अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 661, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें६३४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
तीन सौ नवाँ अध्याय
त्वरिता-पूजा
**अग्निदेव कहते हैं—**मुने! त्वरिता-विद्याका ज्ञान भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है; अतः अब उसीका वर्णन करूँगा। पहले ‘ॐ आधारशक्त्यै नमः।’— इस मन्त्रसे आधारशक्तिका स्मरण और वन्दन करे। फिर महासिंहस्वरूप सिंहासनकी ‘ॐ प्रों पुरु पुरु महासिंहाय नमः।’— इस मन्त्रसे और आसनस्वरूप कमलकी ‘पद्माय नमः।’— इस मन्त्रसे पूजा करे। तदनन्तर मूलमन्त्रका उच्चारण करके त्वरितादेवीकी पूजा करे। यथा— ‘ॐ ह्रीं हुं खे च च्छे क्षः स्त्रीं हूं क्षैं ह्रीं फट्² त्वरितायै नमः। इसका अङ्ग-न्यास इस प्रकार है—खे च हृदयाय नमः। च च्छे शिरसे नमः (शिरसे स्वाहा)। छे क्षः शिखायै नमः (शिखायै वषट्)। क्षः स्त्री कवचाय नमः (कवचाय हुम्)। स्त्रीं हूं नेत्राय (नेत्रत्रयाय) नमः (वौषट्)। हूं क्षैं अस्त्राय नमः (अस्त्राय फट्)॥ १-२॥
[इसी प्रकार करन्यास करके निम्नाङ्कित गायत्रीका जप करे—]
‘ॐ त्वरिताविद्यां विद्महे। तूर्णविद्यां च धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्।’— यह ‘त्वरिता-गायत्री मन्त्र’ है।
तदनन्तर पीठगत कमल-कर्णिकाके केस्रोंमें पूर्वादि क्रमसे अङ्ग-देवताओंका पूजन करे। यथा—
‘खे च हृदयाय नमः (पूर्वे)। च च्छे शिरसे नमः (अग्निकोण)। छे क्षः शिखायै नमः (दक्षिणे)। क्षः स्त्री कवचाय नमः (नैर्ऋत्ये)। स्त्रीं हूं नेत्रत्रयाय नमः (पश्चिमे)। हूं क्षे अस्त्राय नमः (वायव्ये)।' तत्पश्चात् उत्तरदिशामें 'श्रीप्रणीतायै नमः'— इस मन्त्रसे श्रीप्रणीताका तथा ईशानकोणमें 'श्रीगायत्र्यै नमः' से गायत्रीका पूजन करे॥ ३ $\frac{१}{२}$ ॥
तदनन्तर बाह्यगत तीन गोलाकार रेखाओंके
१. ‘क्षुं हुं हं वज्रदेह पुरु पुरु क्षिं क्षिं गर्ज गर्ज हं हुं क्षां पञ्चाननाय नमः।’—यह पीठमन्त्र है। इससे देवीको आसन देना और आसनकी पूजा करनी चाहिये। (शा० ति० १० पटल)
२. त्वरिता-मन्त्रका विनियोग 'शारदातिलक' दशमपटलमें इस प्रकार बताया गया है—'ॐ अस्य श्रीत्वरिताद्वादशाक्षरमन्त्रस्यार्जुनऋषिर्विराट् छन्दः, त्वरिता देवता प्रणवो बीजं (केषांचिन्मते हुं बीजम्), ह्रीं शक्तिः (क्षें कीलकम्) समस्तपुरुषार्थफलप्राप्तये जपे विनियोगः।' 'श्रीविद्यार्णव' में एक जगह 'ईश' को और दूसरी जगह 'सौरि' को ऋषि कहा है। वहाँ 'हुं' शक्ति, 'स्त्रीं' बीज और 'क्षें' कीलक बताया है।
ध्यान
श्यामां बर्हिकलापशेखरयुतामाबद्धपर्णांशुकां गुञ्जाहारलसत्पयोधरभरामष्टाहिपान् बिभ्रतीम्।
ताटङ्काङ्गदमेखलागुणरणन्मञ्जीरतां प्रापितान् कैरातों वरदाभयोद्यतकरां देवीं त्रिनेत्रां भजे॥
[भगवान् शंकर और भगवती पार्वती अर्जुनपर कृपा करनेके लिये किरात और किरातीके वेषमें उनके समक्ष प्रकट हुए थे, उस रूपमें देवी पार्वती बहुत शीघ्र भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करती या करनेके लिये त्वरायुक्त (उतावली) रहती हैं, इसलिये इन्हें 'त्वरिता' की संज्ञा दी गयी है। उन्हींका ध्यान किया गया है। उसका अर्थ यों है—]
'मैं किरातीके वेषमें प्रकट हुई त्रिनेत्रधारिणी देवी पार्वतीका भजन (चिन्तन) करता हूँ। उनकी अङ्गकान्ति श्यामा है तथा अवस्थामें भी वे श्यामा (सोलह वर्षकी तरुणी) हैं। मोरपंखका मुकुट एवं वलय धारण करती हैं। कोमल पल्लवोंको जोड़कर बनाये हुए वस्त्रसे उनका कटिप्रदेश सुशोभित है। उनके पीन पयोधर गुञ्जाओंके हारसे विलसित हैं। आठ अहीश्वरोंको वे आभूषणोंके रूपमें धारण करती हैं; उनमेंसे दो कानोंके ताटङ्क बने हैं, दो भुजाओंमें बाजूबंदकी आवश्यकता पूरी करते हैं, दो कमरमें करधनीकी लड़ोंका काम देते हैं और दो पैरोंके खनखनाते मञ्जीर बन गये हैं। इस अनुपम वेषभूषासे विभासित त्वरितादेवीके उठे हुए हाथ वरद और अभयकी मुद्रासे मनोरम प्रतीत होते हैं।'
ऋष्यादिन्यास—'अर्जुनाय (सौरये ईशाय वा) ऋषये नमः, शिरसि। विराट्छन्दसे नमः, मुखे। त्वरितानित्यादेवतायै नमः, हृदि। ॐ बीजाय नमः, गुह्ये। ह्रीं (अथवा हुम्) शक्तये नमः, पादयोः। क्षें कीलकाय नमः, नाभौ।'