अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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भगवान्के श्रीअङ्गोंमें चन्दनका अनुलेपन करे। फिर ‘युवा सुवासाः०’ (ऋक्० ३।८।४) मन्त्रसे वस्त्र और ‘पुष्पवती०’ (अथर्व० ८।७।२७) इत्यादि मन्त्रसे पुष्प एवं ‘धूरसि०’ (यजु० १।८) आदि मन्त्रसे धूप समर्पित करे। ‘तेजोऽसि शुक्रमसि०’ (यजु० १।३१)—इस मन्त्रसे दीप तथा ‘दधिक्राव्णो०’ (यजु० २३।३२) मन्त्रसे मधुपर्क निवेदन करे। नरश्रेष्ठ! तदनन्तर ‘हिरण्यगर्भः०’ आदि आठ ऋचाओंका पाठ करके अन्न एवं सुगन्धित पेय पदार्थका नैवेद्य समर्पित करे। इसके अतिरिक्त भगवान्को चामर, व्यजन, पादुका, छत्र, यान एवं आसन आदि जो कुछ भी समर्पित करना हो, वह सावित्र-मन्त्रसे अर्पण करे। फिर ‘पुरुषसूक्त’ का जप करे और उसीसे आहुति दे। भगवद्विग्रहके अभावमें वेदिकापर स्थित जलपूर्ण कलशमें, अथवा नदीके तटपर, अथवा कमलके पुष्पमें भगवान् विष्णुका पूजन करनेसे उत्पातोंकी शान्ति होती है॥ १—७॥
(काम्य बलिवैश्वदेव-प्रयोग) भूमिस्थ वेदीका मार्जन एवं प्रोक्षण करके उसके चारों ओर कुशको बिछावे। फिर उसपर अग्निको प्रदीप्त करके उसमें होम करे$^१$। महाभाग परशुराम! मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए सब प्रकारकी रसोईमेंसे अग्राशन निकालकर गृहस्थ द्विज क्रमशः वासुदेव आदिके लिये आहुतियाँ दे। मन्त्रवाक्य इस प्रकार हैं—
‘प्रभवे अव्ययाय देवाय वासुदेवाय नमः स्वाहा। अग्नये नमः स्वाहा। सोमाय नमः स्वाहा। मित्राय नमः स्वाहा। वरुणाय नमः स्वाहा। इन्द्राय नमः स्वाहा। इन्द्राग्नीभ्यां नमः स्वाहा। विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः स्वाहा। प्रजापतये नमः स्वाहा। अनुमत्यै नमः स्वाहा। धन्वन्तरये नमः स्वाहा। वास्तोष्पतये नमः स्वाहा। देव्यै$^२$ नमः स्वाहा। एवं अग्नये स्विष्टकृते नमः स्वाहा।’ इन देवताओंको उनका चतुर्थ्यन्त नाम लेकर एक-एक ग्रास अन्नकी आहुति दे। तत्पश्चात् निम्नाङ्कित रीतिसे बलि समर्पित करे॥ ८—१२॥
धर्मज्ञ! पहले अग्निदिशासे आरम्भ करके तक्षा, उपतक्षा, अश्वा, ऊर्णा, निरुन्थी, धूम्प्रिणीका, अस्वपन्ती तथा मेघपत्नी—इनको बलि अर्पित करे। भृगुनन्दन! ये ही समस्त बलिभागिनी देवियोंके नाम हैं। क्रमशः आग्नेय आदि दिशाओंसे आरम्भ करके इन्हें बलि दे। (बलि-समर्पणके वाक्य इस प्रकार हैं—तक्षायै नमः आग्नेय्याम्, उपतक्षायै नमः याम्ये, अश्वाभ्यो नमः नैर्ऋत्ये, ऊर्णाभ्यो नमः वारुण्याम्, निरुन्ध्यै नमः वायव्ये, धूम्प्रिणीकायै नमः उदीच्याम्, अस्वपन्त्यै नमः ऐशान्याम्, मेघपत्न्यै नमः प्राच्याम्।) भार्गव! तदनन्तर नन्दिनी आदि शक्तियोंको बलि अर्पित करे। यथा—नन्दिन्यै नमः, सुभागायै नमः (अथवा सौभाग्यायै नमः), सुमङ्गल्यै नमः, भद्रकाल्यै$^३$ नमः। इन चारोंके लिये पूर्वादि चारों दिशाओंमें बलि देकर किसी खम्भे या खूँटेपर लक्ष्मी$^४$ आदिके लिये बलि दे। यथा—श्रियै नमः, हिरण्यकेश्यै नमः तथा वनस्पतये नमः। द्वारपर
१. यहाँ मूलमें संक्षेपसे अग्निस्थापनकी विधि दी गयी है। इसे विशदरूपमें इस प्रकार समझें—पहले भूमिस्थ वेदीपर कुशोंसे सम्मार्जन करके उन कुशोंको ईशान दिशामें फेंक दे; इसके बाद उस वेदीपर शुद्ध जल छिड़के। तदनन्तर स्रुवाके मूलभागसे उस वेदीपर तीन उत्तरोत्तर रेखाएँ अङ्कित करे। इन रेखाओंकी लंबाई प्रादेशमात्र हो। उल्लेखन-क्रमसे रेखाओंके ऊपरसे थोड़ी-थोड़ी मिट्टी अनामिका एवं अङ्गुष्ठद्वारा उठाकर बायें हाथपर रखे और उन सबको एक साथ फेंक दे। तत्पश्चात् गोबर और जलसे उस वेदीको लीपे और उसके ऊपर कांस्यपात्रमें अग्नि मँगाकर स्थापित करे। उस अग्निके ऊपर कुछ काष्ठकी समिधाएँ रखकर अग्निको प्रज्वलित करे। वेदीके चारों ओर कुश बिछा दे। फिर प्रज्वलित अग्निमें होम करे।
२. मनुस्मृतिके अनुसार यह आहुति 'द्यावा-पृथिवी'के लिये दी जाती है। यथा—'द्यावापृथिवीभ्यां नमः स्वाहा।'
३. मनुस्मृतिके अनुसार भद्रकालीको बलि वास्तुपुरुषके चरणकी दिशा—दक्षिण-पश्चिममें देनी चाहिये।
४. लक्ष्मीको वास्तुपुरुषके शिरोभाग उत्तर-पूर्वमें बलि दी जाती है।