अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 622, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २९३ *
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चक्र देखिये—
| रा | २ | आश्विनी | अ आ |
|---|---|---|---|
| ज्य | १ | भरणी | इ |
| ला | ३ | कृत्तिका | ई उ ऊ |
| भो | ४ | रोहिणी | ऋ ॠ ऌ ॡ |
| प | १ | मृगशिरा | ए |
| का | १ | आर्द्रा | ऐ |
| रा | २ | पुनर्वसु | ओ औ |
| य | १ | पुष्य | क |
| प्रा | २ | आश्लेषा | ख ग |
| र | २ | मघा | घ ङ |
| भ्या | १ | पूर्वाफाल्गुनी | च |
| रिः | २ | उत्तराफाल्गुनी | छ ज |
| स्व | २ | हस्त | झ ञ |
| रः | २ | चित्रा | ट ठ |
| कु | १ | स्वाती | ड |
| रून् | २ | विशाखा | ढ ण |
| गो | ३ | अनुराधा | त थ द |
| पा | १ | ज्येष्ठा | ध |
| लान् | ३ | मूल | न प फ |
| कु | १ | पूर्वाषाढा | ब |
| कु | १ | उत्तराषाढा | भ |
| टी | १ | श्रवण | म |
| प्रा | २ | धनिष्ठा | य र |
| यान् | १ | शतभिषा | ल |
| फु | २ | पूर्वभाद्रपदा | व श |
| ल्लौ | ३ | उत्तरभाद्रपदा | ष स ह |
यह वर्णमाला नक्षत्रोंके साथ क्रमशः जोड़नी चाहिये। केवल 'अं अः'—ये दो अन्तिम स्वर रेवती नक्षत्रके साथ सदा जुड़े रहते हैं॥ १०-११$\frac{१}{२}$॥
(इनके द्वारा जन्म, सम्पद्, विपत्, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मित्र तथा अतिमित्र—इन तारोंका विचार किया जाता है। जहाँ साधकके नामका आदि अक्षर है, वहाँसे लेकर मन्त्रके आदि अक्षरतक गिने। उसमें नौका भाग देकर शेषके अनुसार जन्मादि तारोंको जाने।)
(बारह राशियोंमें वर्णोंका विभाजन)
वालं गौरं खुरं शोणं शमी शोभेति भेदिताः।
लिप्यर्णा राशिषु ज्ञेयाः षष्ठे शार्दींश्च योजयेत्॥ १२॥
(जैसा कि पूर्व श्लोकमें संकेत किया है, उसी तरह 'वा' से लेकर 'भा' तकके बारह अक्षर क्रमशः मेष आदि राशियों तथा ४ आदि संख्याओंकी ओर संकेत करते हैं—) वा ४ लं ३ गौ ३ रं २ खु २ रं २ शो ५ णं ५ भा ४। इन संख्याओंमें विभक्त हुए अकार आदि अक्षर क्रमशः मेष आदि राशियोंमें स्थित जानने चाहिये। 'श ष स ह' इन अक्षरोंको (तथा स्वरान्त्य वर्णों 'अं अः'को) छठी कन्याराशिमें संयुक्त करना चाहिये$^२$। क्षकारका मीनराशिमें प्रवेश है$^३$। यथा—
| ४ | अ आ इ ई | मेषराशि | १ |
|---|---|---|---|
| ३ | उ ऊ ऋ | वृषराशि | २ |
| ३ | ॠ ऌ ॡ | मिथुनराशि | ३ |
| २ | ए ऐ | कर्कराशि | ४ |
| २ | ओ औ | सिंहराशि | ५ |
| २ | अं अः<br>(श ष स ह ल) | कन्याराशि | ६ |
| ५ | क ख ग घ ङ | तुलाराशि | ७ |
| ५ | च छ ज झ ञ | वृश्चिकराशि | ८ |
| ५ | ट ठ ड ढ ण | धनुराशि | ९ |
| ५ | त थ द ध न | मकरराशि | १० |
| ५ | प फ ब भ म | कुम्भराशि | ११ |
| ४ | य र ल व (क्ष) | मीनराशि | १२ |
१. 'शारदातिलक'में भी यही बात कही गयी है—
'स्वरान्त्यौ तु रेवत्यंशगतौ सदा'॥ (२।१२५)
२. 'शारदातिलक' २।१२७ में यह श्लोक कुछ पाठान्तरके साथ ऐसा ही है। उसकी संस्कृत व्याख्यामें यही भाव व्यक्त किया गया है।
३. जैसा कि आचार्योंने कहा है—'अमः शवर्गलेभ्यश्च संजाता कन्यका मता।' तथा—'चतुर्भियदिभिः सार्धं स्यात् क्षकारस्तु मीनगः।'