अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 600, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय २८४ * ५७३
लवण—इनका चूर्ण (या क्वाथ) भी शोथको शान्त करता है॥ ३१—४०॥
निशोथ एवं गुड़के साथ त्रिफलाका क्वाथ विरेचन करनेवाला है। वच और मैनफलके क्वाथका जल वमनकारक होता है। भृङ्गराजके रसमें भावित त्रिफला सौ पल, बायविडंग और लोहचूर दस भाग एवं शतावरी, गिलोय और चिच्चक पचीस पल ग्रहण करके उसका चूर्ण बना ले। उस चूर्णको मधु, घृत और तेलके साथ चाटनेसे मनुष्य वली और पलितसे रहित होता है। अर्थात् उसके मुँहपर झुर्रियाँ नहीं होतीं और बाल नहीं पकते। इसके सिवा वह सम्पूर्ण रोगोंसे मुक्त होकर सौ वर्षोंतक जीवित रहता है। मधु और शर्कराके साथ त्रिफलाका सेवन सर्वरोगनाशक है। त्रिफला और पीपलका मिश्री, मधु और घृतके साथ भक्षण करनेपर भी पूर्वोक्त सभी फल या लाभ प्राप्त होते हैं। हर्रे, चित्रक, सोंठ, गिलोय और मुसलीका चूर्ण गुड़के साथ खानेपर रोगोंका नाश होता है और तीन सौ वर्षोंकी आयु प्राप्त होती है। जपा-पुष्पको थोड़ा मसलकर जलमें मिला ले। उस चूर्णजलको थोड़ी-सी मात्रामें तेलमें मिला देनेपर तैल घृताकार हो जाता है। जलगोह* (बिल्ली)-की जरायु (गर्भकी झिल्ली)-की धूप देनेसे चित्र दिखलायी नहीं देता। फिर शहदकी धूप देनेसे पूर्ववत् दिखायी देने लगता है। पाड़रकी जड़, कपूर, जोंक और मेढकका तेल—इनको पीसकर दोनों पैरोंमें लगाकर मनुष्य जलते हुए अङ्गारोंपर चल सकता है। तृणोत्थापन (तृणोंको आगमें ऊपर फेंकता-उछालता हुआ) आश्चर्यजनक खेल दिखलाता हुआ चल सकता है। विषोंका रोकना (अथवा विष एवं ग्रह-निवारण), रोगका नाश एवं तुच्छ क्रीड़ाएँ कामनापरक हैं। इहलौकिक तथा पारलौकिक दोनों सिद्धियोंके देनेवाले कर्मोंको मैंने तुम्हें बतलाया है, जो छः कर्मोंसे युक्त हैं। मन्त्र, ध्यान, औषध, कथा, मुद्रा और यज्ञ—ये छः जहाँ मुष्टि (भुजाके रूपसे सहायक) हैं, वह कार्य धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षरूप चतुर्वर्ग फलको देनेवाला कर्म बताया गया। इसे जो पढ़ेगा वह स्वर्गमें जायगा॥ ४१—५१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नानारोगहारी ओषधियोंका वर्णन' नामक दो सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८३॥
दो सौ चौरासीवाँ अध्याय
मन्त्ररूप औषधोंका कथन
धन्वन्तरिजी कहते हैं—सुश्रुत ! 'ओंकार' आदि मन्त्र आयु देनेवाले तथा सब रोगोंको दूर करके आरोग्य प्रदान करनेवाले हैं। इतना ही नहीं, देह छूटनेके पश्चात् वे स्वर्गकी भी प्राप्ति करानेवाले हैं। 'ओंकार' सबसे उत्कृष्ट मन्त्र है। उसका जप करके मनुष्य अमर हो जाता है—आत्माके अमरत्वका बोध प्राप्त करता है, अथवा देवरूप हो जाता है। गायत्री भी उत्कृष्ट मन्त्र है। उसका जप करके मनुष्य भोग और मोक्षका भागी होता है। 'ॐ नमो नारायणाय।'—यह अष्टाक्षर-मन्त्र समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।'—यह द्वादशाक्षर-मन्त्र सब कुछ देनेवाला है। 'ॐ हूं विष्णवे नमः।'—यह मन्त्र उत्तम औषध है। इस मन्त्रका जप करनेसे देवता और असुर श्रीसम्पन्न तथा नीरोग
* 'श्रोतुर्विडालो मार्जारो वृषदंशक आखुभाक्।' (अमरकोष, सिंहादिवर्ग)