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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 644, कुल 878 में से

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पृष्ठ 644
  • अध्याय ३०१ * ६१७

प्रकट होता है। यह सर्वार्थसाधक माना गया है$^१$। उपर्युक्त बीजके आदिमें क्रमशः दीर्घ स्वरोंको जोड़कर उनके द्वारा अङ्गन्यास करे। यथा—'ग्रां हृदयाय नमः। ग्रीं शिरसे स्वाहा। ग्रूं शिखायै वषट्। ग्रैं कवचाय हुम्। ग्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ग्रः अस्त्राय फट्।' ('ग' इस एकाक्षर बीजसे भी इसी प्रकार न्यास करना चाहिये। उसमें दीर्घ स्वर जोड़नेपर क्रमशः 'गां गीं गूं गैं गौं गः'—ये छः बीज बनेंगे।) अन्त (विसर्ग), विष (म्)—इनसे युक्त खान्त (ग)-का उच्चारण किया जाय। ऐसा करनेसे 'गं', 'गः'—ये दो बीज प्रकट हुए। औकार और बिन्दुसे युक्त 'गौं' तीसरा बीज है। बिन्दु और कला दोनोंसे युक्त 'गंः'—यह चौथा बीज और केवल गकार पाँचवाँ बीज है$^२$ इस प्रकार विघ्नराज गणपतिके ये पाँच बीज हैं, जिनके पृथक्-पृथक् फल देखे गये हैं॥ १-३॥

गणेशसम्बन्धी मन्त्रोंके लिये सामान्य पञ्चाङ्गन्यास 'गणंजयाय स्वाहा हृदयाय नमः। एकदंष्ट्राय हुं फट् शिरसे स्वाहा। अचलकर्णिने नमो नमः शिखायै वषट्। गजवक्त्राय नमो नमः कवचाय हुम्। महोदरहस्ताय$^३$ चण्डाय हुं फट्, अस्त्राय फट्।' यह सर्वसामान्य पञ्चाङ्ग है। उक्त एकाक्षर बीज-मन्त्रके एक लाख जपसे सिद्धि प्राप्त होती है॥ ४-५॥

अष्टदल कमल बनाकर उसके दिग्वर्ती दलोंमें गणेशजीके चार विग्रहोंका पूजन करे। इसी प्रकार वहाँ क्रमशः पाँच अङ्गोंकी भी पूजा करनी चाहिये। विग्रहोंके पूजन-सम्बन्धी मन्त्र इस प्रकार हैं—१-गणाधिपतये नमः। २-गणेश्वराय नमः ३-गणनायकाय नमः। ४-गणक्रीडाय नमः। (हृदयादि चार अङ्गोंकी तो कोणवर्ती चार दलोंमें और अस्त्रकी मध्यमें पूजा करे।) 'वक्रतुण्डाय नमः। एकदंष्ट्राय नमः। महोदराय नमः। गजवक्त्राय नमः। लम्बोदराय नमः। विकटाय नमः। विघ्नराजाय नमः। धूम्रवर्णाय नमः।'—इन आठ मूर्तियोंकी कमलचक्रके दिग्वर्ती तथा कोणवर्ती दलोंमें पूजा करे। फिर इन्द्रादि लोकपालों तथा उनके अस्त्रोंकी अर्चना करे। मुद्रा-प्रदर्शनद्वारा पूजन अभीष्ट है। मध्यमा तथा तर्जनीके मध्यमें अँगूठेको डालकर मुट्ठी बाँध लेना—यह गणेशजीके लिये मुद्रा है। उनका ध्यान इस प्रकार करे—'भगवान् गणेशके चार भुजाएँ हैं। वे एक हाथमें मोदक लिये हुए हैं और शेष तीन हाथोंमें दण्ड, पाश एवं अंकुशसे सुशोभित हैं। दाँतोंमें उन्होंने भक्ष्य-पदार्थ लड्डुको दबा रखा है और उनकी अङ्गकान्ति लाल है। वे कमल, पाश और अङ्कुशसे घिरे हुए हैं॥ ६-१०॥

गणेशजीकी नित्य पूजा करे, किंतु चतुर्थीको विशेषरूपसे पूजाका आयोजन करे। सफेद आककी जड़से उनकी प्रतिमा बनाकर पूजा करे। उनके लिये तिलकी आहुति देनेपर सम्पूर्ण मनोरथोंकी


१. 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र'में इस मन्त्रका उद्धार इस प्रकार मिलता है—

बिन्दुवामाक्ष्यग्नियुता स्मृतिर्माया सुमध्यगा। त्र्यक्षरः सिद्धिगणपः सर्वसिद्धिप्रदायकः॥

'स्मृतिर्गकारः। अग्नी रेफः। वामाक्षि ईकारः। बिन्दुरनुस्वारः। एतैः पिण्डितं बीजम् 'ग्रीम्' इति मायाबीजद्वयस्य मध्ये स्थापितं सत् त्र्यक्षरं भवेत्। ह्रीं ग्रीं ह्रीमिति।'

इसके अनुसार इस 'ग्रीं' बीजको आदि-अन्तमें 'ह्रीं' बीजसे सम्पुटित कर दिया जाय तो यह 'त्र्यक्षर मन्त्र' हो जाता है। अग्निपुराणमें इसके एकाक्षररूपको ही लिया है। यह एकाक्षर या त्र्यक्षर बीजमन्त्र 'सिद्धिगणपति'के नामसे प्रसिद्ध है और साधकोंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। कहीं-कहीं—'शार्ङ्गी प्रीतियुतः प्रोक्तो गणेशस्यैकवर्णकः' ऐसा पाठ देखा जाता है। इसके अनुसार शार्ङ्गी—गकारको प्रीति—अनुस्वारसे युक्त कर दिया जाय तो 'गं' एक अक्षरका गणेश-बीज बनता है।

२. 'नारायणीय तन्त्र'में यही बात इस प्रकार कही गयी है—

खान्तं सान्तविषं सबिन्दुसकलं बिन्द्वौयुतं केवलं। पञ्चैतानि पृथक् फलं विदधते बीजानि विघ्नेशितुः॥

३. 'शारदातिलक' और 'श्रीविद्यार्णव-तन्त्र'में ऐसा ही उल्लेख है। वहाँ 'महोदरहस्ताय'के स्थानमें 'महोदराय' है।