अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 628, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय २९४ * ६०१
सर्प फणी, मण्डली और राजिल—तीन प्रकारके माने जाते हैं। ये वात, पित्त और कफप्रधान हैं। इनके अतिरिक्त व्यन्तर, दोषमिश्र तथा दर्वीकर जातिवाले सर्प भी होते हैं। ये चक्र, हल, छत्र, स्वस्तिक और अंकुशके चिह्नोंसे युक्त होते हैं। गोनस सर्प विविध मण्डलोंसे चित्रित, दीर्घकाय और मन्दगामी होते हैं। राजिल सर्प स्निग्ध तथा ऊर्ध्वभाग और पार्श्वभागमें रेखाओंसे सुशोभित होते हैं। व्यन्तर सर्प मिश्रित चिह्नोंसे युक्त होते हैं। इनके पार्थिव, आप्य (जलसम्बन्धी), आग्नेय और वायव्य—ये चार मुख्य भेद और छब्बीस अवान्तर भेद हैं। गोनस सर्पोंके सोलह, राजिलजातीय सर्पोंके तेरह और व्यन्तर सर्पोंके इक्कीस भेद हैं। सर्पोंकी उत्पत्तिके लिये जो काल बताया गया है, उससे भिन्न कालमें जो सर्प उत्पन्न होते हैं, वे ‘व्यन्तर’ माने गये हैं। आषाढ़से लेकर तीन मासोंतक सर्पोंकी गर्भस्थिति होती है। गर्भस्थितिके चार मास व्यतीत होनेपर (सर्पिणी) दो सौ चालीस अंडे प्रसव करती है। सर्प-शावकके उन अंडोंसे बाहर निकलते ही उनमें स्त्री, पुरुष और नपुंसकके लक्षण प्रकट होनेसे पूर्व ही प्रायः सर्पगण उनको खा जाते हैं। कृष्णसर्प आँख खुलनेपर एक सप्ताहमें अंडेसे बाहर आता है। उसमें बारह दिनोंके बाद ज्ञानका उदय होता है। बीस दिनोंके बाद सूर्यदर्शन होनेपर उसके बत्तीस दाँत और चार दाढ़ें निकल आती हैं। सर्पकी कराली, मकरी, कालरात्रि और यमदूतिका—ये चार विषयुक्त दाढ़ें होती हैं। ये उसके वाम और दक्षिण पार्श्वमें स्थित होती हैं। सर्प छः महीनेके बाद केंचुलको छोड़ता है और एक सौ बीस वर्षतक जीवित रहता है। शेष आदि सात नाग क्रमशः रवि आदि वारोंके स्वामी माने गये हैं। वे वारेश दिन तथा रात्रिमें भी रहते हैं। (दिनके सात भाग करनेपर पहला भाग वारेशका होता है। शेष छः भागोंका अन्य छः नाग क्रमशः उपभोग करते हैं।) शेष आदि सात नाग अपने-अपने वारोंमें उदित होते हैं, किंतु कुलिकका उदय सबके संधिकालमें होता है। अथवा महापद्म और शङ्खपालके साथ कुलिकका उदय माना जाता है। मतान्तरके अनुसार महापद्म और शङ्खपालके मध्यकी दो घड़ियोंमें कुलिक* का उदय होता है। कुलिकोदयका समय सभी कार्योंमें दोषयुक्त
‘अनन्त (शेषनाग) और कुलिक—ये दो नाग ब्राह्मण कहे गये हैं। इनकी अङ्गकान्ति अग्निके समान उज्ज्वल है। इनमेंसे प्रत्येक सहस्र फणोंसे समलंकृत हैं। वासुकि और शङ्खपाल—ये क्षत्रिय हैं। इनकी कान्ति पीली है। इनमेंसे प्रत्येक सात सौ फणोंद्वारा सुशोभित हैं। तक्षक और महापद्म—ये दो नाग वैश्य माने गये हैं। इनकी अङ्गकान्ति नीली है। इनके उन्नत मस्तक पाँच-पाँच सौ फणोंसे अलंकृत हैं। पद्म तथा कर्कोटक—ये दो नाग शूद्र हैं और उनकी कान्ति श्वेत है।’
निम्नाङ्कित रीतिसे नागोंके वर्ण आदिको जानना चाहिये—
| नागोंके नाम | वर्ण | रंग | फण |
|---|---|---|---|
| १-शेषनाग (अनन्त) | ब्राह्मण | अग्निके समान | १,००० |
| २-कुलिक | ब्राह्मण | उज्ज्वल | १,००० |
| १-वासुकि, २ शङ्खपाल | क्षत्रिय | पीत | ७०० |
| अग्निपुराणके अनुसार | ८०० | ||
| १-तक्षक, २ महापद्म | वैश्य | नील | ५०० |
| १-पद्म, २ कर्कोटक | शूद्र | श्वेत | ३०० |
* प्रतिदिन दिनमानके सात भागोंमें वारेशसे आरम्भ कर कुलिकके सिवा अन्य सात नाग क्रमशः एक-एक अंशके स्वामी होते हैं। लोकप्रचलित फलित ग्रन्थोंमें शनिका अंश ही कुलिकका अंश माना गया है। इसलिये महापद्म और शङ्खपालके मध्यकी दो घड़ी ही सर्वसम्मत ‘कुलिकोदयकाल’ प्रतीत होता है।