अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 703, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें६७६ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
जब एक चरण छः अक्षरोंका हो और अन्य चरणोंमें पहले बताये अनुसार नियत अक्षर ही हों तो उसका नाम ‘ककुदमती’ होगा। जहाँ तीन पादवाले छन्दके पहले और दूसरे चरणमें अधिक अक्षर हों और बीचवालेमें बहुत ही कम हों, वहाँ उस छन्दका नाम ‘पिपीलिकमध्या’ होगा। [जैसे त्रिपदा गायत्रीके आदि और अन्त चरण आठ-आठ अक्षरके हों तथा बीचवाला चरण तीन, चार या पाँच अक्षरका हो तो उसे ‘पिपीलिकमध्या’ कहेंगे।] इसके विपरीत जब आदि और अन्तवाले पादोंके अक्षर कम हों और बीचवाला पाद अधिक अक्षरोंका हो तो उस ‘त्रिपाद् गायत्री’ आदि छन्दको ‘यवमध्या’ कहते हैं। यदि ‘गायत्री’ या ‘उष्णिक्’ आदि छन्दोंमें केवल एक अक्षरकी कमी हो, उसकी ‘निचृत्’ यह विशेष संज्ञा होती है। एक अक्षरकी अधिकता होनेपर वह छन्द ‘भूरिक्’ नाम धारण करता है। इस प्रकार दो अक्षरोंकी कमी रहनेपर ‘विराट्’ और दो अक्षर अधिक होनेपर ‘स्वराट्’ संज्ञा होती है। संदिग्ध अवस्थामें आदि पादके अनुसार छन्दका निर्णय करना चाहिये। [जैसे कोई मन्त्र छब्बीस अक्षरका है, उसमें गायत्रीसे दो अक्षर अधिक हैं और उष्णिक्से दो अक्षर कम—ऐसी दशामें वह ‘स्वराट् गायत्री’ छन्द है या ‘विराड् उष्णिक्’?—ऐसे संदेहयुक्त स्थलोंमें यदि मन्त्रका पहला चरण ‘गायत्री’ से मिलता हो तो उसे ‘स्वराट् गायत्री’ कहेंगे और यदि प्रथम पाद ‘उष्णिक्’ से मिलता हो तो उसे ‘विराड् उष्णिक्’ कह सकते हैं। इसी तरह अन्यत्र भी समझना चाहिये।] इसी प्रकार देवता, स्वर, वर्ण तथा गोत्र आदिके द्वारा संदिग्धस्थलमें छन्दका निर्णय हो सकता है। गायत्री आदि छन्दोंके देवता क्रमशः इस प्रकार हैं—अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति, मित्रावरुण, इन्द्र तथा विश्वेदेव। उक्त छन्दोंके स्वर हैं—‘षड्ज’ आदि। उनके नाम क्रमशः ये हैं—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद। श्वेत, सारंग, पिशङ्ग, कृष्ण, नील, लोहित (लाल) तथा गौर—ये क्रमशः गायत्री आदि छन्दोंके वर्ण हैं। ‘कृति’ नामवाले छन्दोंका वर्ण गोरोचनके समान है और अतिच्छन्दोंका वर्ण श्यामल है। अग्निवेश्य, काश्यप, गौतम, अङ्गिरा, भार्गव, कौशिक तथा वसिष्ठ—ये क्रमशः उक्त सात छन्दोंके गोत्र बताये गये हैं॥ १६—२३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘छन्दस्सारका कथन’ नामक तीन सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३०॥
तीन सौ इकतीसवाँ अध्याय
उत्कृति आदि छन्द, गण-छन्द और मात्रा-छन्दोंका निरूपण
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठजी! एक सौ चार अक्षरोंका ‘उत्कृति’ छन्द होता है। [जैसे यजुर्वेदमें—‘होता यक्षदश्विनौ छागस्य०’ इत्यादि (२१।४१)] ‘उत्कृति’ छन्दमेंसे चार-चार घटाते जायँ तो क्रमशः निम्नाङ्कित छन्द होते हैं—सौ अक्षरोंकी ‘अभिकृति’$^१$, छानबे अक्षरोंकी ‘संस्कृति’$^२$, बानबे अक्षरोंकी ‘विकृति’$^३$, अठासी अक्षरोंकी ‘आकृति’$^४$, चौरासी अक्षरोंकी ‘प्रकृति’$^५$,
$^१$. ‘अभिकृति’ आदि छन्दोंके उदाहरणका प्रतीकमात्र यहाँ दिया जाता है, विशेष जानकारीके लिये वेदोंमें अनुसंधान करना चाहिये। यजुर्वेदे—‘देवो अग्निः स्विष्टकृत् देवान्यक्षत्’ इत्यादि (२१।५८)।
$^२$. यजुर्वेदे—‘देवो अग्निः स्विष्टकृत्, सुद्रविणामन्दः कविः’ इत्यादि।
$^३$. ‘इमे सोमाः सुरामाणाम्’ इत्यादि।
$^४$. ‘भगा अनुपयुक्तामिन्द्रो यातु पुरोगवः’ इत्यादि।
$^५$. प्रकृतेरुदाहरणम्—‘सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च’ इत्यादि प्रातराचमनमन्त्रः।