अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६३८ * अग्निपुराण *
कहे गये हैं। सातवाँ और आठवाँ कवच-मन्त्र हैं, नवाँ और आधा अक्षर तारक (फट्) है। यही नेत्र कहा गया है। (प्रयोग - ॐ हूं हृदयाय नमः। खे च्छे शिरसे स्वाहा। क्षः स्त्री शिखायै वषट्। क्षे हुम् कवचाय हुम्। फट् नेत्रत्रयाय वौषट्।) ॥ २१-२२ ॥
‘तोतले वज्रतुण्डे ख ख हूं’— इन दस अक्षरोंसे युक्त ‘वज्रतुण्डिका’ नामक ‘इन्द्रदूतिका विद्या’ है। ‘खेचरि ज्वालिनि ज्वाले ख ख’— इन दस अक्षरोंसे युक्त ‘ज्वालिनी विद्या’ है। ‘वर्चे शरविभीषणि (अथवा शवरि भीषणि) ख खे’— यह दशाक्षरा ‘शबरी विद्या’ है। ‘छे छेदनि करालिनि ख ख’— यह दशाक्षरा ‘कराली विद्या’ है। ‘क्षः श्रव द्रव प्लवङ्गि ख खे’— यह दशाक्षर ‘प्लवङ्गदूती विद्या’ है। ‘स्त्रीबलं कलिधुननि शासी’— यह दशाक्षरा ‘श्वसनवेगिका विद्या’ है। ‘क्षे पक्षे कपिले हंस’— यह दशाक्षरा ‘कपिलादूतिका विद्या’ है। ‘हूं तेजोवति रौद्रि मातङ्गि’— यह दशाक्षरा ‘रौद्री’ दूतिका है ‘पुटे पुटे ख ख खड्गे फट्’— यह दशाक्षरा ‘ब्रह्मदूतिका विद्या’ है। ‘वैताली’ में उक्त सभी मन्त्र दशाक्षर होते हैं। अन्य विस्तारकी बातें पुआलकी भाँति सारहीन हैं। उन्हें छोड़ देना चाहिये। न्यास आदिमें हृदयादि अङ्गोंका उपयोग है। नेत्रका सुधी पुरुष मध्यमें न्यास करे॥ २३–२८॥
पैरसे लेकर मस्तकतक तथा मस्तकसे लेकर पैरोंतक चरण, जानु, ऊरु, गुह्य, नाभि, हृदय तथा कण्ठदेशसे मुखमण्डलपर्यन्त ऊपर-नीचे आदिबीजसे निर्गत सोमरूप ‘अकार’, जो अमृतकी धारा एवं सुवाससे परिपूर्ण है, ब्रह्मरन्ध्रसे मुझमें प्रवेश कर रहा है, ऐसा साधक चिन्तन करे। मन्त्रोपासक मूर्धा, मुख, कण्ठ, हृदय, नाभि, गुह्य, ऊरु, जानु और पैरोंमें तथा तर्जनी आदिमें आदिबीजका बारंबार न्यास करे। ऊपर अमृतमय सोम है, नीचे बीजाक्षररूप शरीर-कमल है। इस गूढ़ रहस्यको जो जानता है, उसकी मृत्यु नहीं होती है। इस मन्त्रके जपसे रोग-व्याधिका अभाव हो जाता है। न्यास और ध्यानपूर्वक त्वरितादेवीका पूजन और उनके मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे*॥ २९–३३॥
अब मैं ‘प्रणीता’ आदि मुद्राओंका वर्णन
* ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ में त्वरिता-नित्याका प्रयोग संक्षेपसे इस प्रकार उपलब्ध होता है— अन्यत्र कथित आसनादि योगपीठन्यासान्त कर्म करके त्वरिता-विद्याद्वारा तीन प्राणायाम करके निम्नाङ्कित रूपसे विनियोग करे—‘अस्य त्वरितमन्त्रस्य सौरिऋषिर्विराट्छन्दः त्वरिता नित्या देवता स्त्री कवचम्। ॐ बीजं हुं शक्तिः क्षे कीलकम् ममाभीष्टसिद्धये जपे विनियोगः।’ इसका न्यासवाक्य इस प्रकार है—‘सौरये ऋषये नमः शिरसि। विराट्छन्दसे नमः मुखे। त्वरितानित्यादेवतायै नमः हृदि। ॐ बीजाय नमः गुह्ये। हुं शक्तये नमः पादयोः। क्षे कीलकाय नमः नाभौ।’ अग्निपुराणमें दशाक्षरा ‘तोतला-त्वरिता’का मन्त्र है। परंतु ‘श्रीविद्यार्णव’ में द्वादशाक्षरा त्वरिता-विद्या बतायी गयी है। यथा—‘ॐ ह्रीं हुं खे च छे क्षः स्त्री हुं क्षे ह्रीं फट्।’ आदिके तीन और अन्तके दो अक्षर छोड़कर जो शेष सात अक्षर बचते हैं, उन्हींसे दो-दो अक्षर जोड़ते हुए न्यास करे। यथा—‘ॐ खे च हृदयाय नमः। च छे शिरसे स्वाहा। छे क्षः शिखायै वषट्। क्षः स्त्री कवचाय हुम्। स्त्री हुं नेत्रत्रयाय वौषट्। हुं क्षे अस्त्राय फट्।’ इसी तरह करन्यास भी करे। तत्पश्चात्—‘शिरसि—ह्रीं ॐ ह्रीं नमः।’ ललाटे—ह्रीं हुं ह्रीं नमः। कण्ठे—ह्रीं खे ह्रीं नमः। हृदि—ह्रीं च ह्रीं नमः। नाभौ—ह्रीं छे ह्रीं नमः। मूलाधारे—ह्रीं क्षः ह्रीं नमः। ऊरुद्वये—ह्रीं स्त्री ह्रीं नमः। जानुद्वये—ह्रीं हुं ह्रीं नमः। जङ्घाद्वये—ह्रीं क्षे ह्रीं नमः। पादद्वये—ह्रीं फट् ह्रीं नमः।’ इस प्रकार ‘ह्रीं’ बीजसे सम्पुटित अक्षरोंका न्यास करके समस्त विद्या (द्वादशाक्षरविद्या) द्वारा व्यापकन्यास करे। तदनन्तर ध्यानादि मानसपूजनान्त कर्म करके स्वर्णादि पट्टपर कुङ्कुम आदिद्वारा पश्चिमादि द्वारोंसे युक्त दो चतुरस्र रेखा बनाकर, उसके भीतर दो वृत्त बनाकर उसमें अष्टदलकमल अङ्कित करे। फिर पूर्ववत् आत्मपूजान्त कर्म करके भुवनेश्वरीपीठकी अर्चनाके बाद मूलविद्यासे मूर्तिनिर्माण कर आवाहनादि पुष्पोपचार अर्पित करे। कर्णिकामें षडङ्ग, गुरुपङ्क्तित्रयकी पूजाके बाद बाहरकी वृत्तत्रयान्तररालगत्त दो वीथियोंमें देवीके अग्रवर्ती दलके अग्रभागमें फटकायिका, बाह्यवीथी—देवीके अग्रभागमें हीं किंकराका, द्वारपार्श्वमें जया-विजयाका, आठ दलोंमें क्रमशः हुंकारी, खेचरी, चण्डा, छेदिनी, क्षेपिणी, स्त्रीकारी, हुंकारी एवं क्षेमकारीकी पूजा करे। फिर पूर्ववत् लोकपालादिकोंकी पूजा करके पूजा समाप्त करे।