अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 627, कुल 878 में से
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कहता हूँ॥ १ ॥
शेष, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंखपाल एवं कुलिक—ये आठ नागोंमें श्रेष्ठ हैं। इन नागोंमेंसे दो नाग ब्राह्मण, दो क्षत्रिय, दो वैश्य और दो शूद्र कहे गये हैं*। ये चार वर्णोंके नाग क्रमशः दस सौ, आठ सौ, पाँच सौ और तीन सौ फणोंसे युक्त हैं। इनके वंशज पाँच सौ नाग हैं। उनसे असंख्य नागोंकी उत्पत्ति हुई है। आकारभेदसे
सर्पोंका वर्गीकरण
सर्पोंका वर्गीकरण
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भौम दिव्य
| (वासुकि आदि दिव्य दृष्टि-निश्वासवाले देवरूप और पूजनीय)
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सविष निर्विष (१२)
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दर्वीकर (२६) मण्डली (२२) राजिमान् (१०) वैकरञ्ज (७+३)=१०
(फणवाले) (अल्प फणवाले) (फणविहीन) दर्वीकर, मण्डली
शीघ्रगामी मन्दगामी, स्थूल विविध रंगकी रेखाओंसे तथा राजिमान् सर्पोंकी
चक्र, हल, छत्र, मण्डलाकार चकत्ते चित्रित श्लेष्मप्रकोपक, संकर संतानें होती हैं।
स्वस्तिक, अङ्कुश- शरीरपर होते हैं। रात्रिके अन्तिम प्रहरमें द्विदोष प्रकोपक,
धारी, वातप्रकोपक, चमकते सूर्यके समान विचरण करनेवाले, चित्र-विचित्र स्वभाव व
दिवाचारी, तरुणा- तेजयुक्त, पित्त- मध्यम आयुमें घातक आकृतिके, विविध प्रकारके
वस्थामें घातक प्रकोपक, पूर्वरात्रिमें प्रभावकारी
विचरनेवाले, वृद्धा-
वस्थामें घातक
‘सुश्रुत-संहिता’, पू० तन्त्र, कल्पस्थान, अध्याय ४ श्लोक २५ से २८ तक कुछ विशेष चिह्न और रंगोंके आधारपर सर्पोंमें ब्राह्मणादि जातियोंकी परिकल्पना की गयी है। जो सर्प मोती और चाँदीके समान सफेद, कपिल वर्णके सुनहरे रंगके तथा सुगन्धयुक्त होते हैं, वे जातिसे ब्राह्मण माने गये हैं। जो स्निग्ध वर्ण (चिकने), अत्यन्त क्रोधी, सूर्य और चन्द्रमाके समान आकृतिके या छत्र अथवा कमलके समान चिह्न धारण करनेवाले होते हैं, उन्हें क्षत्रिय जातिका सर्प मानना चाहिये। जो काले और वज्रके समान रंगवाले हैं अथवा जो कान्तिसे लाल, धूमिल एवं कबूतरके-से दिखायी देते हैं, वे सर्प वैश्य माने गये हैं। जिनका रंग भैसों और चीतोंके समान हो, जो कठोर त्वचावाले हों, वे भाँति-भाँतिके विचित्र रंगवाले सर्प शूद्र जातिके होते हैं।
*'तन्त्रसार-संग्रह' की 'विषनारायणीय' टीकामें ब्राह्मण आदि वर्णवाले दो-दो नागोंके क्रमके विषयमें एक श्लोक उपलब्ध होता है—
आद्यन्तौ च तदाद्यन्तौ तदाद्यन्तौ च मध्यगौ।
‘आदि और अन्तके नाग ब्राह्मण हैं। उसके बाद पुनः आदि-अन्तके नाग क्षत्रिय हैं, तत्पश्चात् पुनः आदि-अन्तके नाग वैश्य हैं और मध्यवर्ती दो नाग शूद्र हैं।’
‘शारदातिलक’ १०।७ में इन नागोंको त्वरिता देवीका आभूषण बताया गया है। उक्त श्लोककी टीकामें उद्धृत ‘नारायणीय तन्त्र'के श्लोकोंमें इन नागोंका ध्यान इस प्रकार बताया गया है—
अनन्तकुलिकौ विप्रौ वह्निवर्णावुदाहृतौ। प्रत्येकं तु सहस्रेण फणानां समलंकृतौ ॥
वासुकिः शङ्खपालश्च क्षत्रियौ पीतवर्णकौ। प्रत्येकं तु फणासप्तशतसंख्याविराजितौ ॥
तक्षकश्च महापद्मो वैश्यावेतावुभौ स्मृतौ। नीलवर्णौ फणापञ्चशतौ तुङ्गोत्तमाङ्गकौ ॥
पद्मकर्कोटकौ शूद्रौ फणात्रिशतकौ सितौ।