्वक जप करके मानव भगवान् शंकरको प्रसन्न कर लेता है। 'स्कन्द-संहिता' और 'पितृ-संहिता'का जप करनेसे प्रसन्नताकी प्राप्ति होती है। 'यत इन्द्र भजामहे०' (१३२१) — इस मन्त्रका जप हिंसा-दोषका नाश करनेवाला है। 'अग्निस्तिग्मेन०' (२२) इत्यादि मन्त्रका जप करनेवाला अवकीर्णी (जिसका ब्रह्मचर्यावस्थामें ही ब्रह्मचर्य खण्डित हो गया हो, वह) पुरुष भी अपने पाप-दोषसे मुक्त हो जाता है। 'परीतोऽषिञ्चता सुतम्०' (५१२) इत्यादि साममन्त्र समस्त पापोंका नाश करनेवाला है, ऐसा जानना चाहिये। जिसने प्रमादवश निषिद्ध वस्तुका विक्रय कर लिया हो, वह उसके प्रायश्चित्तरूपसे 'घृतवती भुवना०' (३७८) इत्यादि मन्त्रका जप करे। 'अद्य नो देव सवितः०' (१४१) — यह मन्त्र दुःस्वप्नोंका नाश करनेवाला है। भृगुश्रेष्ठ परशुराम! 'अबोध्यूग्निः०' (१७४६) इत्यादि मन्त्रसे विधिवत् घृतका हवन करे। फिर शेष घृतसे मेखलाबन्ध (करधनी आदि)-का सेचन करे। वह मेखलाबन्ध ऐसी स्त्रियोंको धारण करावे, जिनके गर्भ गिर जाते रहे हों। तदनन्तर बालकके उत्पन्न होनेपर उसे पूर्वोक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित मणि पहनावे। 'सोमं राजानम्०' (९१) मन्त्रके जपसे रोगी व्याधियोंसे छुटकारा पाता है। सर्प-सामका प्रयोग करनेवालेको कभी सर्पोंसे भय नहीं प्राप्त होता। ब्राह्मण 'मा पापत्वाय नोः०' (९१८) — इस मन्त्रसे सहस्र आहुतियाँ देकर शतावरीयुक्त मणि बाँधनेसे शस्त्रभयको नहीं प्राप्त होता। 'दीर्घतमसोऽर्कः०' — इस साममन्त्रसे हवन करनेपर प्रचुर अन्नकी प्राप्ति होती है। 'समन्या यन्तिः०' (६०७) — इस सामका जप करनेवाला प्याससे नहीं मर सकता। 'त्वमिमा ओषधीः०' (६०४) — इस मन्त्रका जप करनेसे मनुष्य कभी व्याधिग्रस्त नहीं होता। मार्गमें 'देवव्रत-साम' का जप करके मानव भयसे छुटकारा पा जाता है। 'यदिन्द्रो अनुनयत्०' (१४८) — यह मन्त्र हवन करनेपर सौभाग्यकी वृद्धि करता है। परशुराम! 'भगो न चित्रो०' (४४९) — इस मन्त्रका जप करके नेत्रोंमें लगाया गया अञ्जन हितकारक एवं सौभाग्यवर्द्धक होता है, इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। 'इन्द्र' — इस पदसे प्रारम्भ होनेवाले मन्त्रवर्गका जप करे। इससे सौभाग्यकी वृद्धि होती है। 'परि प्रिया दिवः कविः०' (४७६) — यह मन्त्र, जिसे प्राप्त करनेकी इच्छा
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हो, उस स्त्रीको सुनावे। परशुराम! ऐसा करनेसे वह स्त्री उसे चाहने लगती है, इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। ‘रथन्तर-साम’ एवं ‘वामदेव्य-साम’ ब्रह्मतेजकी वृद्धि करनेवाले हैं। ‘इन्द्रमिद्गाथिनो०’ (१९८) इत्यादि मन्त्रका जप करके घृतमें मिलाया हुआ बचा चूर्ण प्रतिदिन बालकको खिलाये। इससे वह श्रुतिधर हो जाता है, अर्थात् एक बार सुननेसे ही उसे शास्त्रकी पंक्तियाँ याद हो जाती हैं। ‘रथन्तर-साम’ का जप एवं उसके द्वारा होम करके पुरुष निस्संदेह पुत्र प्राप्त कर लेता है। ‘मयि श्रीः०’ (‘मयि वर्चो अथो०’) (६०२) — यह मन्त्र लक्ष्मीकी वृद्धि करनेवाला है। इसका जप करना चाहिये। प्रतिदिन ‘वैरूप्याष्टक’ (वैरूप्य सामके आठ मन्त्र)-का पाठ करनेवाला लक्ष्मीकी प्राप्ति करता है। ‘सप्ताष्टक’का प्रयोग करनेवाला समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आलस्यरहित होकर ‘गव्योषुणो यथा०’ (१८६) — इस मन्त्रसे गौओंका उपस्थान करता है, उसके घरमें गौएँ सदा बनी रहती हैं। ‘वात आ वातु भेषजम्०’ (१८४) मन्त्रसे एक द्रोण घृतमिश्रित यवोंका विधिपूर्वक होम करके मनुष्य सारी मायाको नष्ट कर देता है। ‘प्र दैवोदासो०’ (५१) आदि सामसे तिलोंका होम करके मनुष्य अभिचारकर्मको शान्त कर देता है। ‘अभि त्वा शूर नोनुमो०’ (२३३) — इस सामको अन्तमें वषट्कारसे संयुक्त करके [इससे वासक (अड़ूसा) वृक्षकी एक हजार समिधाओंका होम युद्धमें विजयकी प्राप्ति करानेवाला है।] उसके साथ ‘वामदेव्यसाम’का सहस्र बार जप और उसके द्वारा होम किया जाय तो वह युद्धमें विजयदायक होता है। विद्वान् पुरुष सुन्दर पिष्टमय हाथी, घोड़े एवं मनुष्योंका निर्माण करे। फिर शत्रुपक्षके प्रधान-प्रधान वीरोंको लक्ष्यमें रखकर उन पसीजे हुए पिष्टकमय पुरुषोंके छूरेसे टुकड़े-टुकड़े कर डाले। तदनन्तर मन्त्रवेत्ता पुरुष उन्हें सरसोंके तेलमें भिगोकर ‘अभि त्वा शूर नोनुमो०’ (२३३)—इस मन्त्रसे उनका क्रोधपूर्वक हवन करे। बुद्धिमान् पुरुष यह अभिचारकर्म करके संग्राममें विजय प्राप्त करता है। गारुड, वामदेव्य, रथन्तर एवं बृहद्रथ-साम निस्संदेह समस्त पापोंका शमन करनेवाले कहे गये हैं॥ १-२४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘साम-विधान’ नामक दो सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६१॥
दो सौ बासठवाँ अध्याय
अथर्वविधान — अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंका विभिन्न कर्मोंमें विनियोग
पुष्कर कहते हैं — परशुराम! ‘सामविधान’ कहा गया। अब मैं ‘अथर्वविधान’का वर्णन करूँगा। शान्तातियगणके उद्देश्यसे हवन करके मानव शान्ति प्राप्त करता है। भैषज्यगणके उद्देश्यसे होम करके होता समस्त रोगोंको दूर करता है। त्रिसप्ततीयगणके उद्देश्यसे आहुतियाँ देनेवाला सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। अभयगणके उद्देश्यसे होम करनेपर मनुष्य किसी स्थानपर भी भय नहीं प्राप्त करता। परशुराम! अपराजितगणके उद्देश्यसे हवन करनेवाला कभी पराजित नहीं होता। आयुष्यगणके उद्देश्यसे आहुतियाँ देकर मानव दुर्मृत्युको दूर कर देता है। स्वस्त्ययनगणके उद्देश्यसे हवन करनेपर सर्वत्र मङ्गलकी प्राप्ति होती है। शर्मवर्मगणके उद्देश्यसे होम करनेवाला कल्याणका भागी होता है। वास्तोष्पत्यगणके उद्देश्यसे आहुतियाँ देनेपर वास्तुदोषकी शान्ति होती है। रौद्रगणके लिये
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हवन करके होता सम्पूर्ण दोषोंका विनाश कर देता है। निम्नाङ्कित अठारह प्रकारकी शान्तियोंमें इन दस गणोंके द्वारा होम करना चाहिये। (वे अठारह शान्तियाँ ये हैं—) वैष्णवी, ऐन्द्री, ब्राह्मी, रौद्री, वायव्या, वारुणी, कौबेरी, भार्गवी, प्राजापत्या, त्वाष्ट्री, कौमारी, आग्नेयी, मारुद्गणी, गान्धर्वी, नैर्ऋतितीकी, आङ्गिरसी, याम्या एवं कामनाओंको पूर्ण करनेवाली पार्थिवी शान्ति॥ १-८ $\frac{३}{२}$॥
'यस्त्वां मृत्युः०' इत्यादि आथर्वण-मन्त्रका जप मृत्युका नाश करनेवाला है। 'सुपर्णस्त्वा०' (४।६।३)—इस मन्त्रसे होम करनेपर मनुष्यको सर्पोंसे बाधा नहीं प्राप्त होती। 'इन्द्रेण दत्तो०' (२।२९।४)—यह मन्त्र सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है। 'इन्द्रेण दत्तो०' यह मन्त्र समस्त बाधाओंका भी विनाश करनेवाला है। 'इमा या देवी' (२।१०।४)—यह मन्त्र सभी प्रकारकी शान्तियोंके लिये उत्तम है। 'देवा मरुतः'—यह मन्त्र समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है। 'यमस्य लोकाद्०' (१९।५६।१)—यह मन्त्र दुःस्वप्नका नाश करनेमें उत्तम है। 'इन्द्रश्च पञ्च वणिजः०'—यह मन्त्र परमपुण्यका लाभ करानेवाला है। 'कामो मे वाजी०' मन्त्रसे हवन करनेपर स्त्रियोंके सौभाग्यकी वृद्धि होती है। 'तुभ्यमेव०' (२।२८।१) इत्यादि मन्त्रको नित्य दस हजार जप करते हुए उसका दशांश हवन करे एवं 'अग्ने गोभिर्नः०' मन्त्रसे होम करे तो उत्तम मेधाशक्तिकी वृद्धि होती है। 'ध्रुवं ध्रुवेण०' (७।८४।१) इत्यादि मन्त्रसे होम किया जाय तो वह स्थानकी प्राप्ति कराता है। 'अलक्तजीवेति शुना०'—यह मन्त्र कृषि-लाभ करानेका साधन है। 'अहं ते भग्नः'—यह मन्त्र सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला है। 'ये मे पाशाः०' मन्त्र बन्धनसे छुटकारा दिलाता है। 'शपत्वहन्०'—इस मन्त्रका जप एवं होम करनेसे मनुष्य अपने शत्रुओंका विनाश कर सकता है। 'त्वमुत्तमम्०'—यह मन्त्र यश एवं बुद्धिका विस्तार करनेवाला है। 'यथा मृगाः०' (५।२१।४)—यह मन्त्र स्त्रियोंके सौभाग्यको बढ़ानेवाला है। 'येन चेह दिशं चैव०'—यह मन्त्र गर्भकी प्राप्ति करानेवाला है। 'अयं ते योनिः०' (३।२०।१)—इस मन्त्रके अनुष्ठानसे पुत्रलाभ होता है। 'शिवः शिवाभिः०' इत्यादि मन्त्र सौभाग्यवर्धक है। 'बृहस्पतिर्नः परि पातु०' (७।५१।१) इत्यादि मन्त्रका जप मार्गमें मङ्गल करनेवाला है। 'मुञ्चामि त्वा०' (३।११।१)—यह मन्त्र अपमृत्युका निवारक है। अथर्वशीर्षका पाठ करनेवाला समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। यह मैंने तुमसे प्रधानतया मन्त्रोंके द्वारा साध्य कुछ कर्म बताये हैं। परशुराम! यज्ञ-सम्बन्धी वृक्षोंकी समिधाएँ सबसे मुख्य हविष्य हैं। इसके सिवा घृत, धान्य, श्वेत सर्षप, अक्षत, तिल, दधि, दुग्ध, कुश, दूर्वा, बिल्व और कमल—ये सभी द्रव्य शान्तिकारक एवं पुष्टिकारक बताये गये हैं। धर्मज्ञ! तेल, कण, राई, रुधिर, विष एवं कण्टकयुक्त समिधाओंका अभिचारकर्ममें प्रयोग करे। जो मन्त्रोंके ऋषि, देवता, छन्द और विनियोगको जानता है, वही उन-उन मन्त्रोंद्वारा कथित कर्मोंका अनुष्ठान करे॥ ९—२५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अथर्वविधान' नामक दो सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६२॥
५३४ * अग्निपुराण *
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दो सौ तिरसठवाँ अध्याय
नाना प्रकारके उत्पात और उनकी शान्तिके उपाय
पुष्कर कहते हैं— परशुराम! प्रत्येक वेदके 'श्रीसूक्त'को जानना चाहिये। वह लक्ष्मीकी वृद्धि करनेवाला है। 'हिरण्यवर्णां हरिणीं' इत्यादि पंद्रह ऋचाएँ ऋग्वेदीय श्रीसूक्त हैं। 'रथे०' (२९—४३) 'अक्षराजाय०', (३०।१८) 'वाजः०', (१८।३४) एवं 'चतस्रः०' (१८।३२)—ये चार मन्त्र यजुर्वेदीय श्रीसूक्त हैं। 'श्रावन्तीय-साम' सामवेदीय श्रीसूक्त है तथा 'श्रियं धातर्मयि धेहि' यह अथर्ववेदका श्रीसूक्त कहा गया है। जो भक्तिपूर्वक श्रीसूक्तका जप एवं होम करता है, उसे निश्चय ही लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। श्रीदेवीकी प्रसन्नताके लिये कमल, बेल, घी अथवा तिलकी आहुति देनी चाहिये॥ १—३$\frac{१}{२}$॥
प्रत्येक वेदमें एक ही 'पुरुषसूक्त' मिलता है, जो सब कुछ देनेवाला है। जो स्नान करके 'पुरुषसूक्त'के एक-एक मन्त्रसे भगवान् श्रीविष्णुको एक-एक जलाञ्जलि और एक-एक फूल समर्पित करता है, वह पापरहित होकर दूसरोंके भी पापका नाश करनेवाला हो जाता है। स्नान करके इस सूक्तके एक-एक मन्त्रके साथ श्रीविष्णुको फल समर्पित करके पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंका भागी होता है। 'पुरुषसूक्त'के जपसे महापातकों और उपपातकोंका नाश हो जाता है। कृच्छ्रव्रत करके शुद्ध हुआ मनुष्य स्नानपूर्वक 'पुरुषसूक्त'का जप एवं होम करके सब कुछ पा लेता है॥ ४—६$\frac{१}{२}$॥
अठारह शान्तियोंमें समस्त उत्पातोंका उपसंहार करनेवाली अमृता, अभया और सौम्या—ये तीन शान्तियाँ सर्वोत्तम हैं। 'अमृता शान्ति' सर्वदैवत्या, 'अभया' ब्रह्मदैवत्या एवं 'सौम्या' सर्वदैवत्या है। इनमेंसे प्रत्येक शान्ति सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली है। भृगुश्रेष्ठ! 'अभया' शान्तिके लिये वरुणवृक्षके मूलभागकी मणि बनानी चाहिये। 'अमृता' शान्तिके लिये दूर्वामूलकी मणि एवं 'सौम्या' शान्तिके लिये शङ्खमणि धारण करे। इसके लिये उन-उन शान्तियोंके देवताओंसे सम्बद्ध मन्त्रोंको सिद्ध करके मणि बाँधनी चाहिये। ये शान्तियाँ दिव्य, आन्तरिक्ष एवं भौम उत्पातोंका शमन करनेवाली हैं। 'दिव्य', 'आन्तरिक्ष' और 'भौम'—यह तीन प्रकारका अद्भुत उत्पात बताया जाता है, सुनो। ग्रहों एवं नक्षत्रोंकी विकृतिसे होनेवाले उत्पात 'दिव्य' कहलाते हैं। अब 'आन्तरिक्ष' उत्पातका वर्णन सुनो। उल्कापात, दिग्दाह, परिवेश, सूर्यपर घेरा पड़ना, गन्धर्व नगरका दर्शन एवं विकारयुक्त वृष्टि—ये अन्तरिक्ष-सम्बन्धी उत्पात हैं। भूमिपर एवं जंगम प्राणियोंसे होनेवाले उपद्रव तथा भूकम्प—ये 'भौम' उत्पात हैं। इन त्रिविध उत्पातोंके दीखनेके बाद एक सप्ताहके भीतर यदि वर्षा हो जाय तो वह 'अद्भुत' निष्फल हो जाता है। यदि तीन वर्षतक अद्भुत उत्पातकी शान्ति नहीं की गयी तो वह लोकके लिये भयकारक होता है। जब देवताओंकी प्रतिमाएँ नाचती, काँपती, जलती, शब्द करती, रोती, पसीना बहाती या हँसती हैं, तब प्रतिमाओंके इस विकारकी शान्तिके लिये उनका पूजन एवं प्राजापत्य-होम करना चाहिये। जिस राष्ट्रमें बिना जलाये ही घोर शब्द करती हुई आग जल उठती है और इन्धन डालनेपर भी प्रज्वलित नहीं होती, वह राष्ट्र राजाओंके द्वारा पीड़ित होता है॥ ७—१६॥
भृगुनन्दन! अग्नि-सम्बन्धी विकृतिकी शान्तिके लिये अग्निदैवत्य-मन्त्रोंसे हवन बताया गया है। जब वृक्ष असमयमें ही फल देने लगें तथा दूध और रक्त बहावें तो वृक्षजनित भौम-उत्पात होता है। वहाँ शिवका पूजन करके इस उत्पातकी
- अध्याय २६४ * ५३५
शान्ति करावे। अतिवृष्टि और अनावृष्टि—दोनों ही दुर्भिक्षका कारण मानी गयी हैं। वर्षा-ऋतुके सिवा अन्य ऋतुओंमें तीन दिनतक अनवरत वृष्टि होनेपर उसे भयानक जानना चाहिये। पर्जन्य, चन्द्रमा एवं सूर्यके पूजनसे वृष्टि-सम्बन्धी वैकृत्य (उपद्रव)-का विनाश होता है। जिस नगरसे नदियाँ दूर हट जाती हैं या अत्यधिक समीप चली आती हैं और जिसके सरोवर एवं झरने सूख जाते हैं, वहाँ जलाशयोंके इस विकारको दूर करनेके लिये वरुणदेवता-सम्बन्धी मन्त्रका जप करना चाहिये। जहाँ स्त्रियाँ असमयमें प्रसव करें, समयपर प्रसव न करें, विकृत गर्भको जन्म दें या युग्म-संतान आदि उत्पन्न करें, वहाँ स्त्रियोंके प्रसव-सम्बन्धी वैकृत्यके निवारणार्थ साध्वी स्त्रियों और ब्राह्मण आदिका पूजन करे॥ १७—२२$\frac{१}{२}$॥
जहाँ घोड़ी, हथिनी या गौ एक साथ दो बच्चोंको जनती हैं या विकारयुक्त विजातीय संतानको जन्म देती हैं, छः महीनोंके भीतर प्राणत्याग कर देती हैं अथवा विकृत गर्भका प्रसव करती हैं, उस राष्ट्रको शत्रुमण्डलसे भय होता है। पशुओंके इस प्रसव-सम्बन्धी उत्पातकी शान्तिके उद्देश्यसे होम, जप एवं ब्राह्मणोंका पूजन करना चाहिये। जब अयोग्य पशु सवारीमें आकर जुत जाते हैं, योग्य पशु यानका वहन नहीं करते हैं एवं आकाशमें तूर्यनाद होने लगता है, उस समय महान् भय उपस्थित होता है। जब वन्यपशु एवं पक्षी ग्राममें चले जाते हैं, ग्राम्यपशु वनमें चले जाते हैं, स्थलचर जीव जलमें प्रवेश करते हैं, जलचर जीव स्थलपर चले जाते हैं, राजद्वारपर गीदड़ियाँ आ जाती हैं, मुर्गे प्रदोषकालमें शब्द करें, सूर्योदयके समय गीदड़ियाँ रुदन करें, कबूतर घरमें घुस आवें, मांसभोजी पक्षी सिरपर मँडराने लगें, साधारण मक्खी मधु बनाने लगें, कौए सबकी आँखोंके सामने मैथुनमें प्रवृत्त हो जायें, दृढ़ प्रासाद, तोरण, उद्यान, द्वार, परकोटा और भवन अकारण ही गिरने लगें, तब राजाकी मृत्यु होती है। जहाँ धूल या धुएँसे दशों दिशाएँ भर जायें, केतुका उदय, ग्रहण, सूर्य और चन्द्रमामें छिद्र प्रकट होना—ये सब ग्रहों और नक्षत्रोंके विकार हैं। ये विकार जहाँ प्रकट होते हैं, वहाँ भयकी सूचना देते हैं। जहाँ अग्नि प्रदीप्त न हो, जलसे भरे हुए घड़े अकारण ही चूने लगें तो इन उत्पातोंके फल मृत्यु, भय और महामारी आदि होते हैं। ब्राह्मणों और देवताओंकी पूजासे तथा जप एवं होमसे इन उत्पातोंकी शान्ति होती है॥ २३—३३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'उत्पात-शान्तिका कथन' नामक दो सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६३॥
दो सौ चौंसठवाँ अध्याय
देवपूजा तथा वैश्वदेव-बलि आदिका वर्णन
पुष्कर कहते हैं—परशुराम! अब मैं देवपूजा आदि कर्मका वर्णन करूँगा, जो उत्पातोंको शान्त करनेवाला है। मनुष्य स्नान करके 'आपो हि ष्ठा०' (यजु० ३६। १४—१६) आदि तीन मन्त्रोंसे भगवान् श्रीविष्णुको अर्घ्य समर्पित करे। फिर 'हिरण्यवर्णा०' (ऋक्०प० ११।११। १—३) आदि तीन मन्त्रोंसे पाद्य समर्पित करे। 'शं नो आपः०'—इस मन्त्रसे आचमन एवं 'इदमपः०' (यजु० ६। १७) मन्त्रसे अभिषेक अर्पण करे। 'रथे०, अक्षेषु० एवं चतस्रः'— इन तीन मन्त्रोंसे
५३६ * अग्निपुराण *
भगवान्के श्रीअङ्गोंमें चन्दनका अनुलेपन करे। फिर ‘युवा सुवासाः०’ (ऋक्० ३।८।४) मन्त्रसे वस्त्र और ‘पुष्पवती०’ (अथर्व० ८।७।२७) इत्यादि मन्त्रसे पुष्प एवं ‘धूरसि०’ (यजु० १।८) आदि मन्त्रसे धूप समर्पित करे। ‘तेजोऽसि शुक्रमसि०’ (यजु० १।३१)—इस मन्त्रसे दीप तथा ‘दधिक्राव्णो०’ (यजु० २३।३२) मन्त्रसे मधुपर्क निवेदन करे। नरश्रेष्ठ! तदनन्तर ‘हिरण्यगर्भः०’ आदि आठ ऋचाओंका पाठ करके अन्न एवं सुगन्धित पेय पदार्थका नैवेद्य समर्पित करे। इसके अतिरिक्त भगवान्को चामर, व्यजन, पादुका, छत्र, यान एवं आसन आदि जो कुछ भी समर्पित करना हो, वह सावित्र-मन्त्रसे अर्पण करे। फिर ‘पुरुषसूक्त’ का जप करे और उसीसे आहुति दे। भगवद्विग्रहके अभावमें वेदिकापर स्थित जलपूर्ण कलशमें, अथवा नदीके तटपर, अथवा कमलके पुष्पमें भगवान् विष्णुका पूजन करनेसे उत्पातोंकी शान्ति होती है॥ १—७॥
(काम्य बलिवैश्वदेव-प्रयोग) भूमिस्थ वेदीका मार्जन एवं प्रोक्षण करके उसके चारों ओर कुशको बिछावे। फिर उसपर अग्निको प्रदीप्त करके उसमें होम करे$^१$। महाभाग परशुराम! मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए सब प्रकारकी रसोईमेंसे अग्राशन निकालकर गृहस्थ द्विज क्रमशः वासुदेव आदिके लिये आहुतियाँ दे। मन्त्रवाक्य इस प्रकार हैं—
‘प्रभवे अव्ययाय देवाय वासुदेवाय नमः स्वाहा। अग्नये नमः स्वाहा। सोमाय नमः स्वाहा। मित्राय नमः स्वाहा। वरुणाय नमः स्वाहा। इन्द्राय नमः स्वाहा। इन्द्राग्नीभ्यां नमः स्वाहा। विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः स्वाहा। प्रजापतये नमः स्वाहा। अनुमत्यै नमः स्वाहा। धन्वन्तरये नमः स्वाहा। वास्तोष्पतये नमः स्वाहा। देव्यै$^२$ नमः स्वाहा। एवं अग्नये स्विष्टकृते नमः स्वाहा।’ इन देवताओंको उनका चतुर्थ्यन्त नाम लेकर एक-एक ग्रास अन्नकी आहुति दे। तत्पश्चात् निम्नाङ्कित रीतिसे बलि समर्पित करे॥ ८—१२॥
धर्मज्ञ! पहले अग्निदिशासे आरम्भ करके तक्षा, उपतक्षा, अश्वा, ऊर्णा, निरुन्थी, धूम्प्रिणीका, अस्वपन्ती तथा मेघपत्नी—इनको बलि अर्पित करे। भृगुनन्दन! ये ही समस्त बलिभागिनी देवियोंके नाम हैं। क्रमशः आग्नेय आदि दिशाओंसे आरम्भ करके इन्हें बलि दे। (बलि-समर्पणके वाक्य इस प्रकार हैं—तक्षायै नमः आग्नेय्याम्, उपतक्षायै नमः याम्ये, अश्वाभ्यो नमः नैर्ऋत्ये, ऊर्णाभ्यो नमः वारुण्याम्, निरुन्ध्यै नमः वायव्ये, धूम्प्रिणीकायै नमः उदीच्याम्, अस्वपन्त्यै नमः ऐशान्याम्, मेघपत्न्यै नमः प्राच्याम्।) भार्गव! तदनन्तर नन्दिनी आदि शक्तियोंको बलि अर्पित करे। यथा—नन्दिन्यै नमः, सुभागायै नमः (अथवा सौभाग्यायै नमः), सुमङ्गल्यै नमः, भद्रकाल्यै$^३$ नमः। इन चारोंके लिये पूर्वादि चारों दिशाओंमें बलि देकर किसी खम्भे या खूँटेपर लक्ष्मी$^४$ आदिके लिये बलि दे। यथा—श्रियै नमः, हिरण्यकेश्यै नमः तथा वनस्पतये नमः। द्वारपर
१. यहाँ मूलमें संक्षेपसे अग्निस्थापनकी विधि दी गयी है। इसे विशदरूपमें इस प्रकार समझें—पहले भूमिस्थ वेदीपर कुशोंसे सम्मार्जन करके उन कुशोंको ईशान दिशामें फेंक दे; इसके बाद उस वेदीपर शुद्ध जल छिड़के। तदनन्तर स्रुवाके मूलभागसे उस वेदीपर तीन उत्तरोत्तर रेखाएँ अङ्कित करे। इन रेखाओंकी लंबाई प्रादेशमात्र हो। उल्लेखन-क्रमसे रेखाओंके ऊपरसे थोड़ी-थोड़ी मिट्टी अनामिका एवं अङ्गुष्ठद्वारा उठाकर बायें हाथपर रखे और उन सबको एक साथ फेंक दे। तत्पश्चात् गोबर और जलसे उस वेदीको लीपे और उसके ऊपर कांस्यपात्रमें अग्नि मँगाकर स्थापित करे। उस अग्निके ऊपर कुछ काष्ठकी समिधाएँ रखकर अग्निको प्रज्वलित करे। वेदीके चारों ओर कुश बिछा दे। फिर प्रज्वलित अग्निमें होम करे।
२. मनुस्मृतिके अनुसार यह आहुति 'द्यावा-पृथिवी'के लिये दी जाती है। यथा—'द्यावापृथिवीभ्यां नमः स्वाहा।'
३. मनुस्मृतिके अनुसार भद्रकालीको बलि वास्तुपुरुषके चरणकी दिशा—दक्षिण-पश्चिममें देनी चाहिये।
४. लक्ष्मीको वास्तुपुरुषके शिरोभाग उत्तर-पूर्वमें बलि दी जाती है।
- अध्याय २६४ * ५३७
दक्षिणभागमें 'धर्ममयाय नमः', वामभागमें 'अधर्ममयाय नमः', घरके भीतर 'ध्रुवाय नमः', घरके बाहर 'मृत्यवे नमः' तथा जलाशयमें 'वरुणाय नमः'—इस मन्त्रसे बलि अर्पित करे। फिर घरके बाहर 'भूतेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे भूतबलि दे। घरके भीतर 'धनदाय नमः' कहकर कुबेरको बलि दे। इसके बाद मनुष्य घरसे पूर्वदिशामें 'इन्द्राय नमः, इन्द्रपुरुषेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे इन्द्र और इन्द्रके पार्षदपुरुषोंको बलि अर्पित करे। तत्पश्चात् दक्षिणमें 'यमाय नमः, यमपुरुषेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे, 'वरुणाय नमः, वरुणपुरुषेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे पश्चिममें, 'सोमाय नमः, सोमपुरुषेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे उत्तरमें और 'ब्रह्मणे वास्तोष्पतये नमः, ब्रह्मपुरुषेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे गृहके मध्यभागमें बलि दे। 'विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे घरके आकाशमें ऊपरकी ओर बलि अर्पित करे। 'स्थण्डिलाय नमः'—इस मन्त्रसे पृथ्वीपर बलि दे। तत्पश्चात् 'दिवाचारिभ्यो भूतेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे दिनमें बलि दे तथा 'रात्रिचारिभ्यो भूतेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे रात्रिमें बलि अर्पित करे। घरके बाहर जो बलि दी जाती है, उसे प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल देते रहना चाहिये। यदि दिनमें श्राद्ध-सम्बन्धी पिण्डदान किया जाय तो उस दिन सायंकालमें बलि नहीं देनी चाहिये॥ १३–२२॥
पितृ-श्राद्धमें दक्षिणाग्र कुशोंपर पहले पिताको, फिर पितामहको और उसके बाद प्रपितामहको पिण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार पहले माताको, फिर पितामहीको, फिर प्रपितामहीको पिण्ड अथवा जल दे। इस प्रकार 'पितृयाग' करना चाहिये॥ २३ १/२॥
बने हुए पाकमेंसे बलिवैश्वदेव करनेके बाद पाँच बलियाँ दी जाती हैं। उनमें सर्वप्रथम 'गो-बलि' है; किंतु यहाँ पहले 'काकबलि' का विधान किया गया है—
काकबलि
इन्द्रवारुणवायव्या याम्या वा नैर्ऋताश्च ये॥
ते काकाः प्रतिगृह्णन्तु इमं पिण्डं मयोद्धृतम्। १
'जो इन्द्र, वरुण, वायु, यम एवं निर्ऋति देवताकी दिशामें रहते हैं, वे काक मेरेद्वारा प्रदत्त यह पिण्ड ग्रहण करें।' इस मन्त्रसे काकबलि देकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे कुत्तोंके लिये अन्नका ग्रास दे॥ २४-२५॥
कुक्कुर-बलि
विवस्वतः कुले जातौ द्वौ श्यामाशबलौ २ शूनौ।
ताभ्यां पिण्डं प्रदास्यामि रक्षतां पथि मां सदा॥
'श्याम और शबल (काले और चितकबरे) रंगवाले दो श्वान विवस्वान्के कुलमें उत्पन्न हुए हैं। मैं उन दोनोंके लिये पिण्ड प्रदान करता हूँ। वे लोक-परलोकके मार्गमें सदा मेरी रक्षा करें'॥ २६॥
गो-ग्रास
सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पापनाशनाः ३।
प्रतिगृह्णन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः॥
'त्रैलोक्यजननी, सुरभिपुत्री गौएँ सबका हित करनेवाली, पवित्र एवं पापोंका विनाश करनेवाली हैं। वे मेरे द्वारा दिये हुए ग्रासको ग्रहण करें।' इस मन्त्रसे गो-ग्रास देकर स्वस्त्ययन करे। फिर याचकोंको भिक्षा दिलावे। तदनन्तर दीन प्राणियों एवं अतिथियोंका अन्नसे सत्कार करके गृहस्थ स्वयं भोजन करे॥ २७–२८॥
(अनाहिताग्नि पुरुष निम्नलिखित मन्त्रोंसे जलमें अन्नकी आहुतियाँ दे—)
ॐ भूः स्वाहा। ॐ भुवः स्वाहा। ॐ स्वः
१. उत्तरार्धके स्थानमें यह पाठान्तर उपलब्ध होता है—वायसाः प्रतिगृह्णन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम्।
२. कहीं-कहीं—द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ। ताभ्यामन्नं प्रदास्यामि स्यातामेतावहिंसकौ॥—ऐसा पाठ मिलता है।
३. पाठान्तर—'पुण्यराशयः।'
५३८ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
स्वाहा। ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा। ॐ देवकृतस्यैन- सोऽवयजनमसि स्वाहा। ॐ पितृकृतस्यैनसोऽवय- जनमसि स्वाहा। ॐ आत्मकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा। ॐ मनुष्यकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा। ॐ एनस एनसोऽवयजनमसि स्वाहा। यच्चाहमेनो विद्वांश्चकार यच्चाविद्वांस्तस्य सर्वस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा। अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा। ॐ प्रजापतये स्वाहा। यह मैंने तुमसे विष्णुपूजन एवं बलिवैश्वदेवका वर्णन किया॥ २९ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'देवपूजा और वैश्वदेव-बलिको वर्णन' नामक दो सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६४॥
दो सौ पैंसठवाँ अध्याय
दिक्पालस्नानकी विधिका वर्णन
पुष्कर कहते हैं—परशुराम ! अब मैं सम्पूर्ण अर्थोंको सिद्ध करनेवाले शान्तिकारक स्नानका वर्णन करता हूँ, सुनो। बुद्धिमान् पुरुष नदीतटपर भगवान् श्रीविष्णु एवं ग्रहोंको स्नान करावे। ज्वरजनित पीड़ा आदिमें तथा विघ्नराज एवं ग्रहोंके कष्टसे पीड़ित होनेपर उस पीड़ासे छूटनेवाले पुरुषको देवालयमें स्नान करना चाहिये। विद्याप्राप्तिकी अभिलाषा रखनेवाले छात्रको किसी जलाशय अथवा घरमें ही स्नान करना चाहिये तथा विजयकी कामनावाले पुरुषके लिये तीर्थजलमें स्नान करना उचित है। जिस नारीका गर्भ स्खलित हो जाता हो, उसे पुष्करिणीमें स्नान कराये। जिस स्त्रीके नवजात शिशुकी जन्म लेते ही मृत्यु हो जाती हो, वह अशोकवृक्षके समीप स्नान करे। रजोदर्शनकी कामना करनेवाली स्त्री पुष्पोंसे शोभायमान उद्यानमें और पुत्राभिलाषिणी समुद्रमें स्नान करे। सौभाग्यकी कामनावाली स्त्रियोंको घरमें स्नान करना चाहिये। परंतु जो सब कुछ चाहते हों, ऐसे सभी स्त्री-पुरुषोंको भगवान् विष्णुके अर्चाविग्रहोंके समीप स्नान करना उत्तम है। श्रवण, रेवती एवं पुष्य नक्षत्रोंमें सभीके लिये स्नान करना प्रशस्त है॥ १-४ $\frac{१}{२}$ ॥
काम्यस्नान करनेवाले मनुष्यके लिये एक सप्ताह पूर्वसे ही उबटन लगानेका विधान है। पुनर्नवा (गदहपूर्णा), रोचना, सताङ्ग (तिनिश) एवं अगुरु वृक्षकी छाल, मधूक (महुआ), दो प्रकारकी हल्दी (सोंठहल्दी और दारुहल्दी), तगर, नागकेसर, अम्बरी, मञ्जिष्ठा (मजीठ), जटामाँसी, यासक, कर्दम (दक्ष-कर्दम), प्रियंगु, सर्षप, कुष्ठ (कूट), बला, ब्राह्मी, कुङ्कुम एवं सक्तुमिश्रित पञ्चगव्य—इन सबका उबटन करके स्नान करे॥ ५-७ $\frac{१}{२}$ ॥
तदनन्तर ताम्रपत्रपर अष्टदल पद्म-मण्डलका निर्माण करके पहले उसकी कर्णिका (-के मध्यभाग)-में श्रीविष्णुका, उनके दक्षिणभागमें ब्रह्माका तथा वामभागमें शिवका अङ्कन और पूजन करे। फिर पूर्व आदि दिशाओंके दलोंमें क्रमशः इन्द्र आदि दिक्पालोंको आयुधों एवं बन्धु-बान्धवोंसहित अङ्कित करे। तदनन्तर पूर्वादि दिशाओं और अग्नि आदि कोणोंमें भी आठ स्नान-मण्डलोंका निर्माण करे। उन मण्डलोंमें विष्णु, ब्रह्मा, शिव एवं इन्द्र आदि देवताओंका उनके आयुधोंसहित पूजन करके उनके उद्देश्यसे होम करे। प्रत्येक देवताके निमित्त समिधाओं, तिलों या घृतोंकी १०८ (एक सौ आठ) आहुतियाँ दे। फिर भद्र, सुभद्र, सिद्धार्थ, पुष्टिवर्धन, अमोघ, चित्रभानु, पर्जन्य एवं सुदर्शन—इन आठ कलशोंकी स्थापना करे और उनके भीतर अश्विनीकुमार, रुद्र, मरुद्गण, विश्वेदेव, दैत्य, वसुगण तथा मुनिजनों एवं अन्य देवताओंका आवाहन करे। उनसे प्रार्थना
- अध्याय २६६ * ५३९
करे कि 'आप सब लोग प्रसन्नतापूर्वक इन कलशोंमें आविष्ट हो जायें।' इसके बाद उन कलशोंमें जयन्ती, विजया, जया, शतावरी, शतपुष्पा, विष्णुक्रान्ता नामसे प्रसिद्ध अपराजिता, ज्योतिष्मती, अतिबला, उशीर, चन्दन, केसर, कस्तूरी, कपूर, वालक, पत्रक (पत्ते), त्वचा (छाल), जायफल, लवङ्ग आदि ओषधियाँ तथा मृत्तिका और पञ्चगव्य डाले। तत्पश्चात् ब्राह्मण साध्य मनुष्यको भद्रपीठपर बैठाकर इन कलशोंके जलसे बलपूर्वक स्नान करावे। राज्याभिषेकके मन्त्रोंमें उक्त देवताओंके उद्देश्यसे पृथक्-पृथक् होम करना चाहिये। तत्पश्चात् पूर्णाहुति देकर आचार्यको दक्षिणा दे। पूर्वकालमें देवगुरु बृहस्पतिने इन्द्रका इसी प्रकार अभिषेक किया था, जिससे वे दैत्योंका वध करनेमें समर्थ हो सके। यह मैंने संग्राम आदिमें विजय आदि प्रदान करनेवाला 'दिक्पालस्नान' कहा है॥ ८-१८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'दिक्पाल-स्नानकी विधिका वर्णन' नामक दो सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६५॥
दो सौ छाछठवाँ अध्याय
विनायक-स्नानविधि
पुष्कर कहते हैं—परशुराम! जो मनुष्य विघ्नराज विनायकद्वारा पीड़ित हैं, उनके लिये सर्व-मनोरथ-साधक स्नानकी विधिका वर्णन करता हूँ। कर्ममें विघ्न और उसकी सिद्धिके लिये विष्णु, शिव और ब्रह्माजीने विनायकको पुष्पदन्त आदि गणोंके अधिपतिपदपर प्रतिष्ठित किया है। विघ्नराज विनायकके द्वारा जो ग्रस्त है, उस पुरुषके लक्षण सुनो। वह स्वप्नमें बहुत अधिक स्नान करता है और वह भी गहरे जलमें। (उस अवस्थामें वह यह भी देखता है कि पानीका स्रोत मुझे बहाये लिये जाता है, अथवा मैं डूब रहा हूँ।) वह मूँड़ मुँड़ाये (और गेरुआँ वस्त्र धारण करनेवाले) मनुष्योंको भी देखता है। कच्चे मांस खानेवाले गीधों एवं व्याघ्र आदि पशुओंकी पीठपर चढ़ता है। (चाण्डालों, गदहों और ऊँटोंके साथ एक स्थानपर बैठता है।) जाग्रत्-अवस्थामें भी जब वह कहीं जाता है तो उसे यह अनुभव होता है कि शत्रु मेरा पीछा कर रहे हैं। उसका चित्त विक्षिप्त रहता है। उसके द्वारा किये हुए प्रत्येक कार्यका आरम्भ निष्फल होता है। वह अकारण ही खिन्न रहता है। विघ्नराजकी सतायी हुई कुमारी कन्याको जल्दी वर ही नहीं मिलता है और विवाहिता स्त्री भी संतान नहीं पाती। श्रोत्रियको आचार्यपद नहीं मिलता। शिष्य अध्ययन नहीं कर पाता। वैश्यको व्यापारमें और किसानको खेतीमें लाभ नहीं होता है। राजाका पुत्र भी राज्यको हस्तगत नहीं कर पाता है। ऐसे पुरुषको (किसी पवित्र दिन एवं शुभ मुहूर्तमें) विधिपूर्वक स्नान कराना चाहिये। हस्त, पुष्य, अश्विनी, मृगशिरा तथा श्रवण नक्षत्रमें किसी भद्रपीठपर स्वस्तिवाचन-पूर्वक बिठाकर उसे स्नान करानेका विधान है। पीली सरसों पीसकर उसे घीसे ढीला करके उबटन बनावे और उसको उस मनुष्यके सम्पूर्ण शरीरमें मले। फिर उसके मस्तकपर सर्वौषधिसहित सब प्रकारके सुगन्धित द्रव्यका लेप करे। चार कलशोंके जलसे उनमें सर्वौषधि छोड़कर स्नान कराये। अश्वशाला, गजशाला, वल्मीक (बाँबी), नदी-संगम तथा जलाशयसे लायी गयी पाँच प्रकारकी मिट्टी, गोरोचन, गन्ध (चन्दन, कुङ्कुम, अगरु आदि) और गुग्गुल—ये सब वस्तुएँ भी उन कलशोंके जलमें छोड़े। आचार्य पूर्व-दिशावर्ती कलशको लेकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे
५४० * अग्निपुराण *
यजमानका अभिषेक करे— सहस्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं कृतम्॥ तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्यः पुनन्तु ते। 'जो सहस्रों नेत्रों (अनेक प्रकारकी शक्तियों)- से युक्त हैं, जिसकी सैकड़ों धाराएँ (बहुत-से प्रवाह) हैं और जिसे महर्षियोंने पावन बनाया है, उस पवित्र जलसे मैं (विनायकजनित उपद्रवसे ग्रस्त) तुम्हारा (उक्त उपद्रवकी शान्तिके लिये) अभिषेक करता हूँ। यह पावन जल तुम्हें पवित्र करे'॥ ९-९$\frac{१}{२}$॥
(तदनन्तर दक्षिण दिशामें स्थित द्वितीय कलश लेकर नीचे लिखे मन्त्रको पढ़ते हुए अभिषेक करे—) भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः। भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः॥ 'राजा वरुण, सूर्य, बृहस्पति, इन्द्र, वायु तथा सप्तर्षिगणने तुम्हें कल्याण प्रदान किया है'॥ १०$\frac{१}{२}$॥
(फिर तीसरा पश्चिम कलश लेकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे अभिषेक करे—) यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्धनि॥ ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तद्घ्नन्तु सर्वदा। 'तुम्हारे केशोंमें, सीमन्तमें, मस्तकपर, ललाटमें, कानोंमें और नेत्रोंमें भी जो दुर्भाग्य (या अकल्याण) है, उसे जलदेवता सदाके लिये शान्त करें'॥ ११$\frac{१}{२}$॥
(तत्पश्चात् चौथा कलश लेकर पूर्वोक्त तीनों मन्त्र पढ़कर अभिषेक करे।) इस प्रकार स्नान करनेवाले यजमानके मस्तकपर बायें हाथमें लिये हुए कुशोंको रखकर आचार्य उसपर गूलरकी स्रुवासे सरसोंका तेल उठाकर डाले॥ १२-१३॥
(उस समय निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़े—) 'ॐ मिताय स्वाहा। ॐ सम्मिताय स्वाहा। ॐ शालाय स्वाहा। ॐ कण्टकाय स्वाहा। ॐ कूष्माण्डाय स्वाहा। ॐ राजपुत्राय स्वाहा।' इस प्रकार स्वाहासमन्वित इन मितादि नामोंके द्वारा सरसोंके तैलकी मस्तकपर आहुति दे। मस्तकपर तैल डालना ही हवन है॥ १४-१५॥
(मस्तकपर उक्त होमके पश्चात् लौकिक अग्निमें भी स्थालीपाककी विधिसे चरु तैयार करके उक्त छः मन्त्रोंसे ही उसी अग्निमें हवन करे।) फिर होमशेष चरुद्वारा 'नमः' पदयुक्त इन्द्रादि नामोंको बलि-मन्त्र बनाकर उनके उच्चारणपूर्वक उन्हें बलि अर्पित करे। तत्पश्चात् सूपमें सब ओर कुश बिछाकर, उसमें कच्चे-पके चावल, पीसे हुए तिलसे मिश्रित भात तथा भाँति-भाँतिके पुष्प, तीन प्रकारकी (गौड़ी, माध्वी तथा पैष्टी) सुरा, मूली, पूरी, मालपूआ, पीठेकी मालाएँ, दही- मिश्रित अन्न, खीर, मीठा, लड्डू और गुड़—इन सबको एकत्र रखकर चौराहेपर रख दे और उसे देवता, सुपर्ण, सर्प, ग्रह, असुर, यातुधान, पिशाच, नागमाता, शाकिनी, यक्ष, वेताल, योगिनी और पूतना आदिको अर्पित करे। तदनन्तर विनायकजननी भगवती अम्बिकाको दूर्वादल, सर्षप एवं पुष्पोंसे भरी हुई अर्घ्यरूप अञ्जलि देकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे उनका उपस्थान करे—'सौभाग्यवती अम्बिके! मुझे रूप, यश, सौभाग्य, पुत्र एवं धन दीजिये। मेरी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण कीजिये*।' इसके बाद ब्राह्मणोंको भोजन करावे तथा आचार्यको दो वस्त्र दान करे। इस प्रकार विनायक और ग्रहोंका पूजन करके मनुष्य धन और सभी कार्योंमें सफलता प्राप्त करता है॥ १६-२०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विनायक-स्नानकथन' नामक दो सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६६॥
* रूपं देहि यशो देहि सौभाग्यं सुभगे मम। पुत्रं देहि धनं देहि सर्वान् कामांश्च देहि मे॥ (अग्निपु० २६६। १९)
* अध्याय २६७ * ५४१
दो सौ सरसठवाँ अध्याय
माहेश्वर-स्नान आदि विविध स्नानोंका वर्णन; भगवान् विष्णुके पूजनसे तथा गायत्रीमन्त्रद्वारा लक्ष-होमादिसे शान्तिकी प्राप्तिका कथन
पुष्कर कहते हैं— अब मैं राजा आदिकी विजयश्रीको बढ़ानेवाले 'माहेश्वर-स्नान'का वर्णन करता हूँ, जिसका पूर्वकालमें शुक्राचार्यने दानवेन्द्र बलिको उपदेश किया था। प्रातःकाल सूर्योदयके पूर्व भद्रपीठपर आचार्य जलपूर्ण कलशोंसे राजाको स्नान करावे॥ १ $\frac{१}{२}$ ॥
(स्नानके समय निम्नाङ्कित मन्त्रका पाठ करे)
'ॐ नमो भगवते रुद्राय च बलाय च पाण्डरोचितभस्मानुलिप्तगात्राय (तद्यथा*) जय-जय सर्वान् शत्रून् मूकयस्व कलहविग्रहविवादेषु भञ्जय भञ्जय। ॐ मथ मथ। सर्वप्रत्यर्थिकान् योऽसौ युगान्तकाले दिधक्षति। इमां पूजां रौद्रमूर्तिः सहस्रांशुः शुक्लः स ते रक्षतु जीवितम्। संवर्तकाग्नितुल्यश्च त्रिपुरान्तकरः शिवः। सर्वदेवमयः सोऽपि तव रक्षतु जीवितम्॥ लिखि लिखि ख्विलि स्वाहा।'
'धवल भस्मका अनुलेपन अपने अङ्गोंमें लगाये महाबलशाली भगवान् रुद्रको नमस्कार है। आपकी जय हो, जय हो। समस्त शत्रुओंको गूँगा कर दीजिये। कलह, युद्ध एवं विवादमें भग्न कीजिये, भग्न कीजिये। मथ डालिये, मथ डालिये। जो प्रलयकालमें सम्पूर्ण लोकोंको भस्म कर देना चाहते हैं, वे रुद्र समस्त प्रतिपक्षियोंको भस्म कर डालें। इस पूजाको स्वीकार करके वे रौद्रमूर्ति, सहस्र किरणोंसे सुशोभित, शुक्लवर्ण शिव तुम्हारे जीवनकी रक्षा करें। प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी, सर्वदेवमय, त्रिपुरनाशक शिव तुम्हारे जीवनकी रक्षा करें।' इस प्रकार मन्त्रसे स्नान करके तिल एवं तण्डुलका होम करे। फिर त्रिशूलधारी भगवान् शिवको पञ्चामृतसे स्नान कराके उनका पूजन करे॥ २—६ $\frac{१}{२}$ ॥
अब मैं तुम्हारे सम्मुख सदा विजयकी प्राप्ति करानेवाले अन्य स्नानोंका वर्णन करता हूँ। घृत-स्नान आयुकी वृद्धि करनेमें उत्तम है। गोमयसे स्नान करनेपर लक्ष्मीप्राप्ति, गोमूत्रसे स्नान करनेपर पाप-नाश, दुग्धसे स्नान करनेपर बलवृद्धि एवं दधिसे स्नान करनेपर सम्पत्तिकी वृद्धि होती है। कुशोदकसे स्नान करनेपर पापनाश, पञ्चगव्यसे स्नान करनेपर समस्त अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति, शतमूलसे स्नान करनेपर सभी कामनाओंकी सिद्धि तथा गोशृङ्गके जलसे स्नान करनेपर पापोंकी शान्ति होती है। पलाश, बिल्वपत्र, कमल एवं कुशके जलसे स्नान करना सर्वप्रद है। बचा, दो प्रकारकी हल्दी और मोथामिश्रित जलसे किया गया स्नान राक्षसोंके विनाशके लिये उत्तम है। इतना ही नहीं, वह आयु, यश, धर्म और मेधाकी भी वृद्धि करनेवाला है। स्वर्णजलसे किया गया स्नान मङ्गलकारी होता है। रजत और ताम्रजलसे किये गये स्नानका भी यही फल है। रत्नमिश्रित जलसे स्नान करनेपर विजय, सब प्रकारके गन्धोंसे मिश्रित जलद्वारा स्नान करनेपर सौभाग्य, फलोदकसे स्नान करनेपर आरोग्य तथा धात्रीफलके जलसे स्नान करनेपर उत्तम लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। तिल एवं श्वेत सर्षपके जलसे स्नान करनेपर लक्ष्मी, प्रियंगुजलसे स्नान करनेपर सौभाग्य, पद्म, उत्पल तथा कदम्बमिश्रित जलसे स्नान करनेपर लक्ष्मी एवं बला-वृक्षके जलसे स्नान करनेपर बलकी प्राप्ति होती है। भगवान् श्रीविष्णुके चरणोदकद्वारा
* यद्यपि 'तद्यथा' यह पाठ अग्निपुराणकी सभी प्रतियोंमें उपलब्ध होता है, परंतु यह अधिक प्रतीत होता है।
५४२ * अग्निपुराण *
स्नान सब स्नानोंसे श्रेष्ठ है॥७-१३$\frac{१}{२}$॥
एकाकी मनुष्य मनमें एक कामना लेकर विधिपूर्वक एक ही स्नान करे। वह 'आक्रन्दयति०' आदि सूक्तसे अपने हाथमें मणि (मनका) बाँधे। वह मणि कूट, पाट, वचा, सोंठ, शङ्ख अथवा लोहे आदिकी होनी चाहिये। समस्त कामनाओंके ईश्वर भगवान् श्रीहरि ही हैं, अतः उनके पूजनसे ही मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य घृतमिश्रित दुग्धसे स्नान कराके श्रीविष्णुका पूजन करता है, वह पित्तरोगका नाश कर देता है। उनके उद्देश्यसे पाँच मूँगोंकी बलि देकर मनुष्य अतिसारसे छुटकारा पाता है। भगवान् श्रीहरिको पञ्चगव्यसे स्नान करानेवाला वातरोगका नाश करता है। द्विस्नेह-द्रव्यसे स्नान कराके अतिशय श्रद्धापूर्वक उनका पूजन करनेवाला कफ-सम्बन्धी रोगसे मुक्त हो जाता है। घृत, तैल एवं मधुद्वारा कराया गया स्नान 'त्रिरस-स्नान' माना गया है, घृत और जलसे किया गया स्नान 'द्विस्नेह स्नान' है तथा घृत-तेल-मिश्रित जलका स्नान 'समल-स्नान' है। मधु, ईखका रस और दूध—इन तीनोंसे मिश्रित जलद्वारा किया गया स्नान 'त्रिमधुर-स्नान' है। घृत, इक्षुरस तथा शहद यह 'त्रिरस-स्नान' लक्ष्मीकी प्राप्ति करानेवाला है। कर्पूर, उशीर एवं चन्दनसे किया गया अनुलेप 'त्रिशुक्ल' कहलाता है। चन्दन, अगुरु, कर्पूर, कस्तूरी एवं कुङ्कुम—इन पाँचोंके मिश्रणसे किया गया अनुलेपन यदि विष्णुको अर्पित किया जाय तो वह सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है। कर्पूर, चन्दन एवं कुङ्कुम अथवा कस्तूरी, कपूर और चन्दन—यह 'त्रिसुगन्ध' समस्त कामनाओंको प्रदान करनेवाला है। जायफल, कर्पूर और चन्दन—ये 'शीतत्रय' माने गये हैं। पीला, सुग्गापंखी, शुक्ल, कृष्ण एवं लाल—ये पञ्च वर्ण कहे गये हैं॥१४-२४॥
श्रीहरिके पूजनमें उत्पल, कमल, जातीपुष्प तथा त्रिशीत उपयोगी होते हैं। कुङ्कुम, रक्त कमल और लाल उत्पल ये 'त्रिरक्त' कहे जाते हैं। श्रीविष्णुका धूप-दीप आदिसे पूजन करनेपर मनुष्योंको शान्तिकी प्राप्ति होती है। चार हाथके चौकोर कुण्डमें आठ या सोलह ब्राह्मण तिल, घी और चावलसे लक्षहोम या कोटिहोम करें। ग्रहोंकी पूजा करके गायत्री-मन्त्रसे उक्त होम करनेपर क्रमशः सब प्रकारकी शान्ति सुलभ होती है॥२५-२७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'माहेश्वर-स्नान तथा लक्षकोटिहोम आदिका कथन' नामक दो सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६७॥
दो सौ अड़सठवाँ अध्याय
सांवत्सर-कर्म; इन्द्र-शचीकी पूजा एवं प्रार्थना; राजाके द्वारा भद्रकाली तथा अन्यान्य देवताओंके पूजनकी विधि; वाहन आदिका पूजन तथा नीराजन
पुष्कर कहते हैं— अब मैं राजाओंके करनेयोग्य सांवत्सर-कर्मका वर्णन करता हूँ। राजाको अपने जन्मनक्षत्रमें नक्षत्र-देवताका पूजन करना चाहिये। वह प्रत्येक मासमें, संक्रान्तिके समय सूर्य और चन्द्रमा आदि देवताओंकी अर्चना करे। अगस्त्य-ताराका उदय होनेपर अगस्त्यकी एवं चातुर्मास्यमें श्रीहरिका यजन करे। श्रीहरिके शयन और उत्थापनकालमें, अर्थात् हरिशयनी एकादशी और
- अध्याय २६८ * ५४३
हरिप्रबोधिनी एकादशीके अवसरपर, पाँच दिनतक उत्सव करे। भाद्रपदके शुक्लपक्षमें, प्रतिपदा तिथिको शिविरके पूर्वदिग्भागमें इन्द्रपूजाके लिये भवन-निर्माण करावे। उस भवनमें इन्द्रध्वज (पताका)-की स्थापना करके वहाँ प्रतिपदासे लेकर अष्टमीतक शची और इन्द्रकी पूजा करे। अष्टमीको वाद्य-घोषके साथ उस पताकामें ध्वजदण्डका प्रवेश करावे। फिर एकादशीको उपवास रखकर द्वादशीको ध्वजका उत्तोलन करे। फिर एक कलशपर वस्त्रादिसे युक्त देवराज इन्द्र एवं शचीकी स्थापना करके उनका पूजन करे॥ १—५॥
(इन्द्रदेवकी इस प्रकार प्रार्थना करे—)
'शत्रुविजयी वृत्रनाशन पाकशासन! महाभाग देवदेव! आपका अभ्युदय हो। आप कृपापूर्वक इस भूतलपर पधारे हैं। आप सनातन प्रभु, सम्पूर्ण भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले, अनन्त तेजसे सम्पन्न, विराट् पुरुष तथा यश एवं विजयकी वृद्धि करनेवाले हैं। आप उत्तम वृष्टि करनेवाले इन्द्र हैं, समस्त देवता आपका तेज बढ़ायें। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कार्तिकेय, विनायक, आदित्यगण, वसुगण, रुद्रगण, साध्यगण, भृगुकुलोत्पन्न महर्षि, दिशाएँ, मरुद्गण, लोकपाल, ग्रह, यक्ष, पर्वत, नदियाँ, समुद्र, श्रीदेवी, भूदेवी, गौरी, चण्डिका एवं सरस्वती—ये सभी आपके तेजको प्रदीप्त करें। शचीपते इन्द्र! आपकी जय हो। आपकी विजयसे मेरा भी सदा शुभ हो। आप नरेशों, ब्राह्मणों एवं सम्पूर्ण प्रजाओंपर प्रसन्न होइये। आपके कृपाप्रसादसे यह पृथ्वी सदा सस्यसम्पन्न हो। सबका विघ्नरहित कल्याण हो तथा ईतियाँ पूर्णतया शान्त हों।' इस अभिप्रायवाले मन्त्रसे इन्द्रकी अर्चना करनेवाला भूपाल पृथ्वीपर विजय प्राप्त करके स्वर्गको प्राप्त होता है॥ ६—१२ १/२ ॥
आश्विन मासके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको किसी पटपर भद्रकालीका चित्र अङ्कित करके राजा विजयकी प्राप्तिके लिये उसकी पूजा करे। साथ ही आयुध, धनुष, ध्वज, छत्र, राजचिह्न (मुकुट, छत्र तथा चँवर आदि) तथा अस्त्र-शस्त्र आदिकी पुष्प आदि उपचारोंसे पूजा करे। रात्रिके समय जागरण करके देवीको बलि अर्पित करे। दूसरे दिन पुनः पूजन करे। (पूजाके अन्तमें इस प्रकार प्रार्थना करे—) 'भद्रकालि, महाकालि, दुर्गतिहारिणि दुर्गे, त्रैलोक्यविजयिनि चण्डिके! मुझे सदा शान्ति और विजय प्रदान कीजिये'॥ १३—१५ १/२ ॥
अब मैं 'नीराजन'की विधि कहता हूँ। ईशानकोणमें देवमन्दिरका निर्माण करावे। वहाँ तीन दरवाजे लगाकर मन्दिरके गर्भगृहमें सदा देवताओंकी पूजा करे। जब सूर्य चित्रा नक्षत्रको छोड़कर स्वाती नक्षत्रमें प्रवेश करते हैं, उस समयसे प्रारम्भ करके जबतक स्वातीपर सूर्य स्थित रहें, तबतक देवपूजन करना चाहिये। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, वायु, विनायक, कार्तिकेय, वरुण, विश्रवाके पुत्र कुबेर, यम, विश्वेदेव एवं कुमुद, ऐरावत, पद्म, पुष्पदन्त, वामन, सुप्रतीक, अञ्जन और नील—इन आठ दिग्गजोंकी गृह आदिमें पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर पुरोहित घृत, समिधा, श्वेत सर्षप एवं तिलोंका होम करे। आठ कलशोंकी पूजा करके उनके जलसे उत्तम हाथियोंको स्नान कराये। तदनन्तर घोड़ोंको स्नान कराये और उन सबके लिये ग्रास दे। पहले हाथियोंको तोरणद्वारसे बाहर निकाले; परंतु गोपुर आदिका उल्लङ्घन न करावे। तदनन्तर सब लोग वहाँसे निकलें और राजचिह्नोंकी पूजा घरमें ही की जाय। शतभिषा नक्षत्रमें वरुणका पूजन करके रात्रिके समय भूतोंको बलि दे। जब सूर्य विशाखा नक्षत्रपर जाय, उस समय राजा आश्रममें निवास करे। उस
५४४ * अग्निपुराण *
दिन वाहनोंको विशेषरूपसे अलंकृत करना चाहिये। राजचिह्नोंकी पूजा करके उन्हें उनके अधिकृत पुरुषोंके हाथोंमें दे। धर्मज्ञ परशुराम ! फिर कालज्ञ ज्योतिषी हाथी, अश्व, छत्र, खड्ग, धनुष, दुन्दुभि, ध्वजा एवं पताका आदि राजचिह्नोंको अभिमन्त्रित करे। फिर उन सबको अभिमन्त्रित करके हाथीकी पीठपर रखे। ज्योतिषी और पुरोहित भी हाथीपर आरूढ़ हों। इस प्रकार अभिमन्त्रित वाहनोंपर आरूढ़ होकर तोरण-द्वारसे निष्क्रमण करें। इस प्रकार राजद्वारसे बाहर निकलकर राजा हाथीकी पीठपर स्थित रहकर विधिपूर्वक बलि-वितरण करे। फिर नरेश सुस्थिरचित्त होकर चतुरङ्गिणी सेनाके साथ सर्वसैन्यसमूहके द्वारा जयघोष कराते हुए दिग्दिगन्तको प्रकाशित करनेवाले जलते मसालोंके समूहकी तीन बार परिक्रमा करे। इस प्रकार पूजन करके राजा जनसाधारणको विदा करके राजभवनको प्रस्थान करे। मैंने यह समस्त शत्रुओंका विनाश करनेवाली 'नीराजना' नामक शान्ति बतलायी है, जो राजाको अभ्युदय प्रदान करनेवाली है॥ १६-३१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नीराजनाविधिका वर्णन' नामक दो सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६८॥
दो सौ उनहत्तरवाँ अध्याय
छत्र, अश्व, ध्वजा, गज, पताका, खड्ग, कवच और दुन्दुभिकी प्रार्थनाके मन्त्र
पुष्कर कहते हैं—परशुराम ! अब मैं छत्र आदि राजोपकरणोंके प्रार्थना मन्त्र बतलाता हूँ, जिनसे उनकी पूजा करके नरेशगण विजय आदि प्राप्त करते हैं॥ $\frac{१}{२}$॥
छत्र-प्रार्थना-मन्त्र
'महामते छत्रदेव ! तुम हिम, कुन्द एवं चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिसे सुशोभित और पाण्डुर-वर्णकी-सी आभावाले हो। ब्रह्माजीके सत्यवचन तथा चन्द्र, वरुण और सूर्यके प्रभावसे तुम सतत वृद्धिशील होओ। जिस प्रकार मेघ मङ्गलके लिये इस पृथ्वीको आच्छादित करता है, उसी प्रकार तुम विजय एवं आरोग्यकी वृद्धिके लिये राजाको आच्छादित करो'॥ १-३॥
अश्व-प्रार्थना-मन्त्र
'अश्व ! तुम गन्धर्वकुलमें उत्पन्न हुए हो, अतः अपने कुलको दूषित करनेवाला न होना। ब्रह्माजीके सत्यवचनसे तथा सोम, वरुण एवं अग्निदेवके प्रभावसे, सूर्यके तेजसे, मुनिवरोंके तपसे, रुद्रके ब्रह्मचर्यसे और वायुके बलसे तुम सदा आगे बढ़ते रहो। याद रखो, तुम अश्वराज उच्चैःश्रवाके पुत्र हो; अपने साथ ही प्रकट हुए कौस्तुभरत्नका स्मरण करो। (तुम्हें भी उसीकी भाँति अपने यशसे प्रकाशित होते रहना चाहिये।) ब्रह्मघाती, पितृघाती, मातृहन्ता, भूमिके लिये मिथ्याभाषण करनेवाला तथा युद्धसे पराङ्मुख क्षत्रिय जितनी शीघ्रतासे अधोगतिको प्राप्त होता है, तुम भी युद्धसे पीठ दिखानेपर उसी दुर्गति को प्राप्त हो सकते हो; किंतु तुम्हें वैसा पाप या कलङ्क न लगे। तुरंगम ! तुम युद्धके पथपर विकारको न प्राप्त होना। समराङ्गणमें शत्रुओंका विनाश करते हुए अपने स्वामीके साथ तुम सुखी होओ'॥ ४-८ $\frac{१}{२}$॥
ध्वजा-प्रार्थना-मन्त्र
'महापराक्रमके प्रतीक इन्द्रध्वज ! भगवान् नारायणके ध्वज विनतानन्दन पक्षिराज गरुड तुममें प्रतिष्ठित हैं। वे सर्पशत्रु, विष्णुवाहन, कश्यपनन्दन
- अध्याय २६९ * ५४५
तथा देवलोकसे हठात् अमृत छीन लानेवाले हैं। उनका शरीर विशाल और बल एवं वेग महान् है। वे अमृतभोगी हैं। उनकी शक्ति अप्रमेय है। वे युद्धमें दुर्जय रहकर देवशत्रुओंका संहार करनेवाले हैं। उनकी गति वायुके समान तीव्र है। वे गरुड तुममें प्रतिष्ठित हैं। देवाधिदेव भगवान् विष्णुने इन्द्रके लिये तुममें उन्हें स्थापित किया है, तुम सदा मुझे विजय प्रदान करो। मेरे बलको बढ़ाओ। घोड़े, कवच तथा आयुधोंसहित हमारे योद्धाओंकी रक्षा करो और शत्रुओंको जलाकर भस्म कर दो'॥ ९—१३॥
गज-प्रार्थना-मन्त्र
'कुमुद, ऐरावत, पद्म, पुष्पदन्त, वामन, सुप्रतीक, अञ्जन और नील—ये आठ देवयोनिमें उत्पन्न गजराज हैं। इनके ही पुत्र और पौत्र आठ वनोंमें निवास करते हैं। भद्र, मन्द, मृग एवं संकीर्णजातीय गज वन-वनमें उत्पन्न हुए हैं। हे महागजराज ! तुम अपनी योनिका स्मरण करो। वसुगण, रुद्र, आदित्य एवं मरुद्गण तुम्हारी रक्षा करें। गजेन्द्र ! अपने स्वामीकी रक्षा करो और अपनी मर्यादाका पालन करो। ऐरावतपर चढ़े हुए वज्रधारी देवराज इन्द्र तुम्हारे पीछे-पीछे आ रहे हैं, ये तुम्हारी रक्षा करें। तुम युद्धमें विजय पाओ और सदा स्वस्थ रहकर आगे बढ़ो। तुम्हें युद्धमें ऐरावतके समान बल प्राप्त हो। तुम चन्द्रमासे कान्ति, विष्णुसे बल, सूर्यसे तेज, वायुसे वेग, पर्वतसे स्थिरता, रुद्रसे विजय और देवराज इन्द्रसे यश प्राप्त करो। युद्धमें दिग्गज दिशाओं और दिक्पालोंके साथ तुम्हारी रक्षा करें। गन्धर्वोंके साथ अश्विनीकुमार सब ओरसे तुम्हारा संरक्षण करें। मनु, वसु, रुद्र, वायु, चन्द्रमा, महर्षिगण, नाग, किंनर, यक्ष, भूत, प्रमथ, ग्रह, आदित्य, मातृकाओंसहित भूतेश्वर शिव, इन्द्र, देवसेनापति कार्तिकेय और वरुण तुममें अधिष्ठित हैं। वे हमारे समस्त शत्रुओंको भस्मसात् कर दें और राजा विजय प्राप्त करें'॥ १४—२३॥
पताका-प्रार्थना-मन्त्र
'पताके ! शत्रुओंने सब ओर जो घातक प्रयोग किये हों, शत्रुओंके वे प्रयोग तुम्हारे तेजसे अभिहत होकर नष्ट हो जायें। तुम जिस प्रकार कालनेमिवध एवं त्रिपुरसंहारके युद्धमें, हिरण्यकशिपुके संग्राममें तथा सम्पूर्ण दैत्योंके वधके समय सुशोभित हुई हो, आज उसी प्रकार सुशोभित होओ। अपने प्रणका स्मरण करो। इस नीलोज्ज्वलवर्णकी पताकाको देखकर राजाके शत्रु युद्धमें विविध भयंकर व्याधियों एवं शस्त्रोंसे पराजित होकर शीघ्र नष्ट हो जायँ। तुम पूतना, रेवती, लेखा और कालरात्रि आदि नामोंसे प्रसिद्ध हो। पताके ! हम तुम्हारा आश्रय ग्रहण करते हैं, हमारे सम्पूर्ण शत्रुओंको दग्ध कर डालो। सर्वमेध महायज्ञमें देवाधिदेव भगवान् रुद्रने जगत्के सारतत्त्वसे तुम्हारा निर्माण किया था'॥ २४—२८ $\frac{१}{२}$ ॥
खड्ग-प्रार्थना-मन्त्र
'शत्रुसूदन खड्ग ! तुम इस बातको याद रखो कि नारायणके 'नन्दक' नामक खड्गकी दूसरी मूर्ति हो। तुम नीलकमलदलके समान श्याम एवं कृष्णवर्ण हो। दुःस्वप्नोंका विनाश करनेवाले हो। प्राचीनकालमें स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माने असि, विशसन, खड्ग, तीक्ष्णधार, दुरासद, श्रीगर्भ, विजय और धर्मपाल—ये तुम्हारे आठ नाम बतलाये हैं। कृत्तिका तुम्हारा नक्षत्र है, देवाधिदेव महेश्वर तुम्हारे गुरु हैं, सुवर्ण तुम्हारा शरीर है और जनार्दन तुम्हारे देवता हैं। खड्ग ! तुम सेना एवं नगरसहित राजाकी रक्षा करो। तुम्हारे पिता देवश्रेष्ठ पितामह हैं। तुम सदा हमलोगोंकी रक्षा करो'॥ २९—३३॥
५४६ * अग्निपुराण *
कवच-प्रार्थना-मन्त्र 'हे वर्म ! तुम रणभूमिमें कल्याणप्रद हो। आज मेरी सेनाको यश प्राप्त हो। निष्पाप! मैं तुम्हारे द्वारा रक्षा पानेके योग्य हूँ। मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है'॥ ३४॥
दुन्दुभि-प्रार्थना-मन्त्र 'दुन्दुभे ! तुम अपने घोषसे शत्रुओंका हृदय कम्पित करनेवाली हो; हमारे राजाकी सेनाओंके लिये विजयवर्धक बन जाओ। मोददायक दुन्दुभे ! जैसे मेघकी गर्जनासे श्रेष्ठ हाथी हर्षित होते हैं, वैसे ही तुम्हारे शब्दसे हमारा हर्ष बढ़े। जिस प्रकार मेघकी गर्जना सुनकर स्त्रियाँ भयभीत हो जाती हैं, उसी प्रकार तुम्हारे नादसे युद्धमें उपस्थित हमारे शत्रु त्रस्त हो उठें'॥ ३५–३७॥
इस प्रकार पूर्वोक्त मन्त्रोंसे राजोपकरणोंकी अर्चना करे एवं विजयकार्यमें उनका प्रयोग करे। दैवज्ञ राजपुरोहितको रक्षाबन्धन आदिके द्वारा राजाकी रक्षाका प्रबन्ध करके प्रतिवर्ष विष्णु आदि देवताओं एवं राजाका अभिषेक करना चाहिये ॥ ३८-३९ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'छत्र आदिकी प्रार्थनाके मन्त्रका कथन' नामक दो सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६९ ॥
दो सौ सत्तरवाँ अध्याय विष्णुपञ्जरस्तोत्रका कथन
पुष्कर कहते हैं—द्विजश्रेष्ठ परशुराम ! पूर्वकालमें भगवान् ब्रह्माने त्रिपुरसंहारके लिये उद्यत शंकरकी रक्षाके लिये 'विष्णुपञ्जर' नामक स्तोत्रका उपदेश किया था। इसी प्रकार बृहस्पतिने बल दैत्यका वध करनेके लिये जानेवाले इन्द्रकी रक्षाके लिये उक्त स्तोत्रका उपदेश दिया था। मैं विजय प्रदान करनेवाले उस विष्णुपञ्जरका स्वरूप बतलाता हूँ, सुनो ॥ १–२ ॥
'मेरे पूर्वभागमें चक्रधारी विष्णु एवं दक्षिणपार्श्वमें गदाधारी श्रीहरि स्थित हैं। पश्चिमभागमें शार्ङ्गपाणि विष्णु और उत्तरभागमें नन्दक-खड्गधारी जनार्दन विराजमान हैं। भगवान् हृषीकेश दिक्कोणोंमें एवं जनार्दन मध्यवर्ती अवकाशमें मेरी रक्षा कर रहे हैं। वराहरूपधारी श्रीहरि भूमिपर तथा भगवान् नृसिंह आकाशमें प्रतिष्ठित होकर मेरा संरक्षण कर रहे हैं। जिसके किनारेके भागोंमें छुरे जुड़े हुए हैं, वह यह निर्मल 'सुदर्शनचक्र' घूम रहा है। यह जब प्रेतों तथा निशाचरोंको मारनेके लिये चलता है, उस समय इसकी किरणोंकी ओर देखना किसीके लिये भी बहुत कठिन होता है। भगवान् श्रीहरिकी यह 'कौमोदकी' गदा सहस्रों ज्वालाओंसे प्रदीप्त पावकके समान उज्ज्वल है। यह राक्षस, भूत, पिशाच और डाकिनियोंका विनाश करनेवाली है। भगवान् वासुदेवके शार्ङ्गधनुषकी टंकार मेरे शत्रुभूत मनुष्य, कूष्माण्ड, प्रेत आदि और तिर्यग्योनिगत जीवोंका पूर्णतया संहार करे। जो भगवान् श्रीहरिकी खड्गधारामयी उज्ज्वल ज्योत्स्नामें स्नान कर चुके हैं, वे मेरे समस्त शत्रु उसी प्रकार तत्काल शान्त हो जायँ, जैसे गरुडके द्वारा मारे गये सर्प शान्त हो जाते हैं' ॥ ३-८ ॥
'जो कूष्माण्ड, यक्ष, राक्षस, प्रेत, विनायक, क्रूर मनुष्य, शिकारी पक्षी, सिंह आदि पशु एवं डँसनेवाले सर्प हों, वे सब-के-सब सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्णके शङ्खनादसे आहत हो सौम्यभावको प्राप्त हो जायँ। जो मेरी चित्तवृत्ति और स्मरणशक्तिका हरण करते हैं, जो मेरे बल
- अध्याय २७१ * ५४७
और तेजका नाश करते हैं तथा जो मेरी कान्ति या तेजको विलुप्त करनेवाले हैं, जो उपभोग-सामग्रीको हर लेनेवाले तथा शुभ लक्षणोंका नाश करनेवाले हैं, वे कूष्माण्डगण श्रीविष्णुके सुदर्शन-चक्रके वेगसे आहत होकर विनष्ट हो जायँ। देवाधिदेव भगवान् वासुदेवके संकीर्तनसे मेरी बुद्धि, मन और इन्द्रियोंको स्वास्थ्यलाभ हो। मेरे आगे-पीछे, दायें-बायें तथा कोणवर्तिनी दिशाओंमें सब जगह जनार्दन श्रीहरिका निवास हो। सबके पूजनीय, मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले अनन्तरूप परमेश्वर जनार्दनके चरणोंमें प्रणत होनेवाला कभी दुखी नहीं होता। जैसे भगवान् श्रीहरि परब्रह्म हैं, उसी प्रकार वे परमात्मा केशव भी जगत्स्वरूप हैं—इस सत्यके प्रभावसे तथा भगवान् अच्युतके नामकीर्तनसे मेरे त्रिविध पापोंका नाश हो जाय'*॥ ९–१५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विष्णुपञ्जरस्तोत्रका कथन' नामक दो सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७०॥
दो सौ एकहत्तरवाँ अध्याय वेदोंके मन्त्र और शाखा आदिका वर्णन तथा वेदोंकी महिमा
पुष्कर कहते हैं— परशुराम! वेदमन्त्र सम्पूर्ण विश्वपर अनुग्रह करनेवाले तथा चारों पुरुषार्थोंके साधक हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद—ये चार वेद हैं। इनके मन्त्रोंकी संख्या एक लाख है। ऋग्वेदकी एक शाखा 'सांख्सायन' और दूसरी शाखा 'आश्वलायन' है। इन दो शाखाओंमें एक सहस्र तथा ऋग्वेदीय ब्राह्मणभागमें दो सहस्र मन्त्र हैं। श्रीकृष्णद्वैपायन आदि महर्षियोंने ऋग्वेदको प्रमाण माना है। यजुर्वेदमें उन्नीस सौ मन्त्र हैं। उसके ब्राह्मण-ग्रन्थोंमें एक हजार मन्त्र
* श्रीविष्णुपञ्जरस्तोत्र पुष्कर उवाच— त्रिपुरं जघ्नुषः पूर्वं ब्रह्मणा विष्णुपञ्जरम्। शंकरस्य द्विजश्रेष्ठ रक्षणाय निरूपितम्॥ वागीशेन च शक्रस्य बलं हन्तुं प्रयासतः। तस्य स्वरूपं वक्ष्यामि तत् त्वं शृणु जयादिमत्॥ विष्णुः प्राच्यां स्थितश्चक्री हरिर्दक्षिणतो गदी। प्रतीच्यां शार्ङ्गधृग् विष्णुर्जिष्णुः खड्गी ममोत्तरे॥ हृषीकेशो विकोणेषु तच्छिद्रेषु जनार्दनः। क्रोडरूपी हरिर्भूभौ नरसिंहोऽम्बरे मम॥ क्षुरान्तममलं चक्रं भ्रमत्येतत् सुदर्शनम्। अस्यांशुमाला दुष्प्रेक्ष्या हन्तुं प्रेतनिशाचरान्॥ गदा चेयं सहस्रार्चिः प्रदीप्तपावकोज्ज्वला। रक्षोभूतपिशाचानां डाकिनीनां च नाशनी॥ शार्ङ्गविस्फूर्जितं चैव वासुदेवस्य मद्रिपून्। तिर्यङ्मनुष्यकूष्माण्डप्रेतादीन् हन्त्वशेषतः॥ खड्गधारोज्ज्वलज्योत्स्नानिर्दूता ये समाहिताः। ते यान्तु शाम्यतां सद्यो गरुडेनेव पन्नगाः॥ ये कूष्माण्डास्तथा यक्षा ये दैत्या ये निशाचराः। प्रेता विनायकाः क्रूरा मनुष्या जम्भगाः खगाः॥ सिंहादयश्च पशवो दंदशूकाश्च पन्नगाः। सर्वे भवन्तु ते सौम्याः कृष्णशङ्खरवाहताः॥ चित्तवृत्तिहरा ये मे ये जनाः स्मृतिहारकाः। बलौजसां च हर्तारश्छायाविभ्रंशकाश्च ये॥ ये चोपभोगहर्तारो ये च लक्षणनाशकाः। कूष्माण्डास्ते प्रणश्यन्तु विष्णुचक्रप्रवाहताः॥ बुद्धिस्वास्थ्यं मनःस्वास्थ्यं स्वास्थ्यमैन्द्रियकं तथा। ममास्तु देवदेवस्य वासुदेवस्य कीर्तनात्॥ पृष्ठे पुरस्तान्मम दक्षिणेत्तरे विकोणतश्चास्तु जनार्दनो हरिः। तमीड्यमीशानमनन्तमच्युतं जनार्दनं प्रणिपतितो न सीदति॥ यथा परं ब्रह्म हरिरस्तथा परो जगत्स्वरूपश्च स एव केशवः। सत्येन तेनाच्युतनामकीर्तनात् प्रणाश्येतु त्रिविधं ममाशुभम्॥ (अग्निपु० २७०। १–१५)