अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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मन्त्रके जपसे इन्द्रियहीन अथवा दुर्बलेन्द्रिय मनुष्य समस्त इन्द्रियोंकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। ‘अग्निश्च पृथिवी च०’ (२६।१) इत्यादि मन्त्र उत्तम वशीकरण है। ‘अध्वना०’ (५।३३) आदि मन्त्रका जप करनेवाला मनुष्य व्यवहार (मुकदमे)-में विजयी होता है। कार्यके आरम्भमें ‘ब्रह्म क्षत्रं पवते०’ (१९।५) इत्यादि मन्त्रका जप सिद्धि प्रदान करता है। ‘संवत्सरोऽसि०’ (२७।४५) इत्यादि मन्त्रसे घृतकी एक लाख आहुतियाँ देनेवाला रोगमुक्त हो जाता है। ‘केतुं कृण्वन्०’ (२९।३७) इत्यादि मन्त्र संग्राममें विजय दिलानेवाला है। ‘इन्द्रोऽग्निर्धर्मः०’ मन्त्र युद्धमें धर्मसंगत विजयकी प्राप्ति कराता है। ‘धन्वना गा०’ (२९।३९) मन्त्रका धनुष ग्रहण करनेके समय जप करना उत्तम माना गया है। ‘यजीत०’— यह मन्त्र धनुषकी प्रत्यञ्चाको अभिमन्त्रित करनेके लिये है, ऐसा जानना चाहिये। ‘अहिरिव भोगैः०’ (२९।५१) मन्त्रका बाणोंको अभिमन्त्रित करनेमें प्रयोग करे। ‘वह्नीनां पिता०’ (२९।४२)—यह तूणीरको अभिमन्त्रित करनेका मन्त्र बतलाया गया है। ‘युञ्जन्त्यस्य०’ (२३।६) इत्यादि मन्त्र अश्वोंको रथमें जोतनेके लिये उपयोगी बताया गया है। ‘आशुः शिशानः०’ (१७।३३)—यह मन्त्र यात्रारम्भके समय मङ्गलके रूपमें पठनीय कहा जाता है। ‘विष्णोः क्रमोऽसि०’ (१२।५) मन्त्रका पाठ रथारोहणके समय करना उत्तम है। ‘आजङ्घन्ति०’ (२९।५०)—इस मन्त्रसे अश्वको प्रेरित करनेके लिये प्रथम बार चाबुकसे हाँके। ‘याः सेना अभित्वरीः०’ (११।७७) इत्यादि मन्त्रका शत्रुसेनाके सम्मुख जप करे। ‘दुन्दुभ्यः०’ इत्यादि मन्त्रसे दुन्दुभि या नगारेको पीटे। इन मन्त्रोंसे पहले हवन करके तब उपर्युक्त कर्म करनेपर योद्धाको संग्राममें विजय प्राप्त होती है। विद्वान् पुरुष ‘यमेन दत्तं०’ (२९।१३)—इस मन्त्रसे एक करोड़ आहुतियाँ देकर संग्रामके लिये शीघ्र ही विजयप्रद रथ उत्पन्न कर सकता है। ‘आकृष्णेन०’ (३४।३१) इत्यादि मन्त्रसे साध्यकर्म व्याहृतियोंके समान ही होता है। ‘यज्जाग्रतो०’ (३४।१) इत्यादि शिवसंकल्प-सम्बन्धी सूक्तोंके जपसे साधकका मन एकाग्र होता है। ‘पञ्चनद्यः०’ (३४।११) इत्यादि मन्त्रसे पाँच लाख घीकी आहुतियाँ देनेपर लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। ‘यदाबध्नन् दाक्षायणाः०’ (३४।५२)—इस मन्त्रसे हजार बार अभिमन्त्रित करके सुवर्णको धारण करे। यह प्रयोग शत्रुओंका निवारण करनेवाला होता है। ‘इमं जीवेभ्यः०’ (३५।१५) मन्त्रसे शिला अथवा ढेलेको अभिमन्त्रित करके घरमें चारों ओर फेंक दे। ऐसा करनेवालेको रातमें चोरोंसे भय नहीं होता। ‘परीमे गामनेषत्०’ (३५।१८)—यह उत्तम वशीकरण-मन्त्र है। इस मन्त्रके प्रयोगसे मारनेके लिये आया हुआ मनुष्य भी वशमें हो जाता है। धर्मात्मन्! उक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित भक्ष्य, ताम्बूल, पुष्प आदि किसीको दे दिया जाय तो वह शीघ्र ही देनेवालेके वशीभूत हो जायगा। ‘शं नो मित्रः०’ (३६।९)—यह मन्त्र सदैव सभी स्थानोंपर शान्ति प्रदान करनेवाला है। ‘गणानां त्वा गणपतिं०’ (२३।१९)—इस मन्त्रसे चौराहेपर सप्तधान्यका हवन करके होता सम्पूर्ण जगत्को वशीभूत कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। ‘हिरण्यवर्णाः शुचयः०’— इस मन्त्रका अभिषेकमें प्रयोग करना चाहिये। ‘शं नो देवीरभीष्टये०’ (३६।१२)—यह मन्त्र परम शान्तिकारक है। ‘एकचक्र०’ इत्यादि मन्त्रसे आज्यभागपूर्वक ग्रहोंके लिये घीकी आहुति देनेपर साधकको शान्ति प्राप्त होती है और निस्संदेह उसे ग्रहोंका कृपाप्रसाद सुलभ हो जाता है। ‘गाव उपावतावम्०’ (३३।२९) एवं ‘भग प्रणेतः०’