अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 577, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें५५० * अग्निपुराण *
आदिकालमें मनुको तेरह हजार श्लोकोंसे युक्त 'मत्स्यपुराण' का श्रवण कराया था। इसे हेमनिर्मित मत्स्यके साथ प्रदान करे। आठ हजार श्लोकोंवाले 'गरुडपुराण' का भगवान् श्रीविष्णुने तार्क्ष्यकल्पमें प्रवचन किया था। इसमें विश्वाण्डसे गरुड़की उत्पत्तिकी कथा कही गयी है। इसका स्वर्णहंसके साथ दान करे। भगवान् ब्रह्माने ब्रह्माण्डके माहात्म्यका आश्रय लेकर जिसे कहा है, बारह हजार श्लोकोंवाले उस 'ब्रह्माण्डपुराण' को भी लिखकर ब्राह्मणके हाथमें दान करे॥ १—२२$\frac{१}{२}$॥
महाभारत-श्रवणकालमें प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर पहले कथावाचकका वस्त्र, गन्ध, माल्य आदिसे पूजन करे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको खीरका भोजन करावे। प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर गौ, भूमि, ग्राम तथा सुवर्ण आदिका दान करे। महाभारतके पूर्ण होनेपर कथावाचक ब्राह्मण और महाभारत-संहिताकी पुस्तकका पूजन करे। ग्रन्थको पवित्र स्थानपर रेशमी वस्त्रसे आच्छादित करके पूजन करना चाहिये। फिर भगवान् नर-नारायणकी पुष्प आदिसे पूजा करे। गौ, अन्न, भूमि, सुवर्णके दानपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराकर क्षमा-प्रार्थना करे। श्रोताको विविध रत्नोंका महादान करना चाहिये। प्रत्येक मासमें कथावाचकको दो या तीन माशे सुवर्णका दान करे और अयनके प्रारम्भमें भी पहले उसके लिये सुवर्णके दानका विधान है। द्विजश्रेष्ठ! समस्त श्रोताओंको भी कथावाचकका पूजन करना चाहिये। जो मनुष्य इतिहास एवं पुराणोंका पूजन करके दान करता है, वह आयु, आरोग्य, स्वर्ग और मोक्षको भी प्राप्त कर लेता है*॥ २३—२९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पुराणदान आदिके माहात्म्यका कथन' नामक दो सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७२॥
दो सौ तिहत्तरवाँ अध्याय
सूर्यवंशका वर्णन
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! अब मैं तुमसे सूर्यवंश तथा राजाओंके वंशका वर्णन करता हूँ। भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजी प्रकट हुए हैं। ब्रह्माजीके पुत्रका नाम मरीचि है। मरीचिसे कश्यप तथा कश्यपसे विवस्वान् (सूर्य)-का जन्म हुआ है। सूर्यकी तीन स्त्रियाँ हैं—संज्ञा, राज्ञी और प्रभा। इनमेंसे 'राज्ञी' रैवतकी पुत्री हैं। उन्होंने 'रेवन्त' नामवाले पुत्रको जन्म दिया है। सूर्यकी 'प्रभा' नामवाली पत्नीसे 'प्रभात' नामवाला पुत्र हुआ। 'संज्ञा' विश्वकर्माकी पुत्री है। उनके गर्भसे वैवस्वत मनु तथा जुड़वीं संतान यम और यमुनाकी उत्पत्ति हुई है। (संज्ञाकी छायाको भी,
* इस अध्यायमें विभिन्न पुराणोंकी जो श्लोक-संख्याएँ दी गयी हैं, वे अन्य पुराणोंके वर्णनोंसे बहुत अंशमें मेल नहीं खाती हैं तथा उपलब्ध पुराणोंको देखनेसे भी इन वर्णनोंकी प्रायः संगति नहीं बैठती है। पद्मपुराणमें जहाँ छप्पन हजार श्लोक हैं, वहाँ इसमें बारह हजार ही श्लोक बताये गये हैं। सम्भव है, केवल पद्मसंहिता (भूमिखण्ड)-के ही इतने श्लोक कहे गये हों। विष्णुपुराणमें पाँच हजार श्लोक उपलब्ध होते हैं, किंतु इसमें तेईस हजार श्लोक कहे गये हैं। यदि विष्णुधर्मोत्तरपुराणके भी श्लोक इसके साथ सम्मिलित कर लिये जायँ तो उक्त संख्या संगत हो सकती है। वाराहपुराणके चौबीस हजार श्लोक बताये गये हैं, किंतु वर्तमान पुस्तकोंमें उतने श्लोक नहीं मिलते। गरुडपुराणमें आठ हजार श्लोक बताये गये हैं, परंतु उपलब्ध गरुडपुराणमें इससे दूनेसे भी अधिक श्लोक मिलते हैं। यह भी सम्भव है कि भूलसे गरुडपुराणकी जगह वाराहपुराण और वाराहपुराणके स्थानमें गरुडपुराण लिख गया हो।