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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 622, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 622
  • अध्याय २९३ *

५९५


चक्र देखिये—

राआश्विनीअ आ
ज्यभरणी
लाकृत्तिकाई उ ऊ
भोरोहिणीऋ ॠ ऌ ॡ
मृगशिरा
काआर्द्रा
रापुनर्वसुओ औ
पुष्य
प्राआश्लेषाख ग
मघाघ ङ
भ्यापूर्वाफाल्गुनी
रिःउत्तराफाल्गुनीछ ज
स्वहस्तझ ञ
रःचित्राट ठ
कुस्वाती
रून्विशाखाढ ण
गोअनुराधात थ द
पाज्येष्ठा
लान्मूलन प फ
कुपूर्वाषाढा
कुउत्तराषाढा
टीश्रवण
प्राधनिष्ठाय र
यान्शतभिषा
फुपूर्वभाद्रपदाव श
ल्लौउत्तरभाद्रपदाष स ह

यह वर्णमाला नक्षत्रोंके साथ क्रमशः जोड़नी चाहिये। केवल 'अं अः'—ये दो अन्तिम स्वर रेवती नक्षत्रके साथ सदा जुड़े रहते हैं॥ १०-११$\frac{१}{२}$॥

(इनके द्वारा जन्म, सम्पद‍्, विपत्, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मित्र तथा अतिमित्र—इन तारोंका विचार किया जाता है। जहाँ साधकके नामका आदि अक्षर है, वहाँसे लेकर मन्त्रके आदि अक्षरतक गिने। उसमें नौका भाग देकर शेषके अनुसार जन्मादि तारोंको जाने।)

(बारह राशियोंमें वर्णोंका विभाजन)

वालं गौरं खुरं शोणं शमी शोभेति भेदिताः।
लिप्यर्णा राशिषु ज्ञेयाः षष्ठे शार्दींश्च योजयेत्॥ १२॥

(जैसा कि पूर्व श्लोकमें संकेत किया है, उसी तरह 'वा' से लेकर 'भा' तकके बारह अक्षर क्रमशः मेष आदि राशियों तथा ४ आदि संख्याओंकी ओर संकेत करते हैं—) वा ४ लं ३ गौ ३ रं २ खु २ रं २ शो ५ णं ५ भा ४। इन संख्याओंमें विभक्त हुए अकार आदि अक्षर क्रमशः मेष आदि राशियोंमें स्थित जानने चाहिये। 'श ष स ह' इन अक्षरोंको (तथा स्वरान्त्य वर्णों 'अं अः'को) छठी कन्याराशिमें संयुक्त करना चाहिये$^२$। क्षकारका मीनराशिमें प्रवेश है$^३$। यथा—

अ आ इ ईमेषराशि
उ ऊ ऋवृषराशि
ॠ ऌ ॡमिथुनराशि
ए ऐकर्कराशि
ओ औसिंहराशि
अं अः<br>(श ष स ह ल)कन्याराशि
क ख ग घ ङतुलाराशि
च छ ज झ ञवृश्चिकराशि
ट ठ ड ढ णधनुराशि
त थ द ध नमकरराशि१०
प फ ब भ मकुम्भराशि११
य र ल व (क्ष)मीनराशि१२

१. 'शारदातिलक'में भी यही बात कही गयी है—
'स्वरान्त्यौ तु रेवत्यंशगतौ सदा'॥ (२।१२५)
२. 'शारदातिलक' २।१२७ में यह श्लोक कुछ पाठान्तरके साथ ऐसा ही है। उसकी संस्कृत व्याख्यामें यही भाव व्यक्त किया गया है।
३. जैसा कि आचार्योंने कहा है—'अमः शवर्गलेभ्यश्च संजाता कन्यका मता।' तथा—'चतुर्भियदिभिः सार्धं स्यात् क्षकारस्तु मीनगः।'