अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 556, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २६० * ५२९
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
मनुष्य मुक्त हो जाता है। ‘युवा सुवासा०’ (तै० ब्रा० ३।६।१३) इत्यादि मन्त्रसे हवन करनेपर उत्तम वस्त्रोंकी प्राप्ति होती है। ‘मुञ्चन्तु मा शपथ्यात्०’ (१२।९०) इत्यादि मन्त्रसे हवन करनेपर शाप या शपथ आदि समस्त किल्बिषोंका नाश होता है। ‘मा मा हिंसीज्जनिताः०’ (१२।१०२) इत्यादि मन्त्रसे घृतमिश्रित तिलोंका होम शत्रुओंका विनाश करनेवाला होता है। ‘नमोऽस्तु सर्पेभ्यो०’ (१३।६) इत्यादि मन्त्रसे घृतका होम एवं ‘कृणुष्व पाजः०’ (१३।९) इत्यादि मन्त्रसे खीरका होम अभिचारका उपसंहार करनेवाला है। ‘काण्डात् काण्डात्०’ (१३।२०) इत्यादि मन्त्रसे दूर्वाकाण्डकी दस हजार आहुतियाँ देकर होता ग्राम या जनपदमें फैली हुई महामारीको शान्त करे। इससे रोगपीडित मनुष्य रोगसे और दुःखग्रस्त मानव दुःखसे छुटकारा पाता है। परशुराम ! ‘मधुमान्नो वनस्पतिः०’ (१३।२९) इत्यादि मन्त्रसे उदुम्बरकी एक हजार समिधाओंका हवन करके मनुष्य धन प्राप्त करता है तथा महान् सौभाग्य एवं व्यवहारमें विजय लाभ करता है। ‘अपां गम्भन्सीद मा त्वा०’ (वा० १३।३०) इत्यादि मन्त्रसे हवन करके मनुष्य निश्चय ही पर्जन्यदेवसे वर्षा करवा सकता है। धर्मज्ञ परशुराम ! ‘अपः पिवन् वौषधीः०’ (१४।८) इत्यादि मन्त्रसे दधि, घृत एवं मधुका हवन करके यजमान तत्काल महावृष्टि करवाता है। ‘नमस्ते रुद्र०’ (१६।१) इत्यादि मन्त्रसे आहुति दी जाय तो यह कर्म समस्त उपद्रवोंका नाशक, सर्वशान्तिदायक तथा महापातकोंका निवारक कहा गया है। ‘अध्यवोचदधिवक्ता०’ (१६।५) इत्यादि मन्त्रसे आहुति देनेपर व्याधिग्रस्त मनुष्यकी रक्षा होती है। इस मन्त्रसे किया गया हवन राक्षसोंका नाशक, कीर्तिकारक तथा दीर्घायु एवं पुष्टिका वर्धक है। मार्गमें सफेद सरसों फेंकते हुए इसका जप करनेवाला राहगीर सुखी होता है। धर्मज्ञ भृगुनन्दन ! ‘असौ यस्ताम्रः०’ (१६।६)—इसका पाठ करते हुए नित्य प्रातःकाल एवं सायंकाल आलस्यरहित होकर भगवान् सूर्यका उपस्थान करे। इससे वह अक्षय अन्न एवं दीर्घ आयु प्राप्त करता है। ‘प्रमुञ्च धन्वन्०’ (१६।९—१४) इत्यादि छः मन्त्रोंसे किया गया आयुधोंका अभिमन्त्रण युद्धमें शत्रुओंके लिये भयदायक है, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। ‘मा नो महान्तम्०’ (१६।१५) इत्यादि मन्त्रका जप एवं होम बालकोंके लिये शान्तिकारक होता है। ‘नमो हिरण्यबाहवे०’ (१६।१७) इत्यादि सात अनुवाकोंसे कडुए तेलमें मिलायी गयी राईकी आहुति दे तो वह शत्रुओंका नाश करनेवाली होती है। ‘नमो वः किरिकेभ्यो०’ (१६।४६)—इस अर्धमन्त्रसे एक लाख कमल-पुष्पोंका हवन करके मनुष्य राज्यलक्ष्मी प्राप्त कर लेता है तथा बिल्वफलोंसे उतनी ही आहुतियाँ देनेपर उसे सुवर्णराशिकी उपलब्धि होती है। ‘इमा रुद्राय०’ (१६।४८) मन्त्रसे तिलोंका होम करनेपर धनकी प्राप्ति होती है। एवं इसी मन्त्रसे घृतसिक्त दूर्वाका हवन करनेपर मनुष्य समस्त व्याधियोंसे मुक्त होता है। परशुराम ! ‘आशुः शिशानः०’ (१७।३३)—यह मन्त्र आयुधोंकी रक्षा एवं संग्राममें सम्पूर्ण शत्रुओंका विनाश करनेवाला है। धर्मज्ञ द्विजश्रेष्ठ ! ‘वाजश्च मे०’ (१८।१५—१९) इत्यादि पाँच मन्त्रोंसे घृतकी एक हजार आहुतियाँ दे। इससे मनुष्य नेत्ररोगसे मुक्त हो जाता है। ‘शं नो वनस्पते०’ (१९।३८) इस मन्त्रसे घरमें आहुति देनेपर वास्तुदोषका नाश होता है। ‘अग्न आयूंषि०’ (१९।३८) इत्यादि मन्त्रसे घृतका हवन करके मनुष्य किसीका द्वेषपात्र नहीं होता। ‘अपां फेनेन०’ (१९।७१) मन्त्रसे लाजाका होम करके योद्धा विजय प्राप्त करता है। ‘भद्रा उत प्रशस्तयो०’ (१४।३९) इत्यादि