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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 676, कुल 878 में से

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पृष्ठ 676
  • अध्याय ३१५ * ६४९

कमलपर स्थापित पद्मचक्र लिखकर उसे धारण किया जाय तो वह मृत्युको जीतनेवाला तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है। वह शान्तिके साधनोंमें भी परम शान्तिप्रद है। सौभाग्य आदि देनेवाला है१ ॥ १९ ॥

बारह खड़ी रेखाओंपर बारह पड़ी रेखाएँ खींचकर बराबर-बराबर एक सौ इक्कीस कोष्ठ बनावे। उसके मध्यकोष्ठमें साध्यका नाम लिखे। फिर ईशानकोणवाले कोष्ठसे आरम्भ करके प्रदक्षिणक्रमसे बारह बार त्वरिता-विद्याके अक्षर लिखे। मायाबीज (ह्रीं) को छोड़कर ही मन्त्र लिखना चाहिये। रेखाओंके अग्रभागोंपर बारंबार त्रिशूल अङ्कित करे। इस यन्त्रको जपद्वारा सिद्ध कर ले२। मध्यकोष्ठमें साध्य-नामके पहले 'ॐ' तथा अन्तमें 'हूं फट्' जोड़ दे। त्वरिता-विद्याके वर्णोंको क्रमसे ही लिखना चाहिये। अन्तमें नीचेकी ओर 'वषट्' जोड़ देना चाहिये। यह 'प्रत्यङ्गिरा-विद्या' कहलाती है, जो सम्पूर्ण मनोरथ एवं प्रयोजनको सिद्ध करनेवाली है॥ २०-२१॥

इक्यासी कोष्ठवाले चक्रमें आदिसे ही वर्णक्रमके अनुसार सम्पूर्ण चक्रोंमें त्वरिता-विद्याके अक्षर लिखे। छः बार मन्त्र लिखनेके बाद अन्तके शेष कोष्ठोंमें साध्यका नाम तथा उसके अन्तमें 'वषट्' लिखे। यह दूसरी 'प्रत्यङ्गिरा-विद्या' है, जो समस्त कार्य आदिकी सिद्धि करनेवाली है। चौंसठ कोष्ठवाले चक्रोंमें भी 'निग्रह-चक्र' और 'अनुग्रह-चक्र' लिखे। वह 'अमृती-विद्या' है। उसके मध्यकोष्ठमें 'क्रीं सा हूं' और साध्य-नाम लिखे। (पाठान्तरके अनुसार उस चक्रके मध्यभागमें साध्यका नाम तथा नामके उभय पार्श्वमें 'ह्रीं' लिखे।) उसके बाह्यभागमें द्वादशदल कमल बनाकर उसके दलोंमें त्वरिता-विद्याको विलोमक्रमसे लिखे। अर्थात् पहले 'फट्' लिखे, फिर पूर्व-पूर्वके अक्षर। फिर उसे ह्रींकारयुक्त तीन वृत्ताकार पङ्क्तियोंसे वेष्टित करे। कुम्भाकार यन्त्रके भीतर लिखित इस विद्याको धारण किया जाय तो यह समस्त शत्रुओंका नाश करनेवाली और सब कुछ देनेवाली होती है। यदि रोगीके कानमें इसका जप किया जाय तो सर्पादि विष भी शान्त हो जाते हैं। यदि इसके अक्षरोंसे अङ्कित (अथवा इस यन्त्रसे अङ्कित) डंडोंद्वारा इसके शरीरपर ठोंका जाय तो उससे भी विषका शमन हो जाता है॥ २२-२५॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'त्वरिता-मन्त्रके प्रयोगोंका वर्णन' नामक तीन सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१४॥


तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय

स्तम्भन आदिके मन्त्रोंका कथन

**अग्निदेव कहते हैं—**मुने! अब मैं स्तम्भन, मोहन, वशीकरण, विद्वेषण तथा उच्चाटनके प्रयोग बताता हूँ। विषव्याधि, आरोग्य, मारण तथा उसके शमनके प्रयोग भी बता रहा हूँ। भोजपत्रपर ताड़की कलमसे 'कूर्मचक्र' लिखे। वह छः अङ्गुलके मापका होना चाहिये। तदनन्तर द्विज उसके मुख तथा चारों पैरोंमें मन्त्रका न्यास करे। चारों पैरोंमें 'क्रीं' तथा मुखमें 'ह्रीं' लिखे।


१. इस चक्रकी विधि 'श्रीविद्यार्णव-तन्त्र' में इस प्रकार दी गयी है—दस दलवाला पद्म बनाकर उसकी कर्णिकामें माया-बीजके उदरमें साध्य-नाम लिखकर उसके दलोंमें मूल त्वरिता-विद्याके प्रणवादि दस वर्णोंको लिखे। माया-बीजके अक्षर छोड़ दे। उस कमलचक्रके बाह्यभागमें षट्कोण तथा उसके भी बाह्यभागमें चौकोर मण्डल बनावे। २. इस यन्त्रका उल्लेख 'शारदातिलक' के दशम पटलमें उपलब्ध होता है।