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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 672, कुल 878 में से

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पृष्ठ 672
  • अध्याय ३१३ * ६४५

हुए युद्धमें जानेवाले पुरुषको प्रत्यक्ष विजय प्राप्त होती है॥ १५-१६॥

श्रीमन्त्र

‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रियै नमः’ ॥ १७॥

चतुर्दल कमलमें उत्तरादि दलके क्रमसे क्रमशः घृणिनी, सूर्या, आदित्या और प्रभावती—इन चार श्रीदेवियोंका उक्त मन्त्रसे पूजन करके मन्त्र जपनेसे श्रीकी प्राप्ति होती है। ये सभी श्रीदेवियाँ सुवर्णगिरिके समान परम सुन्दर कान्तिवाली हैं॥ १८॥

गौरीमन्त्र

‘ॐ ह्रीं गौर्यै नमः।’

—इस मन्त्रद्वारा जप, होम, ध्यान तथा पूजन किया जाय तो यह साधकको सब कुछ प्रदान करनेवाला है। गौरीदेवीकी अङ्गकान्ति अरुणाभ गौर है। उनके चार भुजाएँ हैं। वे दाहिने दो हाथोंमें पाश तथा वरदमुद्रा धारण करती हैं और बायें दो हाथोंमें अङ्कुश एवं अभय। शुद्ध चित्तसे गौरीदेवीकी प्रार्थना (आराधना) करनेवाला बुद्धिमान् पुरुष सौ वर्षोंतक जीवित रहता है तथा उसे चोर आदिका भय नहीं प्राप्त होता है। युद्धस्थलमें इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलको पी लेनेसे अपने ऊपर क्रोधसे भरा हुआ पुरुष भी प्रसन्न हो जाता है। इस मन्त्रसे अञ्जन और तिलक लगानेपर वशीकरण सिद्ध होता है तथा जिह्वाग्रपर इसके लेखसे (अथवा जपसे भी) कवित्व-शक्ति प्रस्फुटित होती है। इसके जपसे स्त्री-पुरुषके जोड़े वशमें हो जाते हैं। इसके जपसे सूक्ष्म योनियोंके भी दर्शन होते हैं। स्पर्श करनेमात्रसे मनुष्य वशमें हो जाता है। इस मन्त्रद्वारा तिलकी आहुति देनेपर सारे मनोरथ सिद्ध होते हैं। इस मन्त्रसे सात बार अभिमन्त्रित करके अन्नका भोजन करनेवाले पुरुषके पास सदा श्री(धन-सम्पत्ति) बनी रहती है। इसके आदिमें लक्ष्मी-बीज (श्रीं) और वैष्णव-बीज (क्लीं) जोड़ दिया जाय तो यह ‘अर्धनारीश्वर-मन्त्र’ हो जाता है। अनङ्गरूपा, मदनातुरा, पवनवेगा, भुवनपाला, सर्वसिद्धिदा, अनङ्गमदना और अनङ्गमेखला—ये शक्तियाँ हैं। इनके नाममन्त्रोंके जपसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। कमलके दलोंमें ह्रीं, स्वर, कादि व्यञ्जन लिखकर बीचमें अभीष्ट स्त्रीका नाम लिखे। षट्कोण-चक्र या कलशमें भी लिख सकते हैं। लिखकर उसके उद्देश्यसे जप करनेपर ‘वशीकरण’ होता है॥ १९—२६॥

नित्यक्लिन्ना-मन्त्र

‘ॐ ह्रीं ऐं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा।*’

[किसी-किसीने इस मन्त्रको पञ्चदशाक्षर भी माना है। उस दशामें ‘स्वाहा’ से पहले ‘ऐं ह्रीं’ जोड़ा जाता है।] यह छः अङ्गोंवाला मूलमन्त्र है (तीन बीज और तीन पद मिलाकर छः अङ्ग होते हैं)। लाल रंगके त्रिकोण-चक्रमें अष्टदल कमलका चिन्तन करके उसमें ‘द्राविणी’ आदिका पूजन करे। पूर्वादि दिशाओंमें ‘द्राविणी’ आदि चार शक्तियों तथा ईशानादि कोणोंमें ‘अपरा’ आदि चार शक्तियोंका चिन्तन-पूजन करना चाहिये। उनके क्रमानुसार नाम यों जानने चाहिये—द्राविणी, वामा, ज्येष्ठा, आह्लादकारिणी, अपरा, क्षोभिणी, रौद्री तथा गुणशक्ति। देवीका ध्यान इस प्रकार करे—‘वे रक्तवर्णा हैं और उसी रंगके वस्त्राभूषण धारण करती हैं। उनके दो हाथोंमें पाश और अङ्कुश है, दो हाथोंमें कपाल तथा कल्पवृक्ष हैं तथा दो हाथोंसे उन्होंने वीणा ले रखी है।’ नित्या, अभया, मङ्गला, नववीरा, सुमङ्गला, दुर्भगा और


* अग्निपुराणकी छपी प्रतियोंमें ‘ॐ ह्रीं छं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे ओं ओं’—ऐसा पाठ मिलता है; परंतु अन्य तन्त्रोंमें ‘छं’ की जगह ‘ऐं’ मिलता है। उद्धारस्थलमें ‘वाग्भवं’ कहा गया है, जो ‘ऐं’ का ही वाचक है और अन्तमें अग्निवधू (स्वाहा)-का ही उल्लेख है; अतः वही रूप लिया गया है।