अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 673, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें६४६ * अग्निपुराण *
मनोन्मनी तथा द्रावा—इन आठ देवियोंका पूर्वादि दिशाके कमल-दलोंमें पूजन करे। [‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ में ये नाम इस प्रकार मिलते हैं—नित्या, सुभद्रा, समझला, वनचारिणी, सुभगा, दुर्भगा, मनोन्मनी तथा रुद्ररूपिणी।] इनके बाह्यभागमें पाँच दलोंमें कामदेवोंका पूजन होता है। ‘ॐ ह्रीं अनङ्गाय नमः। ॐ ह्रीं स्मराय नमः। ॐ ह्रीं मन्मथाय नमः। ॐ ह्रीं माराय नमः। ॐ ह्रीं कामाय नमः।’ ये ही पाँच काम हैं। कामदेवोंके हाथोंमें पाश, अङ्कुश, धनुष और बाणका चिन्तन करे। इनके भी बाह्यभागमें दस दलोंमें क्रमशः रति-विरति, प्रीति-विप्रीति, मति-दुर्मति, धृति-विधृति, तुष्टि-वितुष्टि—इन पाँच कामवल्लभाओंका पूजन करे॥ २७—३३॥
‘ॐ छं (एं) नित्यक्लिन्ने मदद्रवे ओं ओं (स्वाहा) अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ लृ लॄ ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह क्षः ॐ छं (एं) नित्यक्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा।’ यह ‘नित्यक्लिन्ना-विद्या’ है॥ ३४॥
सिंहासनपर आधारशक्ति तथा पद्मका पूजन करके उसके दलोंमें हृदय आदि अङ्गोंकी स्थापना एवं पूजन करनेके अनन्तर मध्यकर्णिकामें देवीकी पूजा करनी चाहिये॥ ३५॥
गौरीमन्त्र (२) ‘ॐ ह्रीं गौरि रुद्रदयिते योगेश्वरि हूं फट् स्वाहा’ ॥ ३६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘नाना प्रकारके मन्त्रोंका वर्णन’ नामक तीन सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१३॥
तीन सौ चौदहवाँ अध्याय
त्वरिताके पूजन तथा प्रयोगका विज्ञान
निग्रहयन्त्र अग्निदेव कहते हैं—मुने! ‘ॐ ह्रीं हूं खे च च्छे क्षः स्त्रीं हूं क्षे ह्रीं फट् त्वरितायै नमः।’— इस मन्त्रसे न्यासपूर्वक त्वरितादेवीकी पूजा करे। उनके द्विभुज या अष्टभुज रूपका ध्यान करे। आधारशक्ति तथा अष्टदल कमलका पूजन करे। सिंहासन और उसके ऊपर विराजित त्वरितादेवीकी तथा उनके चारों ओर हृदयादि अङ्गोंकी पूजा करे*। पूर्वादि दिशाओंमें हृदयादि अङ्गोंकी पूजा करके मण्डलमें प्रणीता तथा गायत्रीकी पूजा करे। (देवीके अग्रभागके केसरसे लेकर प्रदक्षिणक्रमसे छः केसरोंमें छः अङ्गोंका पूजन करके अवशिष्ट दोमें प्रणीता तथा गायत्रीका पूजन करना चाहिये।) इसके बाद आठ दलोंमें हुंकारी, खेचरी, चण्डा, छेदिनी, क्षेपिणी, स्त्री, हुंकारी तथा क्षेमंकरीकी पूजा करे। फिर मध्यभागमें देवीके सामने फट्कारीकी अर्चना करे। देवीके सम्मुखवर्ती द्वारके दक्षिण तथा वामपार्श्वमें जया एवं विजयाकी पूजा करके
* ‘सारसंग्रह’ तथा ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ आदिमें जो मन्त्रोद्धार किया गया है, उससे उपर्युक्त द्वादशाक्षर-बीज ही ‘त्वरिता-विद्याके नामसे प्रसिद्ध होते हैं। अग्निपुराणकी आजकलकी छपी प्रतियोंमें मन्त्रका शुद्ध रूप नहीं रह गया है, अतः तन्त्रान्तरसे मिलाकर ही शुद्ध रूपका यहाँ ग्रहण किया गया है। न्यासकी विधि पहले बता चुके हैं, अतः यहाँ संकेतमात्र किया गया है। तन्त्रोंमें देवीके द्विभुज, अष्टभुज तथा अष्टादशभुज रूप भी वर्णित हुए हैं। यहाँ मूलमें द्विभुज तथा अष्टभुज रूपकी ओर संकेत है। आधारशक्ति आदिका पूजन भी पूर्ववत् समझना चाहिये। सिंहासनका मन्त्र इस प्रकार है—‘क्षं हूं हं वज्रदेहे मुरु मुरु क्षिं गुल गुल गर्ज गर्ज हं हुं क्षां पद्मासनाय नमः।’ एक-एक अक्षरका उद्धार करके यह मन्त्रस्वरूप निश्चित हुआ है, अतः इसीको शुद्ध मानकर अन्यत्रके विकृत पाठको भी शुद्ध किया जा सकता है। यहाँ कही हुई अधिकांश बातें पिछले तीन सौ नवें अध्यायमें आ गयी हैं।’