अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 558, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २६१ * ५३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
(३४।३६-३७) इत्यादि दो मन्त्रोंसे घृतका हवन करके मनुष्य गौओंकी प्राप्ति करता है। 'प्रवादां षः सोपतु०' — इस मन्त्रका ग्रहयज्ञमें प्रयोग होता है। 'देवेभ्यो वनस्पते०' इत्यादि मन्त्रका वृक्षयज्ञमें विनियोग होता है। गायत्रीको विष्णुरूपा जाने। समस्त पापोंका प्रशमन एवं समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला विष्णुका परमपद भी वही है॥ २३-८४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'यजुर्वेद-विधान-कथन' नामक दो सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६०॥
दो सौ इकसठवाँ अध्याय
सामविधान — सामवेदोक्त मन्त्रोंका भिन्न-भिन्न कार्योंके लिये प्रयोग
पुष्कर कहते हैं — परशुराम! मैंने तुम्हें 'यजुर्विधान' कह सुनाया, अब मैं 'सामविधान' कहूँगा। 'वैष्णवी-संहिता' का जप करके उसका दशांश होम करे। इससे मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका भागी होता है। 'छान्दसी-संहिता' का विधिपूर्वक जप करके मानव भगवान् शंकरको प्रसन्न कर लेता है। 'स्कन्द-संहिता' और 'पितृ-संहिता'का जप करनेसे प्रसन्नताकी प्राप्ति होती है। 'यत इन्द्र भजामहे०' (१३२१) — इस मन्त्रका जप हिंसा-दोषका नाश करनेवाला है। 'अग्निस्तिग्मेन०' (२२) इत्यादि मन्त्रका जप करनेवाला अवकीर्णी (जिसका ब्रह्मचर्यावस्थामें ही ब्रह्मचर्य खण्डित हो गया हो, वह) पुरुष भी अपने पाप-दोषसे मुक्त हो जाता है। 'परीतोऽषिञ्चता सुतम्०' (५१२) इत्यादि साममन्त्र समस्त पापोंका नाश करनेवाला है, ऐसा जानना चाहिये। जिसने प्रमादवश निषिद्ध वस्तुका विक्रय कर लिया हो, वह उसके प्रायश्चित्तरूपसे 'घृतवती भुवना०' (३७८) इत्यादि मन्त्रका जप करे। 'अद्य नो देव सवितः०' (१४१) — यह मन्त्र दुःस्वप्नोंका नाश करनेवाला है। भृगुश्रेष्ठ परशुराम! 'अबोध्यूग्निः०' (१७४६) इत्यादि मन्त्रसे विधिवत् घृतका हवन करे। फिर शेष घृतसे मेखलाबन्ध (करधनी आदि)-का सेचन करे। वह मेखलाबन्ध ऐसी स्त्रियोंको धारण करावे, जिनके गर्भ गिर जाते रहे हों। तदनन्तर बालकके उत्पन्न होनेपर उसे पूर्वोक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित मणि पहनावे। 'सोमं राजानम्०' (९१) मन्त्रके जपसे रोगी व्याधियोंसे छुटकारा पाता है। सर्प-सामका प्रयोग करनेवालेको कभी सर्पोंसे भय नहीं प्राप्त होता। ब्राह्मण 'मा पापत्वाय नोः०' (९१८) — इस मन्त्रसे सहस्र आहुतियाँ देकर शतावरीयुक्त मणि बाँधनेसे शस्त्रभयको नहीं प्राप्त होता। 'दीर्घतमसोऽर्कः०' — इस साममन्त्रसे हवन करनेपर प्रचुर अन्नकी प्राप्ति होती है। 'समन्या यन्तिः०' (६०७) — इस सामका जप करनेवाला प्याससे नहीं मर सकता। 'त्वमिमा ओषधीः०' (६०४) — इस मन्त्रका जप करनेसे मनुष्य कभी व्याधिग्रस्त नहीं होता। मार्गमें 'देवव्रत-साम' का जप करके मानव भयसे छुटकारा पा जाता है। 'यदिन्द्रो अनुनयत्०' (१४८) — यह मन्त्र हवन करनेपर सौभाग्यकी वृद्धि करता है। परशुराम! 'भगो न चित्रो०' (४४९) — इस मन्त्रका जप करके नेत्रोंमें लगाया गया अञ्जन हितकारक एवं सौभाग्यवर्द्धक होता है, इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। 'इन्द्र' — इस पदसे प्रारम्भ होनेवाले मन्त्रवर्गका जप करे। इससे सौभाग्यकी वृद्धि होती है। 'परि प्रिया दिवः कविः०' (४७६) — यह मन्त्र, जिसे प्राप्त करनेकी इच्छा