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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 675, कुल 878 में से

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पृष्ठ 675

६४८ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

यम-आनुष्टुभ-मन्त्र

यमावाटटवामाय माटमोटटमोटमा।
वामोभूरिरिभूमोवा टटरीत्वत्वरीटट॥ ११॥

यम-मन्त्रके बाह्यभागमें चारों ओर 'रं' लिखे, फिर 'रं' के नीचे 'यं' लिखे। इससे 'मारणात्मक निग्रहयन्त्र' सम्पादित होता है। नीमकी गोंद, मज्जा, रक्त तथा विषसे$^१$ मिश्रित स्याहीमें थोड़ा चिताका कोयला कूट-पीसकर मिला दे और उसे पिङ्गलवर्णकी दावातमें रखे। फिर कौएके पंखकी कलमसे उक्त 'निग्रह-यन्त्र'को लिखकर उसे श्मशानभूमिमें या चौराहेपर किसी गड्ढेमें नीचेकी ओर गाड़ दे, अथवा बाँबीकी मिट्टीमें उसे डाल दे, अथवा बहेड़ेके वृक्षकी डालीके नीचे भूमिमें गाड़ दे। ऐसा करनेसे सभी शत्रुओंका नाश हो जाता है॥ १२—१४॥

अनुग्रह-चक्र

शुक्लपक्षमें भोजपत्रपर, भूमिपर तथा दीवारपर लाक्षाके रङ्गसे, कुङ्कुमसे अथवा खड़िया मिट्टीके चन्दनसे 'अनुग्रह-चक्र'$^२$ लिखे (यह 'अनुग्रह-चक्र' पूर्वोक्त निग्रह-चक्रकी भाँति इक्यासी पदोंका होना चाहिये।) मध्यकोष्ठमें साध्य व्यक्तिका नाम लिखे। उस नामको 'ठं ठं' के मध्यमें रखे। पूर्वादिक वीथीमें 'जूं सः वषट्' का उल्लेख करे। ईशान आदि कोणसे आरम्भ करके वीथीको छोड़ते हुए अग्निकोणपर्यन्त लक्ष्मीका आनुष्टुभ-मन्त्र (जो सर्वतोभद्रबन्धमें निबद्ध है) लिखे। यह ऊपरकी चार पङ्क्तियोंमें पूरा हो जायगा। तत्पश्चात् नीचेकी चार पङ्क्तियोंमें सबसे नीचेके नैर्ऋत्यकोणस्थ कोष्ठसे आरम्भ करके दाहिनेसे बायें पार्श्वकी ओर लिखे। निचली पङ्क्तिके बाद ऊपरी पङ्क्तिमें भी बायेंसे दाहिने लिखे। इस तरह चार पङ्क्तियोंमें वही 'लक्ष्मी-मन्त्र' पूरा लिख दे। वह मन्त्र इस प्रकार है—

'श्री सा मा या या मा सा श्री, सा नो या ज्ञे ज्ञे या नो सा। मा या ली ला ला ली या मा, या ज्ञे ला ली ली ला ज्ञे या॥'

चक्रके बहिर्भागमें चारों ओर त्वरिता-मन्त्र लिखे। प्रत्येक दिशामें एक बार, इस प्रकार चार बार वह मन्त्र लिखा जायगा। फिर उस चौकोर चक्रको इस प्रकार गोल रेखासे घेर दे, जिससे वह कलशके भीतर हो जाय। उक्त कलशके नीचे एक कमल बनाकर उसीपर उस कमलको स्थापित किया हुआ दिखाये। (ऊपरकी ओर कलशके मुखकी-सी आकृति बना दे। दो वृत्ताकार रेखाओंसे कलशकी आकृति स्पष्ट करनी चाहिये। कलशके मुखपर दो आड़ी रेखाएँ खींचकर उन रेखाओंके बीचमें 'नववव'—इस प्रकारकी माला-सी बनाकर उस मालासे घटको परिपूरित दिखाये। इस प्रकार इस चक्रका मनोरथपूर्तिके लिये तन्त्र-शास्त्रोक्त रीतिसे प्रयोग करे।)॥ १५—१८॥


१. नमक, ऊसरकी मिट्टी, स्रोतका जल, गृहधूम (घरकी कालिख), चित्रक, चिताका कोयला और नीमकी गोंद—इनसे युक्त जो स्याही है, उसे 'विष' कहा गया है।
२. 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' में इस 'अनुग्रह-यन्त्र' के लेखनके विषयमें इस प्रकार कहा गया है—

कुङ्कुमैर्लाक्षया वापि लिखितं स्वर्णपट्टके। धवले वसने वापि लेखिन्या स्वर्णजातया॥
सम्पूज्य जपसंसिद्धं स्थापयेद् यत्र तत्र वै। भवेल्लक्ष्मीरतिस्फीता नीरोगाश्च प्रजास्तथा॥
गजाश्वपशवस्त्वन्ये प्राणिनः सुखिनो भृशम्। भूतप्रेतपिशाचादिपीडासु बिभृयादिदम्॥
अलक्ष्मीशान्तये वश्यसिद्धये सर्वसम्पदे।

अर्थात् 'रोली अथवा लाक्षा (महावर)-के रङ्गसे सोनेके पत्रपर या श्वेत वस्त्रपर सोनेकी ही लेखनीसे इस अनुग्रह-यन्त्रको लिखे। लिखकर इसकी पूजा करके त्वरिता-मन्त्रके जपद्वारा इसे सिद्ध कर ले। जपसिद्ध-यन्त्रको जहाँ रखा जायगा, वहाँ अत्यन्त वृद्धिशीला लक्ष्मीका वास होगा। वहाँकी समस्त प्रजाएँ नीरोग होंगी। हाथी, घोड़े तथा अन्य पशु-प्राणी अत्यन्त सुखी होंगे। भूत, प्रेत तथा पिशाच आदिकी बाधा प्राप्त होनेपर इस यन्त्रको धारण करना चाहिये। दरिद्रताकी शान्ति, वशीकरणकी सिद्धि तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंकी प्राप्तिके लिये भी इस यन्त्रको धारण करना आवश्यक है।'

अग्नि पुराण · पृष्ठ 675, कुल 878 में से · BharatKosha