अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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हो गये। जगत्के समस्त प्राणियोंका उपकार तथा धर्माचरण—यह महान् औषध है। ‘धर्मः, सद्धर्मकृत्, धर्मी'—इन धर्म-सम्बन्धी नामोंके जपसे मनुष्य निर्मल (शुद्ध) हो जाता है। श्रीदः, श्रीशः, श्रीनिवासः, श्रीधरः, श्रीनिकेतनः, श्रियःपतिः तथा श्रीपरमः'—इन श्रीपति-सम्बन्धी नामात्मक मन्त्रपदोंके जपसे मनुष्य लक्ष्मी (धन-सम्पत्ति)-को पा लेता है॥ १—५$\frac{१}{२}$॥
'कामी, कामप्रदः, कामः, कामपालः, हरिः, आनन्दः, माधवः'—श्रीहरिके इन नाम-मन्त्रोंके जप और कीर्तनसे समस्त कामनाओंकी पूर्ति हो जाती है। 'रामः, परशुरामः, नृसिंहः, विष्णुः, त्रिविक्रमः'—ये श्रीहरिके नाम युद्धमें विजयकी इच्छा रखनेवाले योद्धाओंको जपने चाहिये। नित्य विद्याभ्यास करनेवाले छात्रोंको सदा 'श्रीपुरुषोत्तम' नामका जप करना चाहिये। 'दामोदरः' नाम बन्धन दूर करनेवाला है। 'पुष्कराक्षः'—यह नाम-मन्त्र नेत्र-रोगोंका निवारण करनेवाला है। 'हृषीकेशः'—इस नामका स्मरण भयहारी है। औषध देते और लेते समय इन सब नामोंका जप करना चाहिये॥ ६—९॥
औषधकर्ममें ‘अच्युत'—इस अमृत-मन्त्रका भी जप करे। संग्राममें 'अपराजित'का तथा जलसे पार होते समय ‘श्रीनृसिंह'का स्मरण करे। जो पूर्वादि दिशाओंकी यात्रामें क्षेत्रकी कामना रखनेवाला हो, वह क्रमशः 'चक्री', 'गदी', 'शार्ङ्गी' और 'खड्गी'का चिन्तन करे। व्यवहारोंमें (मुकदमोंमें) भक्ति-भावसे 'सर्वेश्वर अजित'का स्मरण करे। 'नारायण'का स्मरण हर समय करना चाहिये। भगवान् 'नृसिंह'को याद किया जाय तो वे सम्पूर्ण भीतियोंको भगानेवाले हैं। 'गरुडध्वजः'—यह नाम विषका हरण करनेवाला है। 'वासुदेव' नामका तो सदा ही जप करना चाहिये। धान्य आदिको घरमें रखते समय तथा शयन करते समय भी ‘अनन्त' और 'अच्युत'का उच्चारण करे। दुःस्वप्न दीखनेपर 'नारायण'का तथा दाह आदिके अवसरपर 'जलशायी'का स्मरण करे। विद्यार्थी 'हयग्रीव'का चिन्तन करे। पुत्रकी प्राप्तिके लिये 'जगत्सूति (जगत्-स्रष्टा)'-का तथा शौर्यकी कामना हो तो 'श्रीबलभद्र'का स्मरण करे। इनमेंसे प्रत्येक नाम अभीष्ट मनोरथको सिद्ध करनेवाला है॥ १०—१४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मन्त्ररूप औषधका कथन' नामक दो सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८४॥
दो सौ पचासीवाँ अध्याय
मृतसंजीवनकारक सिद्ध योगोंका कथन
धन्वन्तरि कहते हैं—सुश्रुत! अब मैं आत्रेयके द्वारा वर्णित मृतसंजीवनकारक दिव्य सिद्ध योगोंको कहता हूँ, जो सम्पूर्ण व्याधियोंका विनाश करनेवाले हैं॥ १॥
आत्रेयने कहा—वातज्वरमें बिल्वादि पञ्चमूल—बेल, सोनापाठा, गम्भार, पाटल एवं अरणीका काढ़ा दे और पाचनके लिये पिप्पलीमूल, गिलोय और सोंठ—इनका क्वाथ दे। आँवला, अभया (बड़ी हर्रै), पीपल एवं चित्रक—यह आमलक्यादि क्वाथ सब प्रकारके ज्वरोंका नाश करनेवाला है। बिल्वमूल, अरणी, सोनापाठा, गम्भारी, पाटल, शालपर्णी, गोखरू, पृष्ठपर्णी, बृहती (बड़ी कटेर) और कण्टकारिका (छोटी कटेर)—ये दशमूल कहे गये हैं। इनका क्वाथ