अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 576, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २७२ * ५४९
पद्मसंहिता (भूमिखण्ड) है, उसमें बारह* हजार श्लोक हैं। ज्येष्ठमासकी पूर्णिमाको गौके साथ इसका दान करना चाहिये। महर्षि पराशरने वाराह-कल्पके वृत्तान्तको अभिगत करके तेईस हजार श्लोकोंका 'विष्णुपुराण' कहा है। इसे आषाढ़की पूर्णिमाको जलधेनुसहित प्रदान करे। इससे मनुष्य भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त होता है। चौदह हजार श्लोकोंवाला 'वायुपुराण' भगवान् शंकरको अत्यन्त प्रिय है। इसमें वायुदेवने श्वेतकल्पके प्रसङ्गसे धर्मका वर्णन किया है। इस पुराणको लिखकर श्रावणकी पूर्णिमाको गुड़धेनुके साथ ब्राह्मणको दान करे। गायत्री-मन्त्रका आश्रय लेकर निर्मित हुए जिस पुराणमें भागवत-धर्मका विस्तृत वर्णन है, सारस्वतकल्पका प्रसङ्ग कहा गया है तथा जो वृत्रासुर-वधकी कथासे युक्त है- उस पुराणको 'भागवत' कहते हैं। इसमें अठारह हजार श्लोक हैं। इसको सोनेके सिंहासनके साथ भाद्रपदकी पूर्णिमाको दान करे। जिसमें देवर्षि नारदने बृहत्कल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर धर्मोंकी व्याख्या की है, वह 'नारदपुराण' है। उसमें पचीस हजार श्लोक हैं। आश्विनमासकी पूर्णिमाको धेनुसहित उसका दान करे। इससे आत्यन्तिक सिद्धि प्राप्त होती है। जिसमें पक्षियोंके द्वारा धर्माधर्मका विचार किया गया है, नौ हजार श्लोकोंवाले उस 'मार्कण्डेयपुराण' का कार्तिककी पूर्णिमाको दान करे। अग्निदेवने वसिष्ठ मुनिको जिसका श्रवण कराया है, वह 'अग्निपुराण' है। इस ग्रन्थको लिखकर मार्गशीर्षकी पूर्णिमा तिथिमें ब्राह्मणके हाथमें दे। इस पुराणका दान सब कुछ देनेवाला है। इसमें बारह हजार ही श्लोक हैं और यह पुराण सम्पूर्ण विद्याओंका बोध करानेवाला है। 'भविष्यपुराण' सूर्य-सम्भव है। इसमें सूर्यदेवकी महिमा बतायी गयी है। इसमें चौदह हजार श्लोक हैं। इसे भगवान् शंकरने मनुसे कहा है। गुड़ आदि वस्तुओंके साथ पौषकी पूर्णिमाको इसका दान करना चाहिये। सावर्ण्य-मनुने नारदसे 'ब्रह्मवैवर्तपुराण' का वर्णन किया है। इसमें रथन्तर-कल्पका वृत्तान्त है और अठारह हजार श्लोक हैं। माघमासकी पूर्णिमाको इसका दान करे। वराहके चरित्रसे युक्त जो 'वाराहपुराण' है, उसका भी माघ मासकी पूर्णिमाको दान करे। ऐसा करनेसे दाता ब्रह्मलोकका भागी होता है। जहाँ अग्निमय लिङ्गमें स्थित भगवान् महेश्वरने आग्नेयकल्पके वृत्तान्तोंसे युक्त धर्मोंका विवेचन किया है, वह ग्यारह हजार श्लोकोंवाला 'लिङ्गपुराण' है। फाल्गुनकी पूर्णिमाको तिलधेनुके साथ उसका दान करके मनुष्य शिवलोकको प्राप्त होता है। 'वाराहपुराण' में भगवान् श्रीविष्णुने भूदेवीके प्रति मानव-जगत्की प्रवृत्तिसे लेकर वराह-चरित्र आदि उपाख्यानोंका वर्णन किया है। इसमें चौबीस हजार श्लोक हैं। चैत्रकी पूर्णिमाको 'गरुडपुराण' का सुवर्णके साथ दान करके मनुष्य विष्णुपदको प्राप्त होता है। 'स्कन्दमहापुराण' चौरासी हजार श्लोकोंका है। कुमार स्कन्दने तत्पुरुष-कल्पकी कथा एवं शैवमतका आश्रय लेकर इस महापुराणका प्रवचन किया है। इसका भी चैत्रकी पूर्णिमाको दान करना चाहिये। दस हजार श्लोकोंसे युक्त 'वामनपुराण' धर्मार्थ आदि पुरुषार्थोंका अवबोधक है। इसमें श्रीहरिकी धौमकल्पसे सम्बन्धित कथाका वर्णन है। शरद् पूर्णिमामें विषुव-संक्रान्तिके समय इसका दान करे। 'कूर्मपुराण'में आठ हजार श्लोक हैं। कूर्मावतार श्रीहरिने इन्द्रद्युम्नके प्रसङ्गसे रसातलमें इसको कहा था। इसका सुवर्णमय कच्छपके साथ दान करना चाहिये। मत्स्यरूपी श्रीविष्णुने कल्पके
* द्वादशैव सहस्राणां पद्माख्या या तु संहिता। (पद्मपु०, भूमिखण्ड)