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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 666, कुल 878 में से

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पृष्ठ 666
  • अध्याय ३११ * ६३९

करूँगा। 'प्रणीता' मुद्राएँ पाँच प्रकारकी मानी गयी हैं—'प्रणीता', 'सबीजा प्रणीता', 'भेदनी', 'कराली' और 'वज्रतुण्डा'। दोनों हाथोंको परस्पर ग्रथित करके बीचमें अँगूठोंको डाल दे और तर्जनीको ऊपर लगाये रखे, इसका नाम 'प्रणीता' है। इसे हृदयदेशमें लगाये। इसी मुद्रामें कनिष्ठिका अँगुलीको ऊपरकी ओर उठाकर मध्यमें रखे तो वह द्विजोँद्वारा 'सबीजा' के नामसे मानी जाती है। यदि तर्जनीके बीचमें अनामिकाको परस्पर संलग्न करके अङ्गुष्ठके अग्रभागको मध्यभागमें रखे तो वह 'भेदनी' मुद्रा कही गयी है। उस मुद्राको नाभिदेशमें निबद्ध करके अङ्गुष्ठका जल छिड़के। उसीको मन्त्रसाधकके हृदयमें योजित करनेपर 'कराली' नामक महामुद्रा होती है। फिर पूर्ववत् ब्रह्मलग्ना ज्येष्ठाको ऊपर उठाये तो वह 'वज्रतुण्डा मुद्रा' होती है। उसको वज्रदेशमें आबद्ध करे। दोनों हाथोंसे मणिबन्ध (कलाई)-को बाँधे और तीन-तीन अँगुलियोंको फैलाये रखे, इसे 'वज्रमुद्रा' कहते हैं। दण्ड, खड्ग, चक्र और गदा आदि मुद्राएँ उनकी आकृतिके अनुसार बतायी गयी हैं। अङ्गुष्ठसे तीन अँगुलियोंको आक्रान्त करे, वे तीनों ऊर्ध्वमुख हों तो 'त्रिशूलमुद्रा' होती है। एकमात्र मध्यमा अँगुली ऊपरकी ओर उठी रहे तो 'शक्तिमुद्रा' सम्पादित होती है। बाण, वरद, धनुष, पाश, भार, घण्टा, शङ्ख, अङ्कुश, अभय और पद्म—ये (प्रणीतासे लेकर पद्मतक कुल) अट्ठाईस मुद्राएँ कही गयी हैं। ग्रहणी, मोक्षणी, ज्वालिनी, अमृता और अभया—ये पाँच 'प्रणीता' नामवाली मुद्राएँ हैं। इनका पूजन और होममें उपयोग करना चाहिये॥ ३४—३७॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'त्वरितामन्त्र तथा मुद्रा आदिका वर्णन' नामक तीन सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१०॥


तीन सौ ग्यारहवाँ अध्याय

त्वरिता-मन्त्रके दीक्षा-ग्रहणकी विधि

अग्निदेव कहते हैं— मुने! अब सिंहासनपर स्थित वज्रसे व्याप्त कमलमें मन्त्र-न्यासपूर्वक दीक्षा आदिका विधान बताऊँगा॥ १॥

'हे हे हुति वज्रदन्त पुरु पुरु लुलु गर्ज गर्ज इह सिंहासनाय नमः*।' यह सिंहासनके पूजनका मन्त्र है। चार रेखा खड़ी और चार रेखा तिरछी या (पड़ी) खींचे। इस प्रकार नौ भागोंके विभाग करके विद्वान् पुरुष नौ कोष्ठ बनाये। प्रत्येक दिशाके कोष्ठ तो रख ले और कोणवर्ती कोष्ठ मिटा दे। अब बाह्य दिशामें जो कोष्ठ बच जाते हैं, उनके कोणोंतक जो रेखाएँ आयी हैं, उनकी संख्याएँ आठ कही गयी हैं। बाह्यकोष्ठके बाह्य-भागमें ठीक बीचों-बीचमें वज्रका मध्यवर्ती शृङ्ग होता है। बाह्यरेखाके दो भाग करनेपर जो रेखार्द्ध बनता है, उतना ही बड़ा शृङ्ग होना चाहिये। बाहरी रेखा टेढ़ी होनी चाहिये। विद्वान् पुरुष उसे द्विभङ्गी बनाये। मध्यवर्ती कोष्ठको कमलकी आकृतिमें परिणत करे। वह पीले रंगकी कर्णिकासे सुशोभित हो। काले रंगके चूर्णसे कुलिशचक्र बनाकर उसके ऊपरी सिरे या शृङ्गकी आकृति खड्गाकार बनाये। चक्रके बाह्यभागमें चौकोर (भूपुर-चक्र) लिखे, जो वज्रसम्पुटसे चिह्नित हो। भूपुरके द्वारपर मन्त्रोपासक चार वज्रसम्पुट दिलाये। पद्म और वामवीथी सम होनी चाहिये।


* पूनासे प्रकाशित 'अग्निपुराण' के प्राचीन और नवीन संस्करणोंमें 'सिंहासन-मन्त्र' का पाठ इस प्रकार मिलता है—'तु तु हेति वजदेति पुरु पुरु लुलु गर्ज गर्ज ह ह सिंहाय नमः।'