अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 621, कुल 878 में से
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समय दोनोंका जप किया जा सकता है$^{१}$।) दुष्ट नक्षत्र, दुष्ट राशि तथा शत्रुरूप आदि अक्षरवाले मन्त्रोंको अवश्य त्याग देना चाहिये$^{२}$॥ ५–९$\frac{१}{२}$ ॥
( नक्षत्र-चक्र )
राज्यलाभोपकाराय प्रारभ्यारिः स्वरः कुरून्॥
गोपालकुकुटीं प्रायात् फुल्लावित्युदिता लिपिः$^{३}$।
(साधकके नामके प्रथम अक्षरको तथा मन्त्रके आदि अक्षरको लेकर गणना करके यह जानना है कि उस साधकके लिये वह मन्त्र अनुकूल है या प्रतिकूल ? इसीके लिये उपर्युक्त श्लोक एक संकेत देता है—) 'राज्य'से लेकर 'फुल्लौ'तक लिपिका ही संकेत है। 'इत्युदिता लिपिः' इस प्रकार लिपि कही गयी है। 'नारायणीय-तन्त्र'में इसकी व्याख्या करते हुए कहा गया है कि अश्विनीसे लेकर उत्तरभाद्रपदातकके छब्बीस नक्षत्रोंमें 'अ'से लेकर 'ह' तकके अक्षरोंको बाँटना है। किस नक्षत्रमें कितने अक्षर लिये जायँगे, इसके लिये उपर्युक्त श्लोक संकेत देता है। 'रा' से 'ल्लौ' तक छब्बीस अक्षर हैं; वे छब्बीस नक्षत्रोंके प्रतीक हैं। तन्त्रशास्त्रियोंने अपने संकेतवचनोंमें केवल व्यञ्जनोंको ग्रहण किया है और समस्त व्यञ्जनोंको कवर्ग, टवर्ग, पवर्ग तथा यवर्गमें बाँटा है। संकेत-लिपिका जो अक्षर जिस वर्गका प्रथम, द्वितीय, तृतीय या चतुर्थ अक्षर है, उससे उतनी ही संख्याएँ ली जायँगी। संयुक्ताक्षरोंमेंसे अन्तिम अक्षर ही गृहीत होगा। स्वरोंपर कोई संख्या नहीं है। उपर्युक्त श्लोकमें पहला अक्षर 'रा' है। यह यवर्गका दूसरा अक्षर है, अतः उससे दो संख्या ली जायगी। इस प्रकार 'रा' यह संकेत करता है कि अश्विनी-नक्षत्रमें दो अक्षर 'अ आ' गृहीत होंगे। दूसरा अक्षर है 'ज्य', यह संयुक्ताक्षर है, इसका अन्तिम अक्षर 'य' गृहीत होगा। वह अपने वर्गका प्रथम अक्षर है, अतः एकका बोधक होगा। इस प्रकार पूर्वोक्त 'ज्य'के संकेतानुसार भरणी नक्षत्रमें एक अक्षर 'इ' लिखा जायगा। इस बातको ठीक समझनेके लिये निम्नाङ्कित
$^{१}$. 'बृहन्नारायणीय-तन्त्र'में इसी भावकी पुष्टि निम्नाङ्कित श्लोकोंद्वारा की गयी है—
सुप्तः प्रबुद्धमात्रो वा मन्त्रः सिद्धिं न यच्छति। स्वापकालो वामवहो जागरो दक्षिणावहः॥
आग्नेयस्य मनोः सौम्यमन्त्रस्यैतद्विपर्ययः। प्रबोधकालं जानीयादुभयोरुभयावहः॥
स्वापकाले तु मन्त्रस्य जपोऽनर्थफलप्रदः।
इसमें स्पष्ट कहा गया है कि मन्त्र जब सो रहा हो, उस समय उसका जप अनर्थ-फलदायक होता है। 'नारायणीय-तन्त्र'में 'स्वाप' और 'जागरणकाल'को और भी स्पष्टताके साथ बताया गया है। वामनाड़ी, इडानाड़ी और चन्द्रनाड़ी एक वस्तु है तथा दक्षिणनाड़ी, सूर्यनाड़ी एवं पिङ्गलानाड़ी एक अर्थके वाचक पद हैं। पिङ्गलानाड़ीमें श्वासवायु चलती हो तो 'आग्नेय मन्त्र' प्रबुद्ध होते हैं, इडानाड़ीमें श्वासवायु चलती हो तो 'सोममन्त्र' जाग्रत् रहते हैं। पिङ्गला और इडा दोनोंमें श्वासवायुकी स्थिति हो अर्थात् यदि सुषुम्नामें श्वासवायु चलती हो तो सभी मन्त्र प्रबुद्ध (जाग्रत्) होते हैं। प्रबुद्ध मन्त्र ही साधकोंको अभीष्ट फल देते हैं। यथा—
पिङ्गलायां गते वायौ प्रबुद्धा ह्यग्निरूपिणः। इडां गते तु पवने बुध्यन्ते सोमरूपिणः॥
पिङ्गलेडागते वायौ प्रबुद्धाः सर्व एव हि। प्रबुद्धा मनवः सर्वे साधकानां फलन्त्युमे॥
$^{२}$. जैसा कि 'भैरवी-तन्त्र'में कहा गया है—
दुष्टर्क्षराशिमूलेभूतादिवर्णप्रचुरमन्त्रकम्। सम्यक् परीक्ष्य तं यत्नाद् वर्जयेन्मतिमान् नरः॥
$^{३}$. 'श्रीरुद्रयामल'में तथा 'नारायणीय तन्त्र'में भी यह श्लोक आया है, जो लिपि (अक्षर)-का संकेतमात्र है। इसमें शब्दार्थ अपेक्षित नहीं है। 'शारदातिलक'में दूसरा श्लोक संकेतके लिये प्रयुक्त हुआ है। इसमें छब्बीस नक्षत्रोंमें अक्षरोंके विभाजनका संकेत है, जो ज्योतिषकी प्रक्रियासे भिन्न है।