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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 660, कुल 878 में से

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पृष्ठ 660

* अध्याय ३०८ * ६३३


पूर्वोक्त उपासनाके समय द्रोणपुष्प, कमल और बिल्वपत्रको सिरपर धारण न करे। पञ्चमी और सप्तमीके दिन क्रमशः लवण और आँवलेका परित्याग कर दे। साधक खीरका भोजन करके श्रीसूक्तका जप करे तथा श्रीसूक्तसे ही श्रीदेवीका अभिषेक करे। आवाहनसे लेकर विसर्जनपर्यन्त सभी उपचार-अर्पण श्रीसूक्तकी ऋचाओंसे करता हुआ ध्यानपूर्वक श्रीदेवीका पूजन करे। बिल्व, घृत, कमल और खीर—ये वस्तुएँ एक साथ या अलग-अलग भी श्रीदेवीके निमित्त होममें उपयुक्त हैं। यह होम लक्ष्मीकी प्राप्ति एवं वृद्धि करनेवाला है॥ १५-१७॥

विषं (म), हि, मज्जा (ष), काल (म), अग्नि (र), अत्रि (द), निष्ठ (इ), नि, स्वाहा (मर्दिषमर्दिनि स्वाहा)—यह भगवती महिषमर्दिनी (महालक्ष्मी)-का अष्टाक्षर-मन्त्र कहा गया है॥ १८॥

ॐ ह्रीं महामहिषमर्दिनि स्वाहा।’—यह मूलमन्त्र है। इसका पञ्चाङ्गन्यास इस प्रकार करे—‘महिषमर्दिनि हुं फट्, हृदयाय नमः। महिषशत्रूत्सादिनि हुं फट्, शिरसे स्वाहा। महिषं भीषय हुं फट्, शिखायै वषट्। महिषं हन हन देवि हुं फट्, कवचाय हुम्। महिषसूदनि हुं फट्, अस्त्राय फट्।

यह अङ्गोंसहित ‘दुर्गाहृदय’ कहा गया है, जो सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है। दुर्गादेवीका निम्नाङ्कित प्रकारसे पीठ एवं अष्टदल-कमलपर पूजन करे॥ १९-२०॥

ॐ ह्रीं दुर्गे दुर्गे रक्षिणि स्वाहा’—यह दुर्गाका मन्त्र है। अष्टदलपद्मपर दुर्गा, वरवर्णिनी, आर्या, कनकप्रभा, कृत्तिका, अभयप्रदा, कन्यका और सुरूपा—इन शक्तियोंके क्रमशः आदिके सस्वर अक्षरोंमें बिन्दु लगाकर उन्हीं बीजमन्त्रोंसे युक्त नाममन्त्रोंद्वारा यजन करे। यथा—‘दुं दुर्गायै नमः’ इत्यादि। इनके साथ क्रमशः चक्र, शङ्ख, गदा, खड्ग, बाण, धनुष, अङ्कुश और खेट—इन अस्त्रोंकी भी अर्चना करे। अष्टमी आदि तिथियोंपर लोकेश्वरी दुर्गाकी पूजा करे। दुर्गाकी यह उपासना पूर्ण आयु, लक्ष्मी, (आत्मरक्षा) एवं युद्धमें विजय प्रदान करनेवाली है। साध्यके नामसे युक्त मन्त्रसे तिलका होम ‘वशीकरण’ करनेवाला है। कमलोंके हवनसे ‘विजय’ प्राप्त होती है। शान्तिकी कामना करनेवाला दूर्वासे हवन करे। पलाश-समिधाओंसे पुष्टि, काकपक्षाके हवनसे मारण एवं विद्वेषणकर्म सिद्ध होते हैं। यह मन्त्र सभी प्रकारकी ग्रहबाधा एवं भयका हरण करता है॥ २१—२६॥

ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षिणि स्वाहा’—यह अङ्गसहित ‘जय दुर्गा’ बतलायी गयी है। यह साधककी रक्षा करती है। ‘मैं श्यामाङ्गी, त्रिनेत्रभूषिता, चतुर्भुजा, शङ्ख, चक्र, शूल एवं खड्गधारिणी रौद्ररूपिणी रणचण्डीस्वरूपा हूँ’—ऐसा ध्यान करे। युद्धके प्रारम्भमें इस ‘जयदुर्गा’का जप करे। विजयके लिये खड्ग आदिपर दुर्गाका पूजन करे॥ २७—२९॥

ॐ नमो भगवति ज्वालामालिनि गृध्रगणपरिवृते चराचररक्षिणि स्वाहा’—युद्धके निमित्त इस मन्त्रका जप करे। इससे योद्धा शत्रुओंपर विजय प्राप्त करता है॥ ३०-३१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘लक्ष्मी आदिकी पूजाका वर्णन’ नामक तीन सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०८॥