अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 564, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २६४ * ५३७
दक्षिणभागमें 'धर्ममयाय नमः', वामभागमें 'अधर्ममयाय नमः', घरके भीतर 'ध्रुवाय नमः', घरके बाहर 'मृत्यवे नमः' तथा जलाशयमें 'वरुणाय नमः'—इस मन्त्रसे बलि अर्पित करे। फिर घरके बाहर 'भूतेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे भूतबलि दे। घरके भीतर 'धनदाय नमः' कहकर कुबेरको बलि दे। इसके बाद मनुष्य घरसे पूर्वदिशामें 'इन्द्राय नमः, इन्द्रपुरुषेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे इन्द्र और इन्द्रके पार्षदपुरुषोंको बलि अर्पित करे। तत्पश्चात् दक्षिणमें 'यमाय नमः, यमपुरुषेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे, 'वरुणाय नमः, वरुणपुरुषेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे पश्चिममें, 'सोमाय नमः, सोमपुरुषेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे उत्तरमें और 'ब्रह्मणे वास्तोष्पतये नमः, ब्रह्मपुरुषेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे गृहके मध्यभागमें बलि दे। 'विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे घरके आकाशमें ऊपरकी ओर बलि अर्पित करे। 'स्थण्डिलाय नमः'—इस मन्त्रसे पृथ्वीपर बलि दे। तत्पश्चात् 'दिवाचारिभ्यो भूतेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे दिनमें बलि दे तथा 'रात्रिचारिभ्यो भूतेभ्यो नमः'—इस मन्त्रसे रात्रिमें बलि अर्पित करे। घरके बाहर जो बलि दी जाती है, उसे प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल देते रहना चाहिये। यदि दिनमें श्राद्ध-सम्बन्धी पिण्डदान किया जाय तो उस दिन सायंकालमें बलि नहीं देनी चाहिये॥ १३–२२॥
पितृ-श्राद्धमें दक्षिणाग्र कुशोंपर पहले पिताको, फिर पितामहको और उसके बाद प्रपितामहको पिण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार पहले माताको, फिर पितामहीको, फिर प्रपितामहीको पिण्ड अथवा जल दे। इस प्रकार 'पितृयाग' करना चाहिये॥ २३ १/२॥
बने हुए पाकमेंसे बलिवैश्वदेव करनेके बाद पाँच बलियाँ दी जाती हैं। उनमें सर्वप्रथम 'गो-बलि' है; किंतु यहाँ पहले 'काकबलि' का विधान किया गया है—
काकबलि
इन्द्रवारुणवायव्या याम्या वा नैर्ऋताश्च ये॥
ते काकाः प्रतिगृह्णन्तु इमं पिण्डं मयोद्धृतम्। १
'जो इन्द्र, वरुण, वायु, यम एवं निर्ऋति देवताकी दिशामें रहते हैं, वे काक मेरेद्वारा प्रदत्त यह पिण्ड ग्रहण करें।' इस मन्त्रसे काकबलि देकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे कुत्तोंके लिये अन्नका ग्रास दे॥ २४-२५॥
कुक्कुर-बलि
विवस्वतः कुले जातौ द्वौ श्यामाशबलौ २ शूनौ।
ताभ्यां पिण्डं प्रदास्यामि रक्षतां पथि मां सदा॥
'श्याम और शबल (काले और चितकबरे) रंगवाले दो श्वान विवस्वान्के कुलमें उत्पन्न हुए हैं। मैं उन दोनोंके लिये पिण्ड प्रदान करता हूँ। वे लोक-परलोकके मार्गमें सदा मेरी रक्षा करें'॥ २६॥
गो-ग्रास
सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पापनाशनाः ३।
प्रतिगृह्णन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः॥
'त्रैलोक्यजननी, सुरभिपुत्री गौएँ सबका हित करनेवाली, पवित्र एवं पापोंका विनाश करनेवाली हैं। वे मेरे द्वारा दिये हुए ग्रासको ग्रहण करें।' इस मन्त्रसे गो-ग्रास देकर स्वस्त्ययन करे। फिर याचकोंको भिक्षा दिलावे। तदनन्तर दीन प्राणियों एवं अतिथियोंका अन्नसे सत्कार करके गृहस्थ स्वयं भोजन करे॥ २७–२८॥
(अनाहिताग्नि पुरुष निम्नलिखित मन्त्रोंसे जलमें अन्नकी आहुतियाँ दे—)
ॐ भूः स्वाहा। ॐ भुवः स्वाहा। ॐ स्वः
१. उत्तरार्धके स्थानमें यह पाठान्तर उपलब्ध होता है—वायसाः प्रतिगृह्णन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम्।
२. कहीं-कहीं—द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ। ताभ्यामन्नं प्रदास्यामि स्यातामेतावहिंसकौ॥—ऐसा पाठ मिलता है।
३. पाठान्तर—'पुण्यराशयः।'