अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 643, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें६१६ * अग्निपुराण *
यों कहना चाहिये। इन मूर्तियोंके पूजनका मन्त्र इस प्रकार है—‘ॐ आदित्याय नमः। एं रवये नमः। ॐ भानवे नमः। इं भास्कराय नमः। अं सूर्याय नमः।’ अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, ईशानकोण और वायव्यकोण—इन चार कोणोंमें तथा मध्यमें हृदादि पाँच अङ्गोंकी उनके नाम-मन्त्रोंसे पूजा करनी चाहिये। वे कर्णिकाके भीतर ही उक्त दिशाओंमें पूजनीय हैं। अस्त्रकी पूजा अपने सामनेकी दिशामें करनी चाहिये। पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः चन्द्रमा, बुध, गुरु और शुक्र पूजनीय हैं तथा आग्नेय आदि कोणोंमें मङ्गल, शनैश्चर, राहु और केतुकी पूजा करनी चाहिये॥ २०—२५ $\frac{१}{२}$ ॥
पृश्निपर्णी, हींग, बच, चक्र (पित्तपापड़ा), शिरीष, लहसुन और आमय—इन ओषधियोंको बकरेके मूत्रमें पीसकर अञ्जन और नस्य तैयार कर ले। उस अञ्जन और नस्यके रूपमें उक्त औषधोंका उपयोग किया जाय तो वे ग्रहबाधाका निवारण करनेवाले होते हैं। पाठा, पथ्या (हर्रै), वचा, शिग्रु (सहिजन), सिन्धु (सेंधा नमक), व्योष (त्रिकटु)—इन औषधोंको पृथक्-पृथक् एक-एक पल लेकर उन्हें बकरीके एक आढक दूधमें पका ले और उस दूधसे घी निकाल ले। वह घी समस्त ग्रहबाधाओंको हर लेता है। वृश्चिकाली (बिच्छू-घास), फला, कूट, सभी तरहके नमक तथा शार्ङ्गक—इनको जलमें पका ले। उस जलका अपस्मार रोग (मिरगी)-के विनाशके लिये उपयोग करे। विदारीकंद, कुश, काश तथा ईखके क्वाथसे सिद्ध किया हुआ दूध रोगीको पिलाये। जेठीमधु और भथएके एक दोन रसमें घीको पकाकर दे। अथवा पञ्चगव्य घीका उस रोगमें प्रयोग करे। अब ज्वर-निवारक उपाय सुनो—॥ २६-३०॥
ज्वर-गायत्री
ॐ भस्मास्त्राय विद्महे। एकदंष्ट्राय धीमहि। तन्नो ज्वरः प्रचोदयात्॥ ३१॥
(इस मन्त्रके जपसे ज्वर दूर होता है।) श्वास (दमा)-का रोगी कृष्णोषण (काली मिर्च), हल्दी, रास्ना, द्राक्षा और तिलका तैल एवं गुड़्का आस्वादन करे। अथवा वह रोगी जेठीमधु (मुलहठी) और घीके साथ भार्गीका सेवन करे या पाठा, तिक्ता (कुटकी), कर्णा (पिप्पली) तथा भार्गीको मधुके साथ चाटे। धात्री (आँवला), विश्वा (सोंठ), सिता (मिश्री), कृष्णा (पिप्पली), मुस्ता (नागरमोथा), खजूर मागधी (खजूर और पीपल*) तथा पीवरा (शतावर)—ये औषध हिक्का (हिचकी) दूर करनेवाले हैं। उपर्युक्त तीनों योग मधुके साथ लेने चाहिये। कामल-रोगसे ग्रस्त मनुष्यको जीरा, माण्डूकपर्णी, हल्दी और आँवलेका रस पिलाना चाहिये। त्रिकटु, पद्मकाष्ठ, त्रिफला, वायविडङ्ग, देवदारु तथा रास्ना—इन सबको सममात्रामें लेकर चूर्ण बना ले और खाँड मिलाकर उसे खाये। इस औषधसे अवश्य ही खाँसी दूर हो जाती है॥ ३२—३५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'ग्रहबाधाहारी मन्त्र तथा औषधका कथन' नामक तीन सौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३००॥
तीन सौ एकवाँ अध्याय
सिद्धि-गणपति आदि मन्त्र तथा सूर्यदेवकी आराधना
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! शार्ङ्गी (गकार), दण्डी (अनुस्वारयुक्त) हो, उसके साथ पद्मेश—विष्णु (ईकार) और पावक (रकार) हो तो इन चार अक्षरोंके मेलसे पिण्डीभूत बीज (ग्रीं)
* यहाँ पिप्पलीका नाम दुबारा आया है। जो द्रव्य दो बार आया हो, उसका दो भाग लिया जाता है।